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बुधवार, 20 दिसंबर 2017

समझ अपनी अपनी



महाभारत में कर्ण ने श्री कृष्ण से पूछा "मेरी माँ ने मुझे जन्मते ही त्याग दिया, क्या ये मेरा अपराध था कि मेरा जन्म एक अवैध बच्चे के रूप में हुआ?

दोर्णाचार्य ने मुझे शिक्षा देने से मना कर दिया क्योंकि वो मुझे क्षत्रीय नही मानते थे, क्या ये मेरा कसूर था?

परशुराम जी ने मुझे शिक्षा दी साथ ये शाप भी दिया कि मैं अपनी विद्या भूल जाऊंगा क्योंकि वो मुझे क्षत्रीय समझते थे।

भूलवश एक गौ मेरे तीर के रास्ते मे आकर मर गयी और मुझे गौ वध का शाप मिला?

द्रौपदी के स्वयंवर में मुझे अपमानित किया गया, क्योंकि मुझे किसी राजघराने का कुलीन व्यक्ति नही समझा गया।

यहां तक कि मेरी माता कुंती ने भी मुझे अपना पुत्र होने का सच अपने दूसरे पुत्रों की रक्षा के लिए स्वीकारा।

मुझे जो कुछ मिला दुर्योधन की दया स्वरूप मिला!

तो क्या ये गलत है कि मैं दुर्योधन के प्रति अपनी वफादारी रखता हूँ..??

श्री कृष्ण मंद मंद मुस्कुराते हुए बोले-
"कर्ण, मेरा जन्म जेल में हुआ था। मेरे पैदा होने से पहले मेरी मृत्यु मेरा इंतज़ार कर रही थी। जिस रात मेरा जन्म हुआ उसी रात मुझे मेरे माता-पिता से अलग होना पड़ा। तुम्हारा बचपन रथों की धमक, घोड़ों की हिनहिनाहट और तीर कमानों के साये में गुज़रा।
मैने गायों को चराया और गोबर को उठाया।
जब मैं चल भी नही पाता था तो मेरे ऊपर प्राणघातक हमले हुए।
कोई सेना नही, कोई शिक्षा नही, कोई गुरुकुल नही, कोई महल नही, मेरे मामा ने मुझे अपना सबसे बड़ा शत्रु समझा।
जब तुम सब अपनी वीरता के लिए अपने गुरु व समाज से प्रशंसा पाते थे उस समय मेरे पास शिक्षा भी नही थी। बड़े होने पर मुझे ऋषि सांदीपनि के आश्रम में जाने का अवसर मिला।

तुम्हे अपनी पसंद की लड़की से विवाह का अवसर मिला मुझे तो वो भी नही मिली जो मेरी आत्मा में बसती थी।
मुझे बहुत से विवाह राजनैतिक कारणों से या उन स्त्रियों से करने पड़े जिन्हें मैंने राक्षसों से छुड़ाया था!
जरासंध के प्रकोप के कारण मुझे अपने परिवार को यमुना से ले जाकर सुदूर प्रान्त मे समुद्र के किनारे बसाना पड़ा। दुनिया ने मुझे कायर कहा।

यदि दुर्योधन युद्ध जीत जाता तो विजय का श्रेय तुम्हे भी मिलता, लेकिन धर्मराज के युद्ध जीतने का श्रेय अर्जुन को मिला! मुझे कौरवों ने अपनी हार का उत्तरदायी समझ।

हे कर्ण! किसी का भी जीवन चुनोतियों से रहित नही है। सबके जीवन मे सब कुछ ठीक नही होता। कुछ कमियां अगर दुर्योधन में थी तो कुछ युधिष्टर में भी थीं।
सत्य क्या है और उचित क्या है? ये हम अपनी आत्मा की आवाज़ से स्वयं निर्धारित करते हैं!

इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कितनी बार हमारे साथ अन्याय होता है,

इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कितनी बार हमारा अपमान होता है,

इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कितनी बार हमारे अधिकारों का हनन होता है।

फ़र्क़ सिर्फ इस बात से पड़ता है कि हम उन सबका सामना किस प्रकार कर लिया 

गुरुवार, 9 नवंबर 2017

फेसबुक मा
घेर्दा धेर निकृष्ट कष्ट कुलनै बेग्लै हुंदा मायने
हाँस्ने को मन रून्छ हाँस्छ मनले  रोयेर देखाउने
रोयेको मन को प्रसन्न मुख को बैग्लै गति पाउने
सारा छन्द बुझेर लौ भन कवे लेख्ने कि विर्साउने!!

