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मंगलवार, 17 दिसंबर 2019

काव्यप्रकाश का मङ्गलाचरण, Kavyaprakash 1 shloka


काव्यप्रकाश के मङ्गलाचरण में प्रकाशित काव्य सौन्दर्य

वागीश्वरीके अवतार आचार्य मम्मट को जाने विना संस्कृत काव्यशास्त्र अधुरा हो जाता है। उनके द्वारा अपने से पूर्ववर्ती समस्त आचार्यों द्वारा उपनिबद्ध अगाध काव्यशास्त्र को मथकर साररूप नवनीत जैसा ग्रन्थ रत्न प्रदान किया गया । जो अपने आप में काव्यशास्त्रके आकाश में सूर्यके समान चमक रहा है। आज हम उनके द्वारा प्रदत्त मङ्गलाचरणका नव्य भव्य रीति से विश्लेषण करते हैं।
नियतिकृतनियमरहितां
ह्लादैकमयीमनन्यपरतन्त्राम्।
नवरसरुचिरां निर्मितिमादधती
भारती कवेर्जयति।।1।।

इस कारिका का अन्वय इस प्रकार कर सकते हैं -
नियतिकृतनियमरहितां
ह्लादैकमयीमनन्यपरतन्त्राम्, नवरसरुचिरां निर्मितिमादधती कवेः भारती जयति।।1।।

नियतिकृतनियमरहितां = नियति (विधाता) के द्वारा नियमित नियमों से रहित, ह्लादैकमयीम् = केवल आह्लाद मात्र स्वभाव वाली, अनन्यपरतन्त्राम् = (कवि निर्मितिको छोडकर किसी) दूसरे के अधीन न रहने वाली, नवरसरुचिरां = नौ रसों से सरसा, निर्मितिम् = (काव्य) सृष्टिको, आदधती = धारण करने वाली, कवेः = कवि की, भारती = वाणी (सरस्वती), जयति = सर्वोत्कर्ष शालिनी है।
यहाँ आचार्य मम्मट  एक पद्य के द्वारा अनेक अर्थों को प्रकाशित करते हैं। प्रथमतः यह मङ्गलाचरण होने से यहाँ जयति पद से वागीश्वरीको प्रणाम किया। दूसरा कविकी सृष्टि को विधाता ब्रह्मा द्वारा निर्मित जागतिक सृष्टि से और अधि प्राञ्जल तथा कमनीय माना।

सर्वप्रथम हम पद्यमें आये सभी पदों को एक एक करके विश्लेषण करते हैं

नियतिकृतनियमरहितां नियति कहे हैं इस समस्त संसारको संचालित करने वाले नियमको। अमरकोषकारने दैवं दिष्टं भागधेयं भाग्यं स्त्री नियतिर्विधिः। कहकर भाग्य और नियति को एक माना है। यह संसार विधिके विधान से संचालित होता है। इसे नियति या भाग्य कहकर हम संबोधित करते हैं। किन्तु कवि का संसार, कवि की निर्मिति इस संसारके नियम से नहीं चलती। अपितु कवि जैसे चाहे वैसे उसे नियन्त्रित करता है। जैसे संसार में पुष्पके होने पर ही सौरभ हो सकता है, किन्तु काव्यमें कामिनी मुख भी पद्मपराग से सुवासित हो सकता है। उसी प्रकार सुगन्ध युक्त स्वर्णकमल ब्रह्मा द्वारा रचित इस संसार में होना असम्भव है, किन्तु कविनिर्मित काव्यसंसार में तो सुलभतया प्राप्त किया जा सकता है। अतः आचार्य मम्मट कहते हैं ब्रह्मा बाबाका नियम कवि सृष्ट संसार में लागू नहीं होता है।

