त्रैलोक्यमोहनगणपति मन्त्र –
यह मन्त्र तीनों लोकोंके समस्त प्राणी को सम्मोहित करके अपने वशमें करने वाला मन्त्र है।
विस्तृत पूजन तथा प्रयोग निचे दिया जा रहा है -
सर्वप्रथम
भगवान गणेशका ध्यान करें।
मानसोपचार
से पूजन करें।
अर्घ्य
स्थापित करें।
फिर
एक चौकी पर लाल वस्त्रका आसन रखकर उसपर पञ्च आवरण वाला यन्त्र निर्माण करें।
यन्त्र
की रूपरेखा निम्न प्रकार से है –
यह मन्त्र तीनों लोकोंके समस्त प्राणी को सम्मोहित करके अपने वशमें करने वाला मन्त्र है।
ॐ वक्रतुण्डैकदंष्ट्राय क्लीं ह्रीं
श्रीं गं गणपते वरद वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।
विस्तृत पूजन तथा प्रयोग निचे दिया जा रहा है -
त्रैलोक्यमोहनगणपति मन्त्र – यह मन्त्र तीनों लोकोंके समस्त प्राणी को
सम्मोहित करके अपने वशमें करने वाला मन्त्र है। पुष्टिकर मन्त्र होने के कारण
अनुष्ठानमें त्रुटि रहने पर साधकके लिए मारक नहीं है।
ॐ वक्रतुण्डैकदंष्ट्राय क्लीं ह्रीं
श्रीं गं गणपते वरद वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।
इस मन्त्रसाधनाके लिए सर्वप्रथम आसन
शुद्धि करना चाहिए। शुद्ध भावसे नित्यक्रिया से निवृत्त होकर गणेशजीके पूजनके लिए
अभीष्ट सामग्रीको लेकर रक्तासनमें बैठ जाना चाहिए। विधिवत् आचमन एवं प्रणायाम के
द्वारा शरीर शुद्धि करके, दीपप्रज्वलन करें। पुरश्चरणके लिए प्रयाश्चित्त तथा
संकल्प करें। प्रत्येक मन्त्रकी साधना सिद्धिका अंग होती है। साधनाके द्वारा
सिद्धि प्राप्त होती है। फिर किसी विशेष कार्यकी प्राप्तिके लिए पुनः ससंकल्प जप
किया जाता है। अतः साधक पहले मन्त्रद्वारा स्वयं में मन्त्रकी सिद्धि प्राप्त करता
है। इस पूजन में
यन्त्रके
आठों दिशाओं में निम्न मन्त्रसे पूजन करें
(यन्त्रके पूर्व भाग से पूजन आरंभ करें।)
ॐ तीव्रायै नमः इति पूर्वदिशि।
ॐ चालिन्यै नमः इति आग्नेयकोणे।
ॐ नन्दायै नमः इति दक्षिणदिशि।
ॐ भोगदायै नमः इति नैऋत्यकोणे।
ॐ कामरूपिण्यै नमः इति पश्चिमदिशि।
ॐ उग्रायै नमः इति वायव्यकोणे।
ॐ तेजोवत्यै नमः इति उत्तरदिशि।
ॐ सत्यायै नमः इति ईशान्यकोणे।
इस प्रकार पूजन कर मध्य में
विघ्नविनाशिन्यै नमः एवं ॐ सर्वशक्तिकमलासनाय नमः इस मन्त्रसे आसन देकर मूल मन्त्र
से गणेशजी की मूर्ति की कल्पना करें (काम्य प्रयोग के योग्य न होने तक मूर्ति
स्थापित नहीं करना है)। फिर उसमें गणेशजी का ध्यान करें। ॐ श्री त्रैलोक्यमोहन
गणपतये नमः इस मन्त्रसे अथवा पुरे मूल मंत्रसे आवाहन आसन पाद्य अर्घ्य इत्यादि
समस्त उपचारोंसे पूजन करें।
अब उसी यन्त्रमें क्रमशः पाँच आवरणकी
पूजा करें –
प्रथम आवरण पूजा –
ॐ गां हृदयाय नमः आग्नेय दिशामें पूजन
करें।
ॐ गीं शिरसे स्वाहा नैऋत्य दिशामें पूजन करें।
ॐ गूं शिखायै वषट् वायव्य दिशामें
पूजन करें।
ॐ गैं कवचाय हुम् ईशान्य दिशामें पूजन
करें।
ॐ गौं नेत्रत्रयाय वौषट् अग्र भाग में
पूजन करें।
ॐ गः अस्त्राय फट् चारों दिशाओं में
पूजन करें।
ऐसे पूजन करनेके पश्चाद् मूल मन्त्रका