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

गणेश चतुर्थी विशेष / गणेशजी का परिचय

भगवान गणेश वस्तुतः निराकार परब्रह्म ही हैं भक्तों के कष्ट निवारण तथा सन्मार्ग पथ प्रदर्शनके लिये उन्होंने भी अनेक लीलायें की। उनकी ये लीलायें अनेक पुराणों  में वर्णित हैं। अनेक मत अनेक संप्रदाय को मानने वाले हैं हमारे सनातन परंपरा मे किन्तु गणेश की पूजा के विषय मे किसी का भी मत वैभिन्य नहीं है। चाहे वो शिव को मानता हो चाहे विष्णुको चाहे वो देवी को मानता हो। किन्तु प्रथम गणपति पूजन तो सभी के यहाँ होता है। जहाँ कोई भी आयोजन हो पूजते पहले गणेश को हैं।
घर से बाहर निकलते समय मंगल कामना करते हैं तो सबसे पहले गणपती
विद्या का आरंभ हो
घर निर्माण करना हो मंगल मूरती की पूजा
गृह प्रवेश हो देहली गणेश की पूजा
व्यापार को आरंभ करना हो सिद्धि विनायक की पूजा
परीक्षा लिखनी हो बुद्धिविनायक की पूजा
विवाह हो हे रम्ब गणेश की पूजा
कोई भी उत्सव हो श्री गणेश के विना किसी काम को नहीं करते
प्रत्येक सत्संग के लिये वो चाहे माता की चौकी हो चाहे किसी अन्य देवता की भजन संध्या पूजन सुमिरन तो प्रथ गणपति की ही होती है।
(गणेश भगवानकी विशेष मन्त्र साधना करना चाते हैं तो इसे देखें त्रैलोक्यमोहन गणपति मन्त्र)

गणपति गणेश को उमापति महादेव को मेरा प्रणाम है जी मेरा प्रणाम है।
अंजनी के पूत को राम जी के दूत को मेरा प्रणाम है जी मेरा प्रणाम है।
माँ शेरा वाली को खण्डे खप्पर वाली को मेरा प्रणाम है जी मेरा प्रणाम है।
राम जिनका नाम है अयोध्या जिनका धाम है
ऐसे श्री भगवान को मेरा प्रणाम है।
कृष्ण जिनका नाम है मथुरा जिनका धाम है।
ऐसे श्री भगवान को मेरा प्रणाम है।
शंकर जिनका नाम है कैलाश जिनका धाम है।
ऐसे श्री भगवान को मेरा प्रणाम है।
विष्णु जिनका नाम है सागर जिनका धाम है
ऐसे श्री भगवानको मेरा प्रणाम है।.

सदा भवानी दाहिनी गौरिपुत्र गणेश पंच देव रक्षा करें ब्रह्मा विष्णु महेश।।

इस  लिये ये सर्व प्रिय देव हैं। प्रत्येक मंगल कार्य का आरंभ इनसे होने से इनका नाम ही मंगल मूरती है। सारे शुभता के ये स्वामी हैं ये इस लिये इन्हें गणराज कहते हैं।
गणेश जी के विद्या रूप परम प्रसिद्ध है परा और अपरा दोने प्रकारके विद्या को देने के कारण।
गणपत्यर्थर्वशीर्ष में गणेश को साक्षात् ब्रह्म कहा है – त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
इनकी पूजा भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी को किया जाता है।
एक तो  इस दिन इनका जन्म हुआ
कश्यप नन्दन महोत्कट के रूप में।
गुणेश के रूप में शिव के घर में।
दूसरा उनके भक्तों को वर प्रदान भी इसी दिन किया था
भौम को वर दिया था
अतिथी के रूप में काशी राज के घर भी प्रभु इसी दिन गये थे ऐसा सन्तों का मत है।
इस लिये भाद्रपद मास के चतुर्थी को विशेष उत्सव मनाया जाता है
जब द्वापर युग मे भगवान गुणेश जा काशि नरेश के यहाँ अतिथि के रूप में पहुंचे थे तो भी यह दिन भाद्र पद मास की चतुर्थी थी इस लिये भी पूजा जाता है।
उस दिन को शाप भी है चन्द्रके दर्शन नहीं करनी चाहिये
चन्द्रमाने गणेश की अवहेलना की फलस्वरूप क्षय रोगी तथा अदर्शनीय वपु होने का शाप दिया।
गणेश जी का वायाँ दन्त भग्न हुआ है।
एक बार परशुराम जी शिवपार्वती के दर्शनार्थ कैलाश आये ( ब्रह्मवैवर्त पुराण)
द्वार पर विराजमान गणेश जी ने परशुराम को  सूँडसे पटक दिया ।
परशुराम ने भी परशु प्रहार किया गणेश जी का एक वायाँ दाँत खण्डित हो गया।