ह्लादैकमयीम् आह्लाद कहते हैं सुख या आनन्दको। किसी एक विषयको प्रचुरता से जहां प्रस्तुत किया हो उसे बताने के लिए मयट् प्रत्यय लगाया जाता है। मयट् लगने से एकमयी रूप हो जता है। जैसे ज्ञानमय, ध्यानमय इत्यादि। स्त्रीलिङ्ग में ज्ञानमयी वङ्मयी इत्यादि होता है। ह्लादेन एकमयी ह्लादैकमयी ऐसा समास करने पर एक मात्र आह्लादको देने वाली ऐसा अर्थ होता है। अर्थात् कविद्वारा निर्मित काव्यसंसार केवल आनन्दको प्रदान करने वाला है। ब्रह्म निर्मिति सत्व रज तथा तम ये तीन गुण से बनी होती है। सत्व गुण सुख देने वाला, रजो गुण दुःख देने वाला एवं तमो गुण मोह देने वाला होता है। अतः ब्रह्मद्वारा निर्मित संसार सुख,दुःख एवं मोह से व्याप्त है।  किन्तु कवि द्वारा निर्मित सृष्टि तो सत्व मात्र के उद्रेक से निसृत होने के कारण केवल आनन्द को देने वाली होती है।* उसमें यदि दुःख आदि प्रसङ्ग आजाते हैं तो भी वह सहृदय सामाजिक को आनन्दित करने वाले ही होते हैं। इस विषय में आचार्य विश्वनाथ कहते हैं –

करुणादावपि रसे जायते यत् परं सुखम्। सचेतसामनुभवः प्रमाणं तत्र केवलम्।  

अनन्यपरतन्त्राम् न अन्य परतन्त्रा अनन्यपरतन्त्रा जो किसी अन्य के अधीन न हो। कवि द्वारा निर्मित सृष्टि की तीसरी विशेषता है किसी के अधीन न होना। सामान्यतया ब्रह्माकी सृष्टि के लिए समवायी असमवायी तथा निमित्त कारण आवश्यक होते हैं। तेल निकालने के लिए तील की आवश्यकता ब्रह्मनिर्मिति के लिए आवश्यक है। परन्तु कविके लिए ऐसी किसी वस्तुकी आवश्यकता नहीं है। ब्रह्मनिर्मिति में पत्थर नहीं रो सकते पर कवि तो पत्थरको भी रुलादेते हैं। अपिग्रावा रोदित्यपि दलति वज्रस्य हृदयम्।  इस प्रकार ब्रह्मनिर्मिति से भिन्न कविनिर्मिति कवि प्रतिभा मात्र के होने से संभव हो जाती है। 

नवरसरुचिरां नौ रसों से रसिली, कवि द्वारा रचित सृष्टि में  शृङ्गार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, विभत्स, अद्भुत तथा शान्त ये नौ प्रकारके रस होते हैं। किन्तु ब्रह्मा द्वारा निर्मति संसारमें मधुर, अम्ल, कटु, कसाय तथा तिक्त ये छह रस होते हैं, जो न केवल सुस्वादु होते हैं अपितु कुछ रस तो अत्यन्त तिक्त तथा हृदय उद्वेजक भी होते हैं। किन्तु कवि निर्मिति में तो प्रत्येत रस आह्लादित करने वाला होता है। इस प्रकार कवि निर्मिति के रस न केवल संख्या में अधिक हैं अपितु आनन्द देने में भी आगे हैं।  अतः आचार्य मम्मट कहते हैं ब्रह्माकी अपेक्षा कहीं अधिक उत्कृष्ट रचना करने वाली कवि भारती सर्वोत्कर्शशालिनी है।

आचार्य मम्मट द्वारा तुलना

कविः शब्द से ब्रह्म भी अर्थ होता है तथा कवि कवनात् कवि इस व्युत्त्पत्तिसे काव्य सर्जक भी कवि हो गया। मूल में दोनो सर्जक हैं। दोनों अपनी अपनी शक्ति के द्वारा जगत् की रचना करते हैं। ब्रह्मा नियति रूपा शक्ति के द्वारा सृष्टि रचना में प्रयुक्त होते हैं तो वहीं कवि वागधीष्ठात्री देवी की वैखरी शक्ति की सहायता से काव्यसंसार रचते हैं। अतः दोनों को उपान उपमेय के रूप में लेकर आचार्य मम्मट ने गजब की चमत्कृति प्रदान की है। एक तरफ ब्रह्मा परतन्त्र होकर ब्रह्माण्ड रचना कर रहे हैं। दूसरी ओर कवि जैसा चाहे वैसे अपने पात्रकी रचना कर सकता है। इसलिए कहा गया है –
अपारे काव्यसंसारे कविरेकः प्रजापतिः ।।
यथास्मै रोचते विश्वं तथैव परिवर्तते।।


