काव्यप्रकाश के मङ्गलाचरण में प्रकाशित काव्य सौन्दर्य
वागीश्वरीके अवतार आचार्य मम्मट को जाने विना
संस्कृत काव्यशास्त्र अधुरा हो जाता है। उनके द्वारा अपने से पूर्ववर्ती समस्त
आचार्यों द्वारा उपनिबद्ध अगाध काव्यशास्त्र को मथकर साररूप नवनीत जैसा ग्रन्थ
रत्न प्रदान किया गया । जो अपने आप में काव्यशास्त्रके आकाश में सूर्यके समान चमक
रहा है। आज हम उनके द्वारा प्रदत्त मङ्गलाचरणका नव्य भव्य रीति से विश्लेषण करते
हैं।
नियतिकृतनियमरहितां
ह्लादैकमयीमनन्यपरतन्त्राम्।
नवरसरुचिरां निर्मितिमादधती
भारती कवेर्जयति।।1।।
इस कारिका का अन्वय इस प्रकार कर सकते हैं -
नियतिकृतनियमरहितां
ह्लादैकमयीमनन्यपरतन्त्राम्, नवरसरुचिरां
निर्मितिमादधती कवेः भारती जयति।।1।।
नियतिकृतनियमरहितां = नियति (विधाता) के द्वारा नियमित नियमों से रहित,
ह्लादैकमयीम् = केवल आह्लाद मात्र स्वभाव वाली,
अनन्यपरतन्त्राम् = (कवि निर्मितिको छोडकर किसी) दूसरे
के अधीन न रहने वाली, नवरसरुचिरां = नौ रसों से सरसा, निर्मितिम् =
(काव्य) सृष्टिको, आदधती = धारण करने वाली, कवेः =
कवि की, भारती = वाणी (सरस्वती), जयति =
सर्वोत्कर्ष शालिनी है।
यहाँ आचार्य मम्मट एक पद्य के द्वारा अनेक अर्थों को प्रकाशित करते
हैं। प्रथमतः यह मङ्गलाचरण होने से यहाँ जयति पद से वागीश्वरीको प्रणाम किया। दूसरा
कविकी सृष्टि को विधाता ब्रह्मा द्वारा निर्मित जागतिक सृष्टि से और अधि प्राञ्जल
तथा कमनीय माना।
सर्वप्रथम हम पद्यमें आये सभी पदों को एक एक करके
विश्लेषण करते हैं
नियतिकृतनियमरहितां – नियति कहे हैं इस समस्त संसारको संचालित करने वाले नियमको। अमरकोषकारने दैवं दिष्टं भागधेयं भाग्यं स्त्री नियतिर्विधिः। कहकर भाग्य और नियति को एक माना है। यह संसार विधिके विधान से संचालित होता है। इसे नियति या भाग्य कहकर हम संबोधित करते हैं। किन्तु कवि का संसार, कवि की निर्मिति इस संसारके नियम से नहीं चलती। अपितु कवि जैसे चाहे वैसे उसे नियन्त्रित करता है। जैसे संसार में पुष्पके होने पर ही सौरभ हो सकता है, किन्तु काव्यमें कामिनी मुख भी पद्मपराग से सुवासित हो सकता है। उसी प्रकार सुगन्ध युक्त स्वर्णकमल ब्रह्मा द्वारा रचित इस संसार में होना असम्भव है, किन्तु कविनिर्मित काव्यसंसार में तो सुलभतया प्राप्त किया जा सकता है। अतः आचार्य मम्मट कहते हैं ब्रह्मा बाबाका नियम कवि सृष्ट संसार में लागू नहीं होता है।
ह्लादैकमयीम् – आह्लाद कहते हैं सुख या आनन्दको। किसी एक विषयको प्रचुरता से जहां प्रस्तुत किया हो उसे बताने के लिए मयट् प्रत्यय लगाया जाता है। मयट् लगने से एकमयी रूप हो जता है। जैसे ज्ञानमय, ध्यानमय इत्यादि। स्त्रीलिङ्ग में ज्ञानमयी वङ्मयी इत्यादि होता है। ह्लादेन एकमयी ह्लादैकमयी ऐसा समास करने पर एक मात्र आह्लादको देने वाली ऐसा अर्थ होता है। अर्थात् कविद्वारा निर्मित काव्यसंसार केवल आनन्दको प्रदान करने वाला है। ब्रह्म निर्मिति सत्व रज तथा तम ये तीन गुण से बनी होती है। सत्व गुण सुख देने वाला, रजो गुण दुःख देने वाला एवं तमो गुण मोह देने वाला होता है। अतः ब्रह्मद्वारा निर्मित संसार सुख,दुःख एवं मोह से व्याप्त है। किन्तु कवि द्वारा निर्मित सृष्टि तो सत्व मात्र के उद्रेक से निसृत होने के कारण केवल आनन्द को देने वाली होती है।* उसमें यदि दुःख आदि प्रसङ्ग आजाते हैं तो भी वह सहृदय सामाजिक को आनन्दित करने वाले ही होते हैं। इस विषय में आचार्य विश्वनाथ कहते हैं –