गणेश जी का वाहन मूषक है। इस पर भी अनेक कथायें हैं।
भव‌िष्य पुराण की कथा के अनुसार गणेश जी ने अपने नटखटपन से कुमार कार्त‌िकेय को परेशान कर द‌िया। क्रोध‌ित होकर कार्त‌िक ने गणेश जी का एक दांत तोड़ द‌िया। जब गणेश जी ने इसकी श‌िकायत भगवान श‌िव से की तो कुमार कार्त‌िकेय ने दांत गणेश जी को वापस कर द‌िया लेक‌िन एक शाप भी दे द‌िया क‌ि गणेश जी को अपने हाथ में हमेशा दांत पकड़े रहना होगा। 
शिव परिवार को याद करें जरा
अत्तुं वाञ्छति वाहनं गजपतेः
सर्वथा विपरीत अवस्था का परिचायक है गार्हस्थ जीवन
गणेश के वाहन को भगवान शंकर जी के आभुषण के रूप में विद्यमान सर्प खाना चहते हैं भगवान कार्तिकेय का वाहन मोर  उन सर्पोे को खाने के लिये ललचा रहा है। इधर माँ पार्वती का वाहन सिंह शंकर के वाहन नन्दी को भोजन बनाना चाहे तब? ऐसी विकटतम परिस्थितियाँ होने पर भी शान्त दान्त कुटुंब है भगवान शंकर का।
यही शिक्षा देने के लिये भगवान ने कुटुम्ब को ऐसा दिखाया।
माँ पार्वती अन्न पूर्णा हैं सारी त्रिलोकी उनसे भिक्षा माँगती है। किन्तु भूतभावन भोलेनाथ हाथ में कपाल पात्र ले कर भिक्षाटन में सारा संसार भ्रमण कर रहे हैं
गणेश जी के वास्तविक स्वरूप को देखें
वे विनायक हैं क्योंकि विगतः नायकः ( नहीं है नायक जिसका) अथवा विशिष्टः नायकः असौ विनायकः (जो नायकों मे विशिष्ट है)
विना नायकेन जातः असौ विनायकः  अर्थात् इसका कोई नायक नहीं है मात्र नायिका द्वारा प्रकट हुआ है।
इस अर्थ में भगवान माता पार्वती से उत्पन्न हुये
विशिष्ट असौ नायकः से ये ब्रह्माण्डके अधिनायक चर अचर के नियन्ता हुये।
भगवान का एक और नाम है गुणेश जो त्रिगुणातीत हो वही गुणेश कहलाता है।
दूसरा नाम है गणेश
गण कहते हैं समूह को
आधि दैविक दृष्टि से भगवान सम्पूर्ण देव गणों के स्वामी हुए।
आधि   भौतिक अर्थ में दृश्यमान सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से भगवान सम्पूर्ण सद्गुणों के स्वामी हैं

सिद्धि बुद्धी शुभ लाभ तुष्टी पुष्टी आनन्द प्रमोद संतोषी माता ये परिवार है गणेश जी का ।
सत्व गुण से सम्पन्न हो ने पर ये सब गुण अपने भीतर आजाते हैं।
ऐसे सत्वगुण के अधिनायक भगवान को कैसे अपनाया जा सकता है।
श्री तुलसी दास जी कहते हैं
मन क्रम वचन छाडि चतुराई भजत कृपा करीहहीं रघुराई।
जीवन में अहंकार के लिए स्थान न हो
सद्गुरूका आशिर्वाद हो तो अवश्य भी उसे वह पद मिलता है।
अन्यथा उस मनुष्य की तरह हो जायेगा
जो मृत्यु के द्वारा पाँच मिनट पाने पर भी वह अपने लिये नहीं दूसरों के बुराई करने में खर्चा कर देता है।
जब हम इस लोक से चलें और उस परम पिता से मिलन हो तो बता सकें कि  हमने इस अनमोल जीवन को पाकर क्या किया।

जब हम आये इस जग में जग हँसा हम रोये। ऐसी करनी कर चलो हम हँसे जग रोये।।

शनिवार, 8 जुलाई 2017

अपराजिता स्त्रोत्र हिन्दी अनुवाद

 धन प्राप्ति मंत्र, कनकधारा स्तोत्र मूल संस्कृत

त्रैलोक्यमोहन गणपति भगवानकी साधना के लिए देखें। 

ॐ अपराजितादेवी को नमस्कार ।

(ये विशेष अपराजिता स्त्रोत्र का हिन्दी अनुवाद  कुछ साधकों के अनुरोध पर लिखा गया है साधना के लिये नहीं। वस्तुतः तंत्रों तथा मंत्रों का  अनुवाद नहीं मूल ही साधना के लिये उपयुक्त है। इस का मूल भी अगले पोष्ट में प्रकाशित किया जायेगा।) 

विनियोग ॐ अस्या वैष्णव्याः पराया अजिताया महाविद्यायाः वामदेव बृहस्पति-मार्कण्डेया ऋषयः  गायत्रि उष्णिग् अनुष्टुब् बृहति-छन्दांसि, लक्ष्मीनृसिंहो देवता, क्लीँ श्रीं ह्रीं बीजम्, हुं शक्तिः, सकलकामनासिद्ध्यर्थम् अपराजिताविद्यामन्त्रपाठे विनियोगः।