काव्यप्रकाश का मङ्गलाचरण, Kavyaprakash 1 shloka

ग्रन्थारंभ में मङ्गलाचरण

किसी भी शुभ कार्यके करने से पूर्व मङ्गलाचरण करना यह शिष्ट परंपरा है। इस आर्ष परंपरामें मङ्गलाचरण करेने से अनेक प्रकारके लाभ बताये गये हैं। जैसे महाभाष्यकार पतञ्जली कहते हैं मङ्लादीनि मङ्गलमध्यानि मङ्गलान्तानि शास्त्राणि प्रथन्ते। वीरपुरुषाण्यायुष्मत्पुरुषाणि च भवन्ति, अध्येतारश्च प्रवक्तारो भवन्ति। इससे ज्ञात होता है कि मङ्लाचरण तीन प्रकार से किया जाता है –
1.   ग्रन्थके आदि में
2.   ग्रन्थके मध्य में
3.   ग्रन्थके अन्त में
फिर मङ्गलाचरण करने से फल क्या मिलता है इस बातको बता रहे हैं –
1.   वलवीर्य या यश बढता है।
2.   आयु-आरोग्य बढता है।
3.   पढने वाले की बुद्धि परिष्कृत हो जाती है, वे ज्ञानी हो जाते हैं।
इसी बातको आचार्य मम्मटने विघ्नविनाशके लिए ग्रन्थारंभमें मङ्गलाचर करते हैं कह कर परिपुष्ट किया है। फिर प्रश्न उठता है मङ्गलाचरण कितने प्रकारके होते हैं? इसका उत्तर है आशिर्वादात्मक, नमस्कारात्मक तथा वस्तुनिर्देशात्मक  तीन प्राकारके मङ्गलाचरण हो सकते हैं। जहाँ कोई कवि या लेखक अपने इष्ट देव से निर्विघ्नपरिसमाप्तिका आशिर्वाद माँगते हुए ग्रन्थ का आरंभ करें अथवा कोई कवि अपने ग्रन्थके पाठकों के लिए आशिर्वादात्मक पद्य लिखकर ग्रन्थका आरंभ करें वैसी स्थिति में मङ्गलाचरण आशिर्वादात्मक माना जायेगा। जिस ग्रन्थके आरंभमें कवि अपने इष्टदेवताको प्रणाम करते हुए अविघ्नकी कामना करें उसको नमस्कारात्मक मङ्गलाचरण कहा जाता है। वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गलाचरण उसे कहते हैं जिसमें ग्रन्थमें वर्णन किये जाने वाले विषयोंका वर्णन किया जाये। अब यह मम्मट विरचित मङ्गलाचरण किस कोटी में आता है यह देखते हैं। इसमें आचार्यने कवेः भारती जयति कहकर काव्यकी अधिष्ठात्री देवी माँ भारती की जयजयकार की है। नमः कहना जय कहना नमस्कारात्मक मङ्गलाचरण ही होता है। अतः यह पद्य नमस्कारात्मक मङ्गलाचरण हो गया।

मङ्गलाचरण में रसकी स्थिति

प्रस्तुत मङ्गलाचरण में आचार्य अपने इष्टेदेवी वागधिष्ठात्री के प्रति अपने अपार स्नेह भावको प्रकट किया है। अतः रतिर्देवादिविषय व्यभिचारितथान्जितः भावः प्रोक्तः। इस नियमसे हम कह सकते हैं कि देवविषयक रति या प्रेम जहाँ हो वहाँ भावध्वनि माना जाता है। इस मङ्गलाचरण में आचार्यकी  वाग्देवी के प्रति रति की स्पष्ट अभिव्यक्ति प्रकट हो रही है। अतः  भावध्वनि है।

मङ्गलाचरणमें अलङ्कार

इस कारिकामें आचार्य मम्मट ने ब्रह्माकी सृष्टिको उपमान बनाया है, और कवि द्वारा निर्मित सृष्टिको उपमेय बनाया है। उपमान ब्रह्मकी सृष्टि से उपमेय कविसृष्टि उत्कृष्ट है। जहाँ उपमान से उपमेय की आधिक्यता का वर्णन हो वहाँ व्यतिरेक अलङ्कार होता है। 
उपमानाद् यदन्यस्य व्यतिरेकः स एव सः

