करवाचौथ शब्द संस्कृतके करकचतुर्थी शब्दका अपभ्रंश लगता है। किन्तु करवाचौथ के अवसर पर पूजी जाने वाली माता करकचतुर्थीके गणेशसे भिन्न है। क्योंकि प्राय सभी चतुर्थी तिथियाँ गणेशजीको समर्पित हैं। यद्यपि यह किसी महर्षि समर्थित पुराणोपपुराणका विषय नहीं फिर भी यह छद्म तथा धर्मविनाशक है ऐसा नहीं समझा जा सकता। जैसे वेदके पश्चाद् उपनिषद् आये इनके विस्तारका श्रेय क्षत्रीयोंको जाता है। जैसे कुछ दशक पूर्व तक सत्यनारायण व्रतकथा का मूल अज्ञात था,कुछ हद तक अब भी मूल पुराणमें अप्राप्त है। पर विस्तार संपूर्ण भारतवर्षमें वैसे ही यह व्रत भी करकचतुर्थीका विस्तार है।ऐसा अनेकोंका मत है। करवाचौथ की एक कथा इसे महाभारतकाल तक ले जाती है। जिसमें कहा गया है कि अर्जुनके तपके लिए जानेके बाद व्यथित द्रौपदीने इस व्रतको किया। अब यह प्रसंग महाभारतमें हुबहू ऐसा मिलना कठिन है । कुछ अन्तरके साथ मिलने वाले व्रतोंको इसका मूल मानाजाये तो ऐसा संभव है कि महाभारत वर्णित अनेक व्रतोंमे से एक हो। किन्तु कोई भी ग्रन्थ पुस्तक या लेखमें इसके संस्कृत पाठको पाना दुस्कर कार्य है। यदि हम मान भी लें कि करवाचौथ जैसे कहा जाता है वैसे महाभारतकालका है और इस व्रतको माँ पार्वतीने पहले किया था फिर कृष्णके कहने से द्रौपदीने किया। किन्तु समस्या करवा शब्द और करवा देवीसे होती है। देवीके अनेकरूप हैं इसलिए करवा भी देवीका ही एक स्वरूप है ऐसा मानकर समाधान करभी लें तो भी प्रश्न अविचल खाडा रहता है कि इसे किस ग्रन्थ मे या किस शास्त्रमें परिभाषित किया है? अब कहने वाले इसे आधुनिक मीडियाके प्रभावसे विकृत मानते हैं। इस कथनमे मेरी दृष्टि में कोई अतिशयोक्ति नहीं लगती। क्योंकि जैसे विवाहके सप्तपदीको मीडियाने ऐसा दुष्प्रचार किया कि आज सप्तपदी सातफेरेका रूप धाण करचुका है। जबकि शास्त्रसम्मत चार ही फेरे होने चाहिए। फेरे या परिक्रमा भिन्न है, तथा सप्तपदी और वचन अलग विषय है। इस विषयको आधुनिक मिडियाके प्रभावसे ग्रस्त दुनियाके लोग समझते ही नहीं बल्कि विवाहमें कोइ पण्डित चार फेरे लगवालेगा तो वीडियो बनाने वाला यह कहता है पंडितजी सात करवाओ नहीं तो ये तुम्हें तो दक्षिणा देकर विदाई करेंगे लेकिन हमें दिहाडी भी नहीं देंगे दिहाडी लेनेके लिए दूसरेके विडीयोकोके फुटेजको जोडकर सात फेरे पूरे करने होंगे। बहुधा यही होता भी है और बहुतसे शादियों में तो यह भी सुनाई देता है कि सात फेरे न लगानेसे फलाँ की शादी टूटी और फलाँ की भाग गई। गजब लोग हैं इस देश में गजबके परंपरायें भी। जो कभी परंपराका हिस्सा न थी वो अब पूरा न होने पर घातक भी हो गई। ऐसा ही कुछ भावनात्मक रूपसे ब्लैकमेल है यह करवा चौथ भी। गाँव हो या सहर जो करवाचौथके दिन पानी भी पी ले वो पक्की कुलटा और बेवफा मानी जायेगी न! अब देखा देखीके इस भेडचालके गणितको फिल्म और मीडिया वाले भुनाने में तो माहिर होते ही हैं। अब तो पुरुष भी प्यार प्रदर्शनके इस त्यौहारमें कैसे पीछे रहे? वो भी करने लगा। खुसी ही है। क्योंकि हमारे पूर्वजों ने पुरुषके लिये कोई खास व्रत नहीं बनाये सो अब मीडियावाले अप्रोच कर रहें हैं।
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