(इस वैष्णवी अपराजिता महाविद्या के वामदेव बृहस्पति मार्कण्डेय ऋषि गायत्री उष्णिग् अनुष्टुप् बृहति छन्द, लक्ष्मी नरसिंह देवता क्लीँ बीजम्, हुं शक्ति, सकलकामना सिद्धिके लिये अपराजिता विद्या मन्त्रपाठ में विनियोग।)
नीलकमलदल के समान श्यामल रंग वाली भुजङ्गों के आभरण से युक्त शुद्धस्फटिकके समान उज्ज्वल तथा कोटी चन्द्र के समान मुख वाली, शंख चक्र धारण करने वाली बालचन्द्र मस्तक पर धारण करने वाली, वैष्णवी अपराजिता देवीको नमस्कार करके महान् तपस्वी मार्कण्डेय ऋषि ने इस स्तोत्र का पाठ किया ।3।
मार्कण्डेय ऋषि ने कहा – हे मुनियो सर्वार्थ सिद्धिदेनेवाली असिद्धसाधिका वैष्णवी अपराजिता देवी (के इस स्तोत्र) को सुने। 4। 
ॐ नारायण भगवानको नमस्कार वासुदेव भगवान को नमस्कार, अनन्तभगवान् को नमस्कार जो सहस्र सिर वाले क्षीर सागर में शयन करने वाले, शेष नाग के शैया में शयन करने वाले, गरुड वाहन वाले, अमोघ, अजन्मा, अजित, तथा पीतांबर धारण करने वाले हैं।
ॐ हे वासुदेव, संकर्षण प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, हयग्रिव, मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, अच्युत, वामन, त्रिविक्रम, श्रीधर, राम, बलाराम, परशुराम, हे वरदायक, आप मेरे लिये वरदायक हों। आपको नमस्कार है।
ॐ असुर दैत्य यक्ष राक्षस भूत प्रेत पिशाच कूष्माण्ड सिद्धयोगिनी डाकिनी शाकिनी शाकिनी स्कन्दग्रह उपग्रह नक्षत्रग्रह तथा अन्य ग्रहों को मारो मारो पाचन करो पाचन करो। मथन करो मथन करो विध्वंस करो विध्वंस करो तोड दो तोड दो चूर्ण करो चूर्ण करो। शङ्ख चक्र वज्र शूल गदा मुसल तथा हल से भस्म करो ।
ॐ हे सहस्र बाहु , हे सहस्र प्रहार आयुध वाले, जय , विजय, अजित, अमित, अपराजित, अप्रतिहत, सहस्रनेत्र, जलाने वाले, प्रज्वालित करने वाले, विश्वरूप, बहुरूप, मधुसूदन, महावराह, महापुरुष, वैकुण्ठ, नारायण, पद्मनाभ, गोविन्द, दामोदर, हृषिकेश, केशव, सभी असुरोंको उत्सादन करने वाले, हे सभी भूत प्राणियों को वश में करने वाले, हे सभी दुःस्वप्न नाश करने वाले, सभी यन्त्रों को नाश करने वाले, सभी नागों को विमर्दन करने वाले, सर्वदेवों के महादेव, सभी बन्धनों का विमोक्ष करने वाले, सभी अहितों को मर्दन करने वाले, सभी ज्वरों को नाश करने वाले, सभी ग्रहों को निवारण करने वाले, सभी पापों को प्रशमन करने वाले, हे जनार्दन आप को नमस्कार है। ये भगवान् विष्णुकी विद्या सर्वकामना को देने वाली, सर्वसौभाग्य की जननी, सभी भयको नाश करने वाली है। ये विष्णुकी परम वल्लभा सिद्धों के द्वारा पठित है, इसके समान दुष्टनाश करने वाली कोई और विद्या नहीं है। ये वैष्णवी अपराजिता विद्या  साक्षात् सत्वगुण समन्वित सदा पढने योग्य तथा प्रशस्ता है।
ॐ शुक्लवस्त्र धारण करने वाले चन्द्र वर्ण वाले चार भुजा वाले  प्रसन्न मुख वाले भगवान का सर्व विघ्न विनाश करने के लिये ध्यान करें।
हे वत्स अब मैं मेरी अभया अपराजिता के विषय में कहूंगा जो रजोगुणमयी कही गई हैं। ये सभी सत्व वाली सभी मंत्रों वाली स्मृत पूजित जपित कर्मों में योजित सभी कामनाओं की पूर्ति करने वाली हैं। इसको ध्यान पूर्वक सुनो। जो इस अपराजिता परम वैष्णवी अप्रतिहता पढने से सिद्ध होने वाली, स्मरण करने से सिद्ध होने वाली,विद्याको सुने पढें स्मरण करें धारण करें, कीर्तन करें, उसे अग्नि वायु वज्र पथ्थर खड्ग वृष्टि आदि का भय नहीं होता, समुद्र भय, चौर भय, शत्रु भय, शाप भय, भी नहीं होता।  रात्रि में, अन्धकार में, राजकुल से विद्वेष करने वालों से, विष से विषदेने वालों से, वशीकरण आदि टोना टोटका करने वालों से, विद्वेषियों से, उच्चाटन करने वालों से, वध भय बन्धन का भय आदि समस्त भय से रहित हो जाते हैं। इन मन्त्रों के द्वारा कही गई सिद्ध साधकों द्वारा पूजित, अपराजिता शक्ति है। -