*आह्लादैकमयीम् से अनेक आचार्य काव्यानन्द मात्रको स्वीकार नहीं करते अपितु इसका अभिप्राय काव्य पढने से मनन चिन्तन करने से हमे ज्ञान होता है कि राम के समान आचरण करना चाहिए रावणके समान नहीं। इस प्रकारके उदात्त मनोवृत्तिके बन जाने से व्यक्तिके जीवनमें परिवर्तन आता है।  आत्यान्तिक तथा ऐकान्तिक सुख या ब्रह्मतत्व प्राप्ति के पश्चात् प्राप्त होने वाला सुख भी आह्लाद स्वरूप है। अतः संसारमें रहते ब्रह्मानन्दसहोदर सुख प्राप्त करें तथा उस ब्रह्मानन्दसहोदर या ब्रह्मानन्दके समान सुखरूप मार्गसे साक्षात् ब्रह्मानन्द सुख के मार्गकी ओर  अग्रसर हों ऐसा भाव आह्लादैकमयीम् का है। यह काव्य से संभव है। क्योंकि सामान्यतया ब्रह्मप्राप्तिके साधन प्रस्थानत्रयी सहज बोध्य नहीं है। इसके विपरीत काव्य पठन सहज मनको बाँधने वाला अल्पज्ञ लोगोंके लिए भी सहज गम्य है। इस प्रकार सदाचार बोधन कराने के कारण काव्य सदाचारजन्य लौकिक  सुख तो प्रदान करते ही हैं, साथ साथ पारलौकिक सुख के लिए भी मार्ग प्रसस्त करते हैं।

मङ्गलाचरणमें प्रयुक्त छन्द 

काव्यप्रकाशके मङ्गलाचरणमें आचार्य मम्मटने आर्या नामक छन्द का प्रयोग किया है। आर्या छन्द मात्रिक छन्द है। इसके प्रथम पादमेें द्वादश मात्रा, द्वितीय पादमें पञ्चदश मात्रा, तृतीय पादमें अष्टादश मात्रा एवं चतुर्थपादमें द्वादश मात्रा होती हैं। 
यस्याः पादे प्रथमे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेपि।
अष्टादश द्वितीये चतुर्थके पञ्चदश सार्या।। 

रविवार, 8 दिसंबर 2019

सर्प सूक्त / कालसर्प शान्ति के लिए स्तोत्र /Sarpa suktam in hindi

ब्रह्मलोकेषु ये सर्पा: शेषनागपुरोगमा: ।।
नमोSस्तु तेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।। 1।।

इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: वासु‍कि प्रमुखास्तथा।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।2।।

कद्रवेयश्च ये सर्पा: मातृभक्ति परायणा:।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।3।।

इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: तक्षका प्रमुखास्तथा।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।4।।

सत्यलोकेषु ये सर्पा: वासुकिना च रक्षिता।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।5।।

मलये चैव ये सर्पा: कर्कोटक प्रमुखास्तथा।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।6।।

पृथिव्यां चैव ये सर्पा: ये च साकेत वासिन:।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।7।।

सर्वग्रामेषु ये सर्पा: वसंतिषु संच्छिता।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।8।।

ग्रामे वा यदि वारण्ये ये सर्पा: प्रचरन्ति च।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।9।।

समुद्रतीरे च ये सर्पा: ये सर्पा जलवासिन:।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।10।।

रसातलेषु ये सर्पा: अनन्तादि महाबला:।
नमोSस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा।।11।।

सोमवार, 4 नवंबर 2019

दस महाविद्या गायत्री मंत्र


काली अथवा आद्या गायत्री –

1.   कालिकायै च विद्महे श्मशानवासिन्यै च धीमहि तन्नो घोरे प्रचोदयात्।

गायत्री का कम से कम  दस जप करने से महापातकी भी मुक्त होता है।
इस गायत्रीके जप तथा पुरश्चरण करने से रामको रावण वध से जो ब्रह्महत्या लगा था वह कट गया।
परशुराम इसी गायत्रीके जप से मातृवध से मुक्त हुए।
सुरापानसे श्रीकृष्णको जो ब्रह्महत्या लगा था, इसी गायत्रीके जपसे समाप्त हुआ।
ब्राह्मणशिरच्छेदनके दोष से रुद्रभगवान मुक्त हुए।