करुणादावपि रसे जायते यत् परं
सुखम्। सचेतसामनुभवः प्रमाणं तत्र केवलम्।
अनन्यपरतन्त्राम् – न अन्य परतन्त्रा अनन्यपरतन्त्रा जो किसी अन्य के अधीन न हो। कवि द्वारा निर्मित सृष्टि की तीसरी विशेषता है किसी के अधीन न होना। सामान्यतया ब्रह्माकी सृष्टि के लिए समवायी असमवायी तथा निमित्त कारण आवश्यक होते हैं। तेल निकालने के लिए तील की आवश्यकता ब्रह्मनिर्मिति के लिए आवश्यक है। परन्तु कविके लिए ऐसी किसी वस्तुकी आवश्यकता नहीं है। ब्रह्मनिर्मिति में पत्थर नहीं रो सकते पर कवि तो पत्थरको भी रुलादेते हैं। अपिग्रावा रोदित्यपि दलति वज्रस्य हृदयम्। इस प्रकार ब्रह्मनिर्मिति से भिन्न कविनिर्मिति कवि प्रतिभा मात्र के होने से संभव हो जाती है।
नवरसरुचिरां – नौ रसों से रसिली, कवि द्वारा रचित सृष्टि में शृङ्गार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, विभत्स, अद्भुत तथा शान्त ये नौ प्रकारके रस होते हैं। किन्तु ब्रह्मा द्वारा निर्मति संसारमें मधुर, अम्ल, कटु, कसाय तथा तिक्त ये छह रस होते हैं, जो न केवल सुस्वादु होते हैं अपितु कुछ रस तो अत्यन्त तिक्त तथा हृदय उद्वेजक भी होते हैं। किन्तु कवि निर्मिति में तो प्रत्येत रस आह्लादित करने वाला होता है। इस प्रकार कवि निर्मिति के रस न केवल संख्या में अधिक हैं अपितु आनन्द देने में भी आगे हैं। अतः आचार्य मम्मट कहते हैं ब्रह्माकी अपेक्षा कहीं अधिक उत्कृष्ट रचना करने वाली कवि भारती सर्वोत्कर्शशालिनी है।
आचार्य मम्मट द्वारा तुलना
कविः शब्द से ब्रह्म भी अर्थ होता है तथा कवि
कवनात् कवि इस व्युत्त्पत्तिसे काव्य सर्जक भी कवि हो गया। मूल में दोनो सर्जक
हैं। दोनों अपनी अपनी शक्ति के द्वारा जगत् की रचना करते हैं। ब्रह्मा नियति रूपा
शक्ति के द्वारा सृष्टि रचना में प्रयुक्त होते हैं तो वहीं कवि वागधीष्ठात्री
देवी की वैखरी शक्ति की सहायता से काव्यसंसार रचते हैं। अतः दोनों को उपान उपमेय
के रूप में लेकर आचार्य मम्मट ने गजब की चमत्कृति प्रदान की है। एक तरफ ब्रह्मा परतन्त्र
होकर ब्रह्माण्ड रचना कर रहे हैं। दूसरी ओर कवि जैसा चाहे वैसे अपने पात्रकी रचना
कर सकता है। इसलिए कहा गया है –
अपारे काव्यसंसारे कविरेकः
प्रजापतिः
।।
यथास्मै रोचते विश्वं तथैव
परिवर्तते।।
ग्रन्थारंभ में मङ्गलाचरण
किसी भी शुभ कार्यके करने से पूर्व मङ्गलाचरण करना
यह शिष्ट परंपरा है। इस आर्ष परंपरामें मङ्गलाचरण करेने से अनेक प्रकारके लाभ
बताये गये हैं। जैसे महाभाष्यकार पतञ्जली कहते हैं मङ्लादीनि मङ्गलमध्यानि
मङ्गलान्तानि शास्त्राणि प्रथन्ते। वीरपुरुषाण्यायुष्मत्पुरुषाणि च भवन्ति,
अध्येतारश्च प्रवक्तारो भवन्ति। इससे ज्ञात होता है कि मङ्लाचरण तीन प्रकार से
किया जाता है –
1.
ग्रन्थके
आदि में
2.
ग्रन्थके
मध्य में
3.
ग्रन्थके
अन्त में
फिर मङ्गलाचरण करने से फल क्या मिलता है इस बातको
बता रहे हैं –
1.
वलवीर्य
या यश बढता है।
2.
आयु-आरोग्य
बढता है।
3.