आप को नमस्कार है। हे भय रहित, पापरहित, परिमाण रहित, अमृत तत्त्ववाली, अपरा, अपराजिता, पढने से सिद्ध होने वाली, जप करने से सिद्ध होने वाली, स्मरण करने मात्र से सिद्धि देने वाली, नवासिवाँ स्थान वाली, अकेले रहने वाली, निश्चेता, सुद्रुमा, सुगन्धा, एक अन्न लेने वाली, उमा, ध्रुवा, अरुन्धती, गायत्री, सावित्री, जतवेदा, मानस्तोका, सरस्वति, धरणी, धारण करने वाली, सौदामिनी, अदिती, दिती, विनता, गौरी, गान्धारी, मातङ्गी, कृष्णा, यशोदा, सत्यवादिनी, बह्मवादिनी, काली कपालिनी, कराल  नेत्र वाली, भद्रा, निद्रा, सत्य की रक्षा करने वाली, जलमे स्थल में अन्तिक्ष में सर्वत्र सभी प्रकार के उपद्रवों से रक्षा करो स्वाहा।
जिस स्त्री का गर्भ नष्ट होता है, गिर जाता है, बालक मर जाता है, अथवा वह काक बन्ध्या भी हो तो इस विद्या को धरण करने से गर्भिणी जीववत्सा होगी इसमे कोई संशय नहीं है।12।
इस मंत्र को भोजपत्र में चन्दन से लिख कर धारण करने से सौभग्यवती स्त्रियाँ पुत्रवती हो जाती है इसमे कोई संदेह नहीं। 13।
युद्ध में राजकुल में जुआ में इस मन्त्र के प्रभाव से नित्य जय हो जाता है। भयंकर युद्ध में ये विद्या अस्त्र सस्त्रों से रक्षा करती है। 14।
गुल्म रोग शूल रोग आँख के रोग की व्यथा शीघ्र नाश हो जाती है। ये विद्या शिरोवेदना, ज्वर आदि नाश करने वाली है। इस प्रकार की अभया अपराजिता विद्या कही गई है, इसके स्मरण मात्र से कहीं भी भय नहीं होता। सर्प भय रोग भय तस्करोंका भय , योद्धाओंका भय, राज भय, द्वेष करने वालोंका भय और शत्रु भय नहीं होता है। यक्ष राक्षस वेताल शाकिनी ग्रह अग्नि वायु समुद्र विष इत्यादि से भी भय नहीं होता। क्रिया से शत्रु के द्वारा किये हुये वशीकरण हो, उच्चाटन स्तम्भन हो विद्वेषण हो इन सब का लेश मात्र भी प्रभाव नहीं होता जहाँ माँ अपराजिता का पाठ हो, यहाँ तक की मुख में कण्ठस्थ हो लिखित रूप में हो, चित्र अर्थात् यन्त्र रूप मे लिखा हो तो भी भय बाधायें कुछ नहीं होते। यदि माँ अपराजिता के इस स्तोत्र को तथा चतुर्भुजा स्वरू को हृदय में धारण करेगा तो बाहर भीतर सब प्रकार से भय रहित शान्त हो जाता है। 21।
लाल पुष्प माला धारण की हुई , कोमल कमलकान्ति के समान कान्ती वाली, पाश अङ्कुश , तथा अभय मुद्राओं से समलङ्कृत सुन्दर स्वरूप वाली, साधकों को मन्त्र वर्ण रूप अमृत  को देती हुई, माँ का ध्यान करें। इस विद्या से बढकर न कोई वशीकरण सिद्धि देने वाली विद्या है, न रक्षा करने वाली, न पवित्र। अतः इस विषय में कोई चिन्तन करनेकी आवश्यकता नहीं है। प्रात काल  में साधकों को माँ के कुमारी रूप की पूजन विविध खाद्य सामग्री से अनेक प्रकार के आभरणों से करनी चाहिये, फिर इस मन्त्र का प्रेम पूर्वक पाठकरना चाहिये। कुमारी देवी के प्रसन्न होने से मेरी ( अपराजिता की ) प्रीति बढ जाती है।
अब मैं उस महान बलशालिनी विद्या को कहूंगा जो सभी दुष्ट दमन करने वाली सभी शत्रु नाश करने वाली, दारिद्र्य दुःख को नाश करने वाली, दुर्भाग्य का नाश करने वाली, रोग नाश करने वाली, भूत प्रेत पिशाच यक्ष गन्धर्व राक्षस का नाश करने वाली है। डाकिनी शाकिनी स्कन्द कुष्माण्ड आदि का नाश करने वाली, महा रौद्र रूपा, महा शक्ति शालिनी, तत्काल विश्वास देने वाली है। ये विद्या अत्यन्त गोपनीय तथा भगवान भूतभावन भोलेनाथ की तो सर्वस्व  है इस लिये गुप्त रखना  चाहिये। ऐसी विद्या तुम्हें कहता हूं सावधान होकर सुनो। 28।
एक दो , चार दिन या आधे महिने एक महिने, दो महिने, तीन महिने, चार महिने, पाँच महिने, छह महिने, तक चलने वाला वात ज्वर पित्त संबन्धी ज्वर अथवा कफ दोष, या सन्निपात हो, या मुहूर्त मात्र रहने  वाला पित्त ज्वर, विष का ज्वर , विषम ज्वर दो दिन वाला , तीन दिन वाला एक दिन वाला अथवा अन्य ज्वर हो वे सब अपराजिता के स्मरण मात्र से शिघ्र नाश हो जाते हैं।
हृ हन हन कालि शर शर, गौरि धम धम, हे विद्या स्वरूपा हे आले ताले माले गन्धे बन्धे विद्याको पचा दो पचा दो नाश करो नाश करो पाप हरण करो हरण करो संहार करो संहार करो , दुःस्वप्न विनाश करने वाली कमलपुष्प मे स्थित विनायक मात रजनि सन्ध्या स्वरूपा दुन्दुभि नाद करने वाली मानस वेग वाली शङ्खिनी चक्रिणी वज्रिणी शूलिनी अपस्मृत्यु नाश करने वाली विश्वेश्वरी द्रविडि द्राविडी द्रविणी द्राविणी केशव दयिते पशुपति सहिते, दुन्दुभी दमन करने वाली दुर्मद दमन करने वाली, शबरी किराती मातङ्गी द्रं द्रं ज्रं ज्रं क्रं क्रं तुरु तुरु द्रं कुरु कुरु।