तारा महाविद्या की गायत्री –

2.   तारयै च विद्महे महोग्रायै च धीमहि तन्नो देवि प्रचोदयात्।

छिन्नमस्ता (छिन्ना) की गायत्री –

3.   वैरोचन्यै च विद्महे छिन्नमस्तायै च धीमहि तन्नो देवि प्रचोदयात्।

त्रिपुरसुन्दरी गायत्री –

4.   त्रिपुरादेव्यै च विद्महे क्लीं कामेश्वर्यै च धीमहि तन्नो क्लिन्ने प्रचोदयात्।

भैरवी की गायत्री –

5.   त्रिपुरायै च विद्महे भैरव्यै च धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्।

कमला गायत्री –

6.   महालक्ष्म्यै च विद्महे महाश्रियै च धीमहि तन्नो श्रीः प्रचोदयात्।

भुवनेश्वरी गायत्री –

7.   मायाबीजभुवनेश्वर्यै च विद्महे आद्यायै च धीमहि तन्नो देवि प्रचोदयात्।

मातङ्गा गायत्री –

8.   शुकप्रियायै विद्महे श्रीकामेश्वर्यै धीमहि। तन्नः श्यामा प्रचोदयात्।

धूमावती गायत्री –

9.   धूंधमावत्यै च विद्महे विवर्णादेव्यै च धीमहि तन्नो घोरे प्रचोदयात्।

बगलामुखी गायत्री –

10.   स्थिरमायाबगलायै च विद्महे दुष्टस्तम्भिन्यै च धीमहि तन्नो देवि प्रचोदयात्।


गुरुवार, 31 अक्टूबर 2019

त्रैलोक्य मोहन गणपति मन्त्र

त्रैलोक्यमोहनगणपति मन्त्र –
 यह मन्त्र तीनों लोकोंके समस्त प्राणी को सम्मोहित करके अपने वशमें करने वाला मन्त्र है। 
ॐ वक्रतुण्डैकदंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते वरद वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।

विस्तृत पूजन तथा प्रयोग निचे दिया जा रहा है -


त्रैलोक्यमोहनगणपति मन्त्र –  यह मन्त्र तीनों लोकोंके समस्त प्राणी को सम्मोहित करके अपने वशमें करने वाला मन्त्र है। पुष्टिकर मन्त्र होने के कारण अनुष्ठानमें त्रुटि रहने पर साधकके लिए मारक नहीं है।  
ॐ वक्रतुण्डैकदंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते वरद वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।
इस मन्त्रसाधनाके लिए सर्वप्रथम आसन शुद्धि करना चाहिए। शुद्ध भावसे नित्यक्रिया से निवृत्त होकर गणेशजीके पूजनके लिए अभीष्ट सामग्रीको लेकर रक्तासनमें बैठ जाना चाहिए। विधिवत् आचमन एवं प्रणायाम के द्वारा शरीर शुद्धि करके, दीपप्रज्वलन करें। पुरश्चरणके लिए प्रयाश्चित्त तथा संकल्प करें। प्रत्येक मन्त्रकी साधना सिद्धिका अंग होती है। साधनाके द्वारा सिद्धि प्राप्त होती है। फिर किसी विशेष कार्यकी प्राप्तिके लिए पुनः ससंकल्प जप किया जाता है। अतः साधक पहले मन्त्रद्वारा स्वयं में मन्त्रकी सिद्धि प्राप्त करता है। इस पूजन में
*    सर्वप्रथम भगवान गणेशका ध्यान करें।
*    मानसोपचार से पूजन करें।
*    अर्घ्य स्थापित करें।
*    फिर एक चौकी पर लाल वस्त्रका आसन रखकर उसपर पञ्च आवरण वाला यन्त्र निर्माण करें।
*    यन्त्र की रूपरेखा निम्न प्रकार से है –

त्रैलोक्य मोहन गणपति मन्त्र

*  
  यन्त्रके आठों दिशाओं में निम्न मन्त्रसे पूजन करें
(यन्त्रके पूर्व भाग से पूजन आरंभ करें।)
ॐ तीव्रायै नमः इति पूर्वदिशि।
ॐ चालिन्यै नमः इति आग्नेयकोणे।
ॐ नन्दायै नमः इति दक्षिणदिशि।
ॐ भोगदायै नमः इति नैऋत्यकोणे।
ॐ कामरूपिण्यै नमः इति पश्चिमदिशि।
ॐ उग्रायै नमः इति वायव्यकोणे।
ॐ तेजोवत्यै नमः इति उत्तरदिशि।
ॐ सत्यायै नमः इति ईशान्यकोणे।

