प्रस्तुत लेख मम्मटके काव्यप्रकाश की झळकीकर टीका के आधार पर बनाये गये सीरीज हैं। इसमें झळकीकर (वामन भट्ट झलकीकर) टीकाके साथ साथ अन्य संस्कृतके टीकाकारों के मत भी यथा स्थान रखे गये हैं।
इसमें गुणीभूत व्यङ्ग्यके आठ भेद बताये गये हैं
गुणीभूत व्यङ्ग्य निरूपण तथा उसके भेद
उपभेद वर्णन पञ्चम उल्लास का मुख्य विषय है। मम्मट के अनुसार दोष रहित गुणयुक्त
एवं साराधणतया अलंकार युक्त किन्तु कहीं कहीं अलंकार रहित होने पर भी शब्दार्थ
समष्टि ध्वनि काव्य या उत्तम काव्य माना जाता है। यह काव्य सदा सर्वदा शब्द द्वारा
निरुपित अर्थ से भिन्न चमत्कार युक्त किन्तु शब्दार्थ से ही संबद्ध व्यङ्ग्य अर्थ
होता है। यही ध्वनि काव्य है। और यदि इस प्रकार से ध्वनित व्यङ्ग्य अर्थ गौण हो जाये तो उसे गुणीभूत काव्य या
मध्यम काव्य कहा जाता है। मूल में मध्यम काव्य दो प्रकार का होता है। प्रथम
व्यङ्ग्य अर्थ गौण होकर अत्यन्त साधारण बन
जाना जो सामान्य लोग भी समझ सके। दूसरा भेद व्यङ्ग्य अर्थ अत्यन्त क्लिष्ट होने पर
माना जाता है जो सहृदय पाठक भी समझने मे कष्ट अनुभव करे। अतः इन दो मुख्य भेदों के
आधार पर आचार्य मम्मट गुणीभूत व्यङ्ग्यको आठ भागों में विभक्त करते हैं। ये आठ भेद
निम्न हैं –
1. अगूढम् –
अगूढ का
अभिप्राय है असहृदय के द्वारा भी तुरन्त समझा जानेवाला। अर्थात् यद्यपि इसप्रकार
के काव्य में वाच्यार्थ तथा व्यङ्ग्यार्थ दोनो हैं किन्तु व्यङ्ग्यार्थ में कोई गूढता नहीं है। कोई भी समझ सकता है।
2. अपरस्याङ्गम् –
जैसा कि हम जानते हैं काव्यशास्त्र में व्यङ्ग्यार्थ
की प्रधानता होती है। किन्तु जिस काव्य में वाच्यार्थ की सिद्धि के लिए
व्यङ्ग्यार्थ अङ्ग बनकर गौण हो जाए वह अपरस्याङ्ग भेद कहलाता है। यह दूसरे का अंग
बनना कभी एक रस का दूसरे रस के लिए, कभी भाव भाव के लिए इत्यादि भेद भी होंगे।
3. वाच्यसिद्ध्यङ्गम् -
वाच्यार्थके सिद्धि
या विश्रान्ति में व्यङ्ग्यार्थ अङ्ग बन जाना। यानि वाच्यर्थ की सिद्धि ही
व्यङ्ग्यर्थ के अधीन होना, वह स्थिति।
4. अस्फुटम् –
अस्फुट अर्थात् व्यङ्ग्य का प्रष्ट न होना। सहृदय
सामाजिक को भी व्यङ्ग्यार्थ समझने मे कठिन हो। 5. संदिग्धप्रधान – जिस काव्य में
व्यङ्ग्यार्थ की प्रधानता है या वाच्यार्थकी प्रधानता है इस संबन्ध में निश्चित न
होना।6. तुल्यप्रधान – वाच्यार्थ तथा व्यङ्ग्यार्थ में समान
प्रधानता हो। अर्थात् जहाँ चमत्कारोत्पत्ति में दोनो वाच्यार्थ तथा व्यङ्ग्यार्थ
सक्षम हों वह तुल्यप्रधान्यम् हुआ।
7. काकु के द्वारा आक्षिप्त (काक्वाक्षिप्त) –
काकु कहते हैं ध्वनि
विकार को । अर्थात् विशिष्ट ध्वनि द्वारा आक्षिप्त झटिति प्रकाशित। अथवा इसको ऐसे
समझना चाहिये - जिस विशिष्ट ध्वनि भङ्गिमा के विना चमत्कार हृदयङ्गम नहीं होता उस
प्रकार से उच्चारित काव्य को काक्वाक्षिप्त कहना चाहिये। अथवा जिसमे मुख्यार्थ
बाधादि लक्षण के लिए विलंब होने से कोई अवसर न हो।
8. असुन्दरम्
–
चमत्कार उत्पन्न करने में व्यङ्ग्य का वाच्यमुख
निरीक्षक होना, या स्वभाव से ही वाच्यार्थ से अचारु व्यङ्ग्यार्थ का होना।
इसप्रकारके आठों भेदोंको हम क्रमशः लक्षण उदाहरण सहित पोष्ट करनेका प्रयास करेंगे। सुधीजन उचितानुचिविवेक साझा करें।
दूसरा भाग देखने के लिए यहाँ जायें।
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