जो प्रत्यक्ष या परोक्ष में मुझसे जलते हैं  उन सब का दमन करो दमन करो मर्दन करो मर्दन करो, तापित करो तापित करो, छिपा दो छिपा दो , गिरा दो गिरा दो, शोषण करो शोषण करो, उत्सादित करो , उत्सादित करो, हे ब्रह्माणि हे वैष्णवी, हे माहेश्वरी, कौमारी, वाराही, हे नृसिंह संबन्धिनी, ऐन्द्री, चामुण्डा, महालक्ष्मी, हे विनायक संबन्धिनी, हे उपेन्द्र संबन्धिनी, हे अग्नी संबन्धिनी, हे चण्डी, हे नैऋत्य संबन्धिनी, हे वायव्या, हे सौम्या, हे ईशान संबन्धिनी,  हे प्रचण्डविद्या वाली, हे इन्द्र तथा उपेन्द्र की भगिनी आप उपर तथा नीचे से रक्षा करें।
जया विजया शान्ती स्वस्ति तुष्टि पुष्टि बढाने वाली देवी आप को नमस्कार।
दुष्टकामनाओं को अंकुश करने वाली शुभ कामना देने वाली, सभी कामनाओं का वर देने वाली, सब प्राणियों मे मूझको प्रिय करो प्रिय करो स्वाहा।
आकर्षण करने वाली, आवेशित करने वाली, ज्वाला माला वाली, रमणी, रमाने वाली, पृथ्वी स्वरूपा, धारण करने वाली, तप करने वाली तपाने वाली, मदन रूपा, मद देने वाली, शोषण करने वाली, सम्मोहन करने वाली, नील ध्वज वाली महानील स्वरूपा, महागौरी, महाश्रिया, महाचान्द्री, महासौरी, महा मायूरी, आदित्य रश्मी, जाह् नवी। यमघण्टा किणि किणि ध्वनी वाली, चिन्तामणी, सुगन्ध वाली, सुरभा, सुर असुर उत्पन्न करने वाली, सब प्रकार के कामनाओं की पूर्ति करने वाली, जैसा मेरा मन इच्छित कार्य है (यहाँ अपनी कामना का चिन्तन कर सकते हैं ) वह सम्पन्न हो जाये स्वाहा।
ॐ स्वाहा । ॐ भूः स्वाहा । ॐ भुवः स्वाहा । ॐ स्वः स्वहा । ॐ महः स्वहा । ॐ जनः स्वहा । ॐ तपः स्वाहा । ॐ सत्यं स्वाहा । ॐ भूभःभुवः स्वः स्वाहा ।
जो पाप जहाँ से आया है वहीं लौट चलें स्वाहा इति ॐ ये महा वैष्णवी अपराजिता महा विद्या अमोघ फलदायी है।  ये महाविद्या महा शक्तिशाली है अतः इसे अपराजिता अर्थात् किसी प्रकार के अन्य विद्या से पराजित न होने वाली कहा गया है। इसको स्वयं विष्णु ने निर्माण किया है सदा पाठ करने से सिद्धि प्राप्त होती है।
इस विद्या के समान तीनों लोकों में कोई रक्षा करने में समर्थ दूसरी विद्या नहीं है। ये तमोगुण स्वरूपा साक्षात् रौद्रशक्ति मानी गई है। इस विद्या के प्रभाव से यमराज भी डरकर चरणों में बैठ जाते हैं। इस विद्या को मूलाधार में स्थापित करना चाहिये तथा रात को स्मरण करना चाहिये। नीले मेघ के समान चमकती बिजली जैसे केश वाली चमकते सूर्यके समान तीन नेत्र वाली माँ मेरे प्रत्यक्ष विराजमान हैं। शक्ति त्रिशूल शङ्ख पानपात्र को धारण की हुई, व्याघ्र चर्म धारण  की हुई, किङ्किणियों से सुशोभित मण्डप में विराजमान, गगनमण्डल के भीतरी भाग में धावन करती हुई, तादुकाहित चरण वाली, भयंकर दाँत तथा मुख वाली, कुण्डल युक्त सर्प के आभरणों से सुसज्जित, खुले मुख वाली, जिह्वा को बाहर निकाली हुई, टेढी भौहें वाली, अपने भक्त से शत्रुता करने वालों का रक्त पानपात्र से पिने वाली, क्रूर दृष्टि से देखने से सात प्रकार के धातु शोषण करने वाली, बारंबार त्रिशूल से शत्रु के जिह्वा को कीलित कर देने वाली, पाश से बाँधकर उसे पास में लाने वाली, ऐसी महा शक्तिशाली माँ को आधे रात के समय में ध्यान करें। फिर रात के तीसरे प्रहर में जिस जिसका नाम लेकर जप किया जाये उस उस को वैसा बना देती हैं ये योगिनी माता।
ॐ बला महाबला असिद्धसाधनी स्वाहा इति। इस अमोघ सिद्ध श्रीवैष्णवी विद्या, श्रीमद् अपराजिता को दुःस्वप्न दुरारिष्ट आपद के अवस्था में, किसी कार्यके आरंभ में ध्यान करें इससे विघ्न बाधायें शान्त हो जायेंगी सिद्धि प्राप्ती होगी।
हे जगज्जननी माँ इस पाठ में मेरे द्वारा कहीं विसर्ग, अनुस्वार, अक्षर, पाठ छोडा गया हो तो भी माँ आप से क्षमा प्रार्थना करता हूँ मेरे पाठ का पूर्ण फल मिले, मेरे सङ्कल्प की सिद्धि हो।