इस प्रकार पूजन कर मध्य में विघ्नविनाशिन्यै नमः एवं ॐ सर्वशक्तिकमलासनाय नमः इस मन्त्रसे आसन देकर मूल मन्त्र से गणेशजी की मूर्ति की कल्पना करें (काम्य प्रयोग के योग्य न होने तक मूर्ति स्थापित नहीं करना है)। फिर उसमें गणेशजी का ध्यान करें। ॐ श्री त्रैलोक्यमोहन गणपतये नमः इस मन्त्रसे अथवा पुरे मूल मंत्रसे आवाहन आसन पाद्य अर्घ्य इत्यादि समस्त उपचारोंसे पूजन करें।
अब उसी यन्त्रमें क्रमशः पाँच आवरणकी पूजा करें –
प्रथम आवरण पूजा –
ॐ गां हृदयाय नमः आग्नेय दिशामें पूजन करें।
 ॐ गीं शिरसे स्वाहा नैऋत्य दिशामें पूजन करें।
ॐ गूं शिखायै वषट् वायव्य दिशामें पूजन करें।
ॐ गैं कवचाय हुम् ईशान्य दिशामें पूजन करें।
ॐ गौं नेत्रत्रयाय वौषट् अग्र भाग में पूजन करें।
ॐ गः अस्त्राय फट् चारों दिशाओं में पूजन करें।
ऐसे पूजन करनेके पश्चाद् मूल मन्त्रका (अर्थात् इस विहित कर्म के लिये प्रयुक्त ॐ वक्रतुण्डैकदंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते वरद वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा । )
 उच्चारण करें और –
अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम्।।
ऐसा कहकर पुष्पाञ्जली समर्पित करें।
फिर यन्त्रके अन्दर निम्न मन्त्र से द्वितीय आवरण पूजन करें –
ॐ विद्यायै नमः कहकर पूर्व दिशामें पूजन करें।
ॐ विधात्र्यै नमः कहकर आग्नेय दिशामें पूजन करें।
ॐ भोगदायै नमः कहकर पूर्व दक्षिण दिशा में पूजन करें।
ॐ विघ्नघातिन्यै नमः कहकर नैऋत्य दिशामें पूजन करें।
ॐ निधि-प्रदीपायै नमः कहकर पश्चिम दिशामें पूजन करें।
ॐ पापघ्न्यै नमः कहकर वायव्य दिशामें पूजन करें।
ॐ पुण्यायै नमः कहकर उत्तर दिशामें पूजन करें।
ॐ शशिप्रभायै नमः कहकर ईशान्य दिशामें पूजन करें।
ऐसे पूजन करनेके पश्चाद् मूल मन्त्रका उच्चारण करें और –
अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं द्वितीयावरणार्चनम्।।
ऐसा कहकर पुष्पाञ्जली समर्पित करें।
तदनन्तर यन्त्रके अष्टदलकमल में निम्न मन्त्रसे तृतीय आवरण पूजन करें –
ॐ वक्रतुण्डाय नमः।
ॐ एकद्रंष्ट्राय नमः।
ॐ महोदराय नमः।
ॐ गजास्याय नमः।
ॐ लम्बोदराय नमः।
ॐ विकटाय नमः।
ॐ विघ्नराजाय नमः।
ॐ धुम्रवर्णाय नमः।
ऐसे पूजन करनेके पश्चाद् मूल मन्त्रका उच्चारण करें और –
अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं तृतीयावरणार्चनम्।।
ऐसा कहकर पुष्पाञ्जली समर्पित करें।
अब पुनः यन्त्रके अष्टदलकमल के अग्रभाग में निम्न मन्त्रसे चतुर्थ आवरण में दशदिक्पालोंका पूजन करें –
ॐ इन्द्राय नमः इस मन्त्रसे पूर्व दिशा में पूजन करें।
ॐ अग्नये नमः इस मन्त्रसे अग्नि कोण में पूजन करें।
ॐ यमाय नमः इस मन्त्रसे दक्षिण दिशा में पूजन करें।
ॐ निर्ऋतये नमः इस मन्त्रसे नैऋत्य कोण में पूजन करें।
ॐ वरुणाय नमः इस मन्त्रसे पश्चिम दिशा में पूजन करें।
ॐ वायवे नमः इस मन्त्रसे वायव्य कोण में पूजन करें।
ॐ सोमाय नमः इस मन्त्रसे उत्तर दिशा में पूजन करें।
ॐ ईशानाय नमः इस मन्त्रसे ईशान्य कोण में पूजन करें।
ॐ ब्रह्मणे नमः इस मन्त्रसे आकाश की पूजन करें।
ॐ अनन्ताय नमः इस मन्त्रसे पाताल की पूजन करें।
अब मूल मंत्रके साथ
अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं चतुर्था-वरणार्चनम्।।
ऐसा कहकर पुष्पाञ्जली समर्पित करें।
यन्त्रके अष्टदलकमल के अग्रभाग के अन्त में निम्न मन्त्रसे पञ्चम आवरण पूजन करें –
ॐ वज्राय नमः।
ॐ शक्तये नमः।
ॐ दण्डाय नमः।
ॐ खड्गाय नमः।
ॐ पाशाय नमः।
ॐ अङ्कुशाय नमः।
ॐ गदायै नमः।
ॐ त्रिशूलाय नमः।
ॐ चक्राय नमः।
ॐ पद्माय नमः।
ऐसे पूजन करनेके पश्चाद् मूल मन्त्रका उच्चारण करें और –
अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं पंचमा-वरणार्चनम्।।
ऐसा कहकर पुष्पाञ्जली समर्पित करें।
धूपदीपनैवेद्य समर्पित करें।
तदनन्तर इस क्रियाके लिए विनियोग करें –
अस्य श्रीत्रैलोक्यमोहनमन्त्रस्य गणकऋषिः गायत्री छन्दो भक्तेष्टसिद्धिदायकत्रैलोक्यमोहनकारको गणपतिर्देवता आत्मनोऽभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।
अब षडङ्ग न्यास करें –
वक्रतुण्डैकदंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं हृदयाय नमः (हृदयका स्पर्श)
गणपते शिरसे स्वाहा (मस्तकका स्पर्श)
वरवरद शिखायै वषट् (शिखाका स्पर्श)
सर्वजनं कवचाय हुम् (दोनों हाथोंसे कवच बनाते हुए भुजाओंका स्पर्श)
 मे वशमानय नेत्रत्रयाय वौषट् (तीनों नेत्रका स्पर्श)
स्वाहा अस्त्राय फट् (शिरके उपरसे दक्षिण हस्तको घुमाते हुए तालिका वादन)
अब त्रैलोक्यमोहन गणपतिका ध्यान करें –