पढने
वाले की बुद्धि परिष्कृत हो जाती है, वे ज्ञानी हो जाते हैं।
इसी बातको आचार्य मम्मटने विघ्नविनाशके लिए
ग्रन्थारंभमें मङ्गलाचर करते हैं कह कर परिपुष्ट किया है। फिर प्रश्न उठता है
मङ्गलाचरण कितने प्रकारके होते हैं? इसका उत्तर है आशिर्वादात्मक, नमस्कारात्मक तथा
वस्तुनिर्देशात्मक तीन प्राकारके
मङ्गलाचरण हो सकते हैं। जहाँ कोई कवि या लेखक अपने इष्ट देव से निर्विघ्नपरिसमाप्तिका
आशिर्वाद माँगते हुए ग्रन्थ का आरंभ करें अथवा कोई कवि अपने ग्रन्थके पाठकों के
लिए आशिर्वादात्मक पद्य लिखकर ग्रन्थका आरंभ करें वैसी स्थिति में मङ्गलाचरण
आशिर्वादात्मक माना जायेगा। जिस ग्रन्थके आरंभमें कवि अपने इष्टदेवताको प्रणाम
करते हुए अविघ्नकी कामना करें उसको नमस्कारात्मक मङ्गलाचरण कहा जाता है। वस्तुनिर्देशात्मक
मङ्गलाचरण उसे कहते हैं जिसमें ग्रन्थमें वर्णन किये जाने वाले विषयोंका वर्णन
किया जाये। अब यह मम्मट विरचित मङ्गलाचरण किस कोटी में आता है यह देखते हैं। इसमें
आचार्यने कवेः भारती जयति कहकर काव्यकी अधिष्ठात्री देवी माँ भारती की
जयजयकार की है। नमः कहना जय कहना नमस्कारात्मक मङ्गलाचरण ही होता है। अतः यह पद्य
नमस्कारात्मक मङ्गलाचरण हो गया।
मङ्गलाचरण में रसकी स्थिति
प्रस्तुत मङ्गलाचरण में आचार्य अपने इष्टेदेवी
वागधिष्ठात्री के प्रति अपने अपार स्नेह भावको प्रकट किया है। अतः रतिर्देवादिविषय
व्यभिचारितथान्जितः भावः प्रोक्तः। इस नियमसे हम कह सकते हैं कि
देवविषयक रति या प्रेम जहाँ हो वहाँ भावध्वनि माना जाता है। इस मङ्गलाचरण में आचार्यकी
वाग्देवी के प्रति रति की स्पष्ट
अभिव्यक्ति प्रकट हो रही है। अतः भावध्वनि है।
मङ्गलाचरणमें अलङ्कार
इस कारिकामें आचार्य मम्मट ने ब्रह्माकी सृष्टिको उपमान
बनाया है, और कवि द्वारा निर्मित सृष्टिको उपमेय बनाया है। उपमान ब्रह्मकी
सृष्टि से उपमेय कविसृष्टि उत्कृष्ट है। जहाँ उपमान से उपमेय की आधिक्यता
का वर्णन हो वहाँ व्यतिरेक अलङ्कार होता है।
उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः।
*आह्लादैकमयीम् से अनेक आचार्य काव्यानन्द मात्रको
स्वीकार नहीं करते अपितु इसका अभिप्राय काव्य पढने से मनन चिन्तन करने से हमे
ज्ञान होता है कि राम के समान आचरण करना चाहिए रावणके समान नहीं। इस प्रकारके
उदात्त मनोवृत्तिके बन जाने से व्यक्तिके जीवनमें परिवर्तन आता है। आत्यान्तिक तथा ऐकान्तिक सुख या ब्रह्मतत्व
प्राप्ति के पश्चात् प्राप्त होने वाला सुख भी आह्लाद स्वरूप है। अतः संसारमें
रहते ब्रह्मानन्दसहोदर सुख प्राप्त करें तथा उस ब्रह्मानन्दसहोदर या ब्रह्मानन्दके
समान सुखरूप मार्गसे साक्षात् ब्रह्मानन्द सुख के मार्गकी ओर अग्रसर हों ऐसा भाव आह्लादैकमयीम् का है।
यह काव्य से संभव है। क्योंकि सामान्यतया ब्रह्मप्राप्तिके साधन प्रस्थानत्रयी सहज
बोध्य नहीं है। इसके विपरीत काव्य पठन सहज मनको बाँधने वाला अल्पज्ञ लोगोंके लिए
भी सहज गम्य है। इस प्रकार सदाचार बोधन कराने के कारण काव्य सदाचारजन्य लौकिक सुख तो प्रदान करते ही हैं, साथ साथ पारलौकिक
सुख के लिए भी मार्ग प्रसस्त करते हैं।
मङ्गलाचरणमें प्रयुक्त छन्द
काव्यप्रकाशके मङ्गलाचरणमें आचार्य मम्मटने आर्या नामक छन्द का प्रयोग किया है। आर्या छन्द मात्रिक छन्द है। इसके प्रथम पादमेें द्वादश मात्रा, द्वितीय पादमें पञ्चदश मात्रा, तृतीय पादमें अष्टादश मात्रा एवं चतुर्थपादमें द्वादश मात्रा होती हैं।
यस्याः पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेपि।
अष्टादश द्वितीये चतुर्थके पञ्चदश सार्या।।