हे माँ मैं आप के वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता, आप कैसी हैं ये भी नहीं जानता, बस मूझे तो इतना पता है कि आप का रूप जैसा भी हो उसी रूपको मैं पूज रहा हूँ। आप के सभी रूपों को नमस्कार है। ॐ 

रविवार, 25 जून 2017

म पाको भयेछु

म पाको भएछू सबै बुझ्न थालें
जहाँ बाट सक्थें  म नै झुक्न थालें||
लिने सोंच छाडी दिने चाह राखें
म पाको भएछू सबै बुझ्न थालें ||
खुसी भित्र मेरा भिजेका नुनेला
ति आँखा सपार्दै मिठो बोल्न थालें ||
धजो  मात्र बेर्दै दुपट्टा म बाँडे
म पाको भएछू सबै बुझ्न थालें ||
दुखेका ति घाऊ सबै ढाक्न थालें
मिलेका नराम्रा पिडा खप्न थालें
मिलेको पिंडो नै कतै छाड्न थालें
म पाको भएछू सबै बुझ्न थालें||
तजी लक्ष्य आफ्नो धरी स्वार्थ अन्त
सपार्दै कसैको सुनौलो दिगन्त ||
सबै चाहनाका जरा म उखालें
म पाको भएछू सबै बुझ्न थालें||
भुली बैगुनी का सबै दुःख मर्का
भयो भो तजौं ती पुरौं पूर्व  धर्का
भनी जातिवैरी सितै हात जोडें
म पाको भएछू सबै बुझ्न थालें||

भुजंगप्रयात

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

नारायणास्त्रम् / नारायणास्त्र

यह नारायणास्त्रम् को सर्वसाधारण के सौलभ्य के लिये पोष्ट किया जा रहा है। यह मन्त्र शुक्लयेजुर्वेदीय माध्यन्दिन शाखानुसारि आह्निक सूत्रावली से उद्धृत किया गया है। 
यह सिद्ध मन्त्र  सात्विक भाव समन्वित 
साधकों को अत्यन्त लाभ दायक सिद्धानुभूत है। यह मन्त्र भगवान् विष्णु को समर्पित है। प्रस्तुत मंत्रकी साधना से दुर्लभ से दुर्लभतर कार्य सिद्ध होते हैं। इसे भगवान नारायण का साक्षात् जीवित मन्त्र कहा जाता है। सद्गुरू की कृपावलेश से सत्व गुण वर्धन हेतु विगत पाँच वर्षों से यह साक्षात् अनभूत वर्णन है।

****अथ श्रीनारायणास्त्रम्****
हरिःॐ नमो भगवते श्रीनारायणाय नमो नारायणाय विश्वमूर्तये नमः। श्रीपुरुषोत्तमाय युष्मद्दृष्टिप्रत्यक्षं वा परोक्षं वा अजीर्णं पञ्चविषूचिकां हन हन। ऐकाहिकं द्व्याहिकं त्र्याहिकं चातुर्थिकं ज्वरं नाशय नाशय। चतुरशीतिवातानष्टादशकुष्ठान् अष्टादशक्षयरोगान् हन हन। सर्वदोषान् भञ्जय भञ्जय। तत्सर्वान् नाशय नाशय। शोषय शोषय आकर्षय आकर्षय । शत्रून् मारय मारय। उच्चाटय उच्चाटय। विद्वेषय विद्वेषय। स्तम्भय स्तम्भय। निवारय निवारय। विघ्नैर्हन हन दह दह मथ मथ विध्वंसय विध्वंसय। चक्रं गृहीत्वा शीघ्रम् आगच्छ आगच्छ। चक्रेण हत्वा परविद्यां छेदय छेदय भेदय भेदय। चतुरःशीतानि विस्फोटय विस्फोटय। अर्शोवातशूलदृष्टिसर्पसिंहव्याघ्रद्विपचतुष्पदपदे बाह्यदिवि भुव्यन्तरिक्षे अन्यानपि कांश्चित् तद्द्वेषकान् सर्वान् हन हन। विद्युन्मेघनदीपर्वताटवीसर्वस्थानरात्रिदिनपन्थाचौरान् वशं कुरु कुरु।
अथ मन्त्रः –
 हरिःॐ नमो भगवते ह्रीं हुं फट् स्वाहा ठ ठ ठ ठ हृदयादत्ता।।