(अर्थात् इस विहित कर्म के लिये प्रयुक्त ॐ वक्रतुण्डैकदंष्ट्राय क्लीं ह्रीं
श्रीं गं गणपते वरद वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा । )
उच्चारण करें और –
अभीष्टसिद्धिं
मे देहि शरणागतवत्सले।
भक्त्या समर्पये
तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम्।।
ऐसा कहकर
पुष्पाञ्जली समर्पित करें।
फिर यन्त्रके अन्दर निम्न मन्त्र से द्वितीय आवरण पूजन करें –
ॐ विद्यायै नमः कहकर पूर्व दिशामें पूजन करें।
ॐ विधात्र्यै नमः कहकर आग्नेय दिशामें पूजन करें।
ॐ भोगदायै नमः कहकर पूर्व दक्षिण दिशा में पूजन करें।
ॐ विघ्नघातिन्यै नमः कहकर नैऋत्य दिशामें पूजन करें।
ॐ निधि-प्रदीपायै नमः कहकर पश्चिम दिशामें पूजन करें।
ॐ पापघ्न्यै नमः कहकर वायव्य दिशामें पूजन करें।
ॐ पुण्यायै नमः कहकर उत्तर दिशामें पूजन करें।
ॐ शशिप्रभायै नमः कहकर ईशान्य दिशामें पूजन करें।
ऐसे पूजन
करनेके पश्चाद् मूल मन्त्रका उच्चारण करें और –
अभीष्टसिद्धिं
मे देहि शरणागतवत्सले।
भक्त्या समर्पये
तुभ्यं द्वितीयावरणार्चनम्।।
ऐसा कहकर
पुष्पाञ्जली समर्पित करें।
तदनन्तर
यन्त्रके अष्टदलकमल में निम्न मन्त्रसे तृतीय आवरण पूजन करें –
ॐ
वक्रतुण्डाय नमः।
ॐ एकद्रंष्ट्राय
नमः।
ॐ महोदराय
नमः।
ॐ गजास्याय
नमः।
ॐ लम्बोदराय
नमः।
ॐ विकटाय
नमः।
ॐ विघ्नराजाय
नमः।
ॐ धुम्रवर्णाय
नमः।
ऐसे पूजन
करनेके पश्चाद् मूल मन्त्रका उच्चारण करें और –
अभीष्टसिद्धिं
मे देहि शरणागतवत्सले।
भक्त्या समर्पये
तुभ्यं तृतीयावरणार्चनम्।।
ऐसा कहकर
पुष्पाञ्जली समर्पित करें।
अब पुनः
यन्त्रके अष्टदलकमल के अग्रभाग में निम्न मन्त्रसे चतुर्थ आवरण में दशदिक्पालोंका
पूजन करें –
ॐ इन्द्राय
नमः इस मन्त्रसे पूर्व दिशा में पूजन करें।
ॐ अग्नये नमः
इस मन्त्रसे अग्नि कोण में पूजन करें।
ॐ यमाय नमः
इस मन्त्रसे दक्षिण दिशा में पूजन करें।
ॐ निर्ऋतये
नमः इस मन्त्रसे नैऋत्य कोण में पूजन करें।
ॐ वरुणाय नमः
इस मन्त्रसे पश्चिम दिशा में पूजन करें।
ॐ वायवे नमः
इस मन्त्रसे वायव्य कोण में पूजन करें।
ॐ सोमाय नमः
इस मन्त्रसे उत्तर दिशा में पूजन करें।
ॐ ईशानाय नमः
इस मन्त्रसे ईशान्य कोण में पूजन करें।
ॐ ब्रह्मणे
नमः इस मन्त्रसे आकाश की पूजन करें।
ॐ अनन्ताय
नमः इस मन्त्रसे पाताल की पूजन करें।
अब मूल
मंत्रके साथ
अभीष्टसिद्धिं
मे देहि शरणागतवत्सले।
भक्त्या समर्पये
तुभ्यं चतुर्था-वरणार्चनम्।।
ऐसा कहकर
पुष्पाञ्जली समर्पित करें।
यन्त्रके अष्टदलकमल
के अग्रभाग के अन्त में निम्न मन्त्रसे पञ्चम आवरण पूजन करें –
ॐ वज्राय
नमः।
ॐ शक्तये
नमः।
ॐ दण्डाय
नमः।
ॐ खड्गाय
नमः।
ॐ पाशाय नमः।
ॐ अङ्कुशाय
नमः।
ॐ गदायै नमः।
ॐ त्रिशूलाय
नमः।
ॐ चक्राय
नमः।
ॐ पद्माय
नमः।
ऐसे पूजन
करनेके पश्चाद् मूल मन्त्रका उच्चारण करें और –
अभीष्टसिद्धिं
मे देहि शरणागतवत्सले।
भक्त्या समर्पये
तुभ्यं पंचमा-वरणार्चनम्।।
ऐसा कहकर
पुष्पाञ्जली समर्पित करें।
धूपदीपनैवेद्य
समर्पित करें।
तदनन्तर इस क्रियाके लिए विनियोग करें
–
ॐ अस्य श्रीत्रैलोक्यमोहनमन्त्रस्य गणकऋषिः गायत्री छन्दो
भक्तेष्टसिद्धिदायकत्रैलोक्यमोहनकारको गणपतिर्देवता आत्मनोऽभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे
विनियोगः।
अब षडङ्ग न्यास करें –
ॐ
वक्रतुण्डैकदंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं हृदयाय नमः (हृदयका स्पर्श)
ॐ
गणपते शिरसे स्वाहा (मस्तकका स्पर्श)
ॐ
वरवरद शिखायै वषट् (शिखाका स्पर्श)
ॐ
सर्वजनं कवचाय हुम् (दोनों हाथोंसे कवच बनाते हुए भुजाओंका स्पर्श)
ॐ मे वशमानय नेत्रत्रयाय वौषट् (तीनों नेत्रका
स्पर्श)
ॐ स्वाहा
अस्त्राय फट् (शिरके उपरसे दक्षिण हस्तको घुमाते हुए तालिका वादन)
अब त्रैलोक्यमोहन गणपतिका ध्यान करें –
गदाबीजपूरे धनुः शूलचक्रे
सरोजोत्पले पाशधान्याग्रदन्तान्।
करैः सन्दधानं स्वशुण्डाग्रराजन्
मणीकुम्भमङ्काधिरूढं स्वपत्न्या।।
सरोजन्मनाभूषणानाम्भरेणो-
ज्ज्वलद्धस्ततन्व्यासमालिङ्गिताङ्गम्।
करीन्द्राननं चन्द्रचूडं त्रिनेत्रं
जगन्मोहनं रक्तकान्तिं भजेत्तम्।।
हे भगवन् आपके दाहिने हाथों में
क्रमशः गदा, बीजपूर, शूल, चक्र तथा पद्म विराजते हैं। बायें हाथों में धनुष,
उत्पल, पाश धान्यमञ्जरी, एवं दन्त धारण किया है। आपके शुण्डाग्रभागमें मणिकलश
सुशोभित हो रहा है। आपके पार्श्व भाग में सुशोभित श्री अङ्ग वाली, कमल एवं आभूषणों
से जगमगाती हुई उज्ज्वल वर्ण वाली पत्नी विराजती हैं। अतः आप प्रियासे आलिङ्गित
हो। ऐसे त्रिनेत्र धारी, हाथीके समान मुख वाले, सिर पर चन्द्रकला धारण किये हुए,
तीनों लोकों को मोहित करने वाले, रक्त कान्तिसे युक्त श्री गणेश जी का मैं ध्यान
करता हूँ।
अब विधि पूर्वक गणेशजीका जप प्रारंभ
करें। ॐ वक्रतुण्डैकदंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते वरद वरद सर्वजनं मे
वशमानय स्वाहा।
इस मन्त्रका चारलाख जप करने के
पश्चात् पुरश्चरण हो जाता है। पुरश्चरणके पश्चात् जपका दशांश हवन करना चाहिए। अर्थात्
चालिहजार मन्त्रसे हवन। पुनः हवनके दशांश का तर्पण अर्थात् चारहजार माला से तर्पण
किया जाना चाहिए । तर्पणमें पूर्णमंत्रके उच्चारणके पश्चात् तर्पयामि।
उच्चारण किया जाता है। तर्पणके दशांश से अर्थात् चार माला मन्त्र उच्चारण के साथ
तर्पित जलसे स्वयंका भगवान गणेश भावसे मार्जन किया जाता है। इसका दशांश ब्रह्मण
भोजन कराने के पश्चात् कर्मको पूर्ण माना जाता है। अब साधक काम्य प्रयोग अर्थात्
अभीष्ट सिद्धि के लिये इस मन्त्रका उपयोग कर सकता है। अगूठेके बराबर की गणेश
मूर्ति को यन्त्रके मध्य भागमें रखकर किया जाता है।
हवन के लिए विशिष्ट सामग्री की
आवश्यकता होती है जो निम्न प्रकार के हैं
ईख
सत्तू
केला
चिउडा
तिल
मोदक
नारियल
धानका लावा
ये आठ द्रव्य अन्य हवनीय द्रव्यके साथ
विशेष रूप से प्रयुक्त किया जाता है।
काम्य प्रयोग में पीपल, उदुम्बर,
प्लक्ष, वट आदि की समिधायें एवं मुनक्का, सुवर्ण, गो दुग्ध, दधि मिश्रित चरु, घी
इत्यादि से हवन किया जाता है।

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