सोमवार, 16 जनवरी 2017

संकल्प


प्रस्तुत संकल्प लिखनेका मुख्य प्रयोजन सामान्य लाभार्थी के लिये है महा संकल्प तथा विविध अवसरों पर संकल्प का प्रारूप बदल जाता है। 
ॐॐॐ
॥सङ्कल्पः॥
ॐ तिथिःविष्णुः तथा वारो नक्षत्रं ग्रहरेव च।। योगश्च करणञ्चैव सर्वं विष्णुमयं जगत्॥१॥
 जले विष्णुः स्थले विष्णुः विष्णुः पर्वतमस्तके॥ ज्वालामालाकुले विष्णुः सर्वं विष्णुमयं जगत्॥२॥
         सूर्यः सोम यमः कालः महाभूतानि पञ्च च।। शुभाशुभश्च नरसिंहः कर्मणो नव साक्षिणः॥३॥        
हरिः ॐ तत्सत् ॐ तत्सत् ॐ तत्सत् ॐ विष्णुः ॐ विष्णुः ॐ विष्णुः  श्रीमद्भग्वतोमहापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य सकलजगत्सृष्टिकारिणो ब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवराहकल्पे वैवश्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे युगे सत्य-त्रेता-द्वापरान्ते कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बुद्विपे भारतवर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तैकदेशे भारतदेशे (गुडगावॉ-वजिरावाद) नामके पुण्यक्षत्रे षष्टिसंवत्सराणां मध्ये नाम संवत्सरे श्रीसूर्य....ऽयने चन्द्र.... ऽयने .....ऋतौ सौरमानेन......मासे चान्द्रमानेन......मासे .....पक्षे .....तिथौ ....वासरे ....नक्षत्रे ...योगे श्रीसूर्ये ... राशिस्थिते चन्द्रमसि ... राशिस्थिते देवगुरौ ...राशिस्थिते अन्येषु षट्ग्रहेषु यथा यथा राशिस्थानस्थितेषु सत्सु एवं ग्रहगुणगणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ अद्येहइह जन्मनि जन्मान्तरे बाल्य-यौवन-पौगण्ड-वार्धक्यादिषु ज्ञाता-ज्ञात-महापातको-पपातकादि-संचितपापानां ब्रह्महनन-सुरापान-सुवर्णस्तेय-गुरुतल्प-गमनादि-पापानां रस-कन्या-हय-खरोष्ट्र-दास-अजादिपशु-स्वगृह-जलचरादि-स्थलचरादि-जन्तुविक्रयदोषाणां, देवस्व-ब्रह्मस्व-राजस्व-हरणदोषाणां ब्रह्मणनिन्दा-गुरुनिन्दा-वेदनिन्दा-शास्त्रनिन्दादिदोषाणां, भाक्षा-भक्ष-भोज्या-भोज्य-चोष्या-चोष्य-स्पृश्या-स्पृश्यादिदोषाणां, मतृ-पितृ-स्त्री-तिरस्कारजनितदोषाणां च निवारणपूर्वकं,अस्माकं परिवारस्य सर्वविधरोग-निवारणाय,गृहक्लेशनाशाय, वैचारिकमेलनाय, बलबुद्धिविद्यालाभाय, क्लेशहरणाय, अकालमृत्युहरणाय, चौरभयराजभय-निवृत्तये, विद्याबुद्धिप्राप्तये, उच्चपदे सर्वकारीय-उद्योगलाभाय, अष्टलक्ष्मी-गृहलक्ष्मी-वैभवलक्ष्म्याः प्राप्तये,  दशदिशानां बंधननाशाय, जन्मकुण्डल्यां वर्षकुण्डल्यां चतुर्थ-अष्टम-द्वादशस्थानस्थिताः अशुभग्रहास्तैः संसूचितं संसूचयिष्यमाणं यत् सर्वारिष्टं तद्विनाशद्वारा एकादशस्थानस्थितवत् शुभफलप्राप्तये, आदित्यादि-नवग्रहानुकूलतासिद्ध्यर्थं, इन्द्रादिदशदिक्पालदेवताप्रशन्नतार्थं, आधिदैविका-धिभौतकाऽऽध्यात्मिकत्रिविध-तापोपशमनार्थं, श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्तये, शक्तिभक्तिप्राप्तये, पुत्रपौत्रादिसन्तत्यविच्छिन्नवृद्ध्यर्थं, अस्मत्-पितॄणां मुक्तये, जगन्नियामकस्य अखण्डकोटिब्रह्माण्डनायकस्य नारायणस्य अतुलकृपाकटाक्षेण सदा सर्वदा अक्ष्य्यंदीर्घायुःप्रचुरधनव्यापारलाभाय कृतस्य सुकर्मणः शीघ्रफलावाप्तये  गोत्रोत्पन्नैः............. ब्राह्मणैः ..(अमुक)... कर्म अहं करिष्ये अथवा ब्राह्मणद्वारा कारयिष्ये। तदङ्गत्वेन गौर्यादिदेवानाञ्च पूजनं करिष्ये।

श्री विष्णु विजय स्तोत्रम् shri vishnu vijay stotram hindi translation पद्म पुराणोक्त विष्णु विजय स्तोत्र हिन्दी व्याख्या

shri vishnu vijay stotram hindie translation श्री विष्णु विजय स्तोत्रम् shri vishnu vijay stotram hindie translation विष्णु विजय स्तोत्र हिन...