गदाबीजपूरे धनुः शूलचक्रे
सरोजोत्पले पाशधान्याग्रदन्तान्।
करैः सन्दधानं स्वशुण्डाग्रराजन्
मणीकुम्भमङ्काधिरूढं स्वपत्न्या।।
सरोजन्मनाभूषणानाम्भरेणो-
ज्ज्वलद्धस्ततन्व्यासमालिङ्गिताङ्गम्।
करीन्द्राननं चन्द्रचूडं त्रिनेत्रं
जगन्मोहनं रक्तकान्तिं भजेत्तम्।।
हे भगवन् आपके दाहिने हाथों में क्रमशः गदा, बीजपूर, शूल, चक्र तथा पद्म विराजते हैं। बायें हाथों में धनुष, उत्पल, पाश धान्यमञ्जरी, एवं दन्त धारण किया है। आपके शुण्डाग्रभागमें मणिकलश सुशोभित हो रहा है। आपके पार्श्व भाग में सुशोभित श्री अङ्ग वाली, कमल एवं आभूषणों से जगमगाती हुई उज्ज्वल वर्ण वाली पत्नी विराजती हैं। अतः आप प्रियासे आलिङ्गित हो। ऐसे त्रिनेत्र धारी, हाथीके समान मुख वाले, सिर पर चन्द्रकला धारण किये हुए, तीनों लोकों को मोहित करने वाले, रक्त कान्तिसे युक्त श्री गणेश जी का मैं ध्यान करता हूँ।
अब विधि पूर्वक गणेशजीका जप प्रारंभ करें। ॐ वक्रतुण्डैकदंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते वरद वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।
इस मन्त्रका चारलाख जप करने के पश्चात् पुरश्चरण हो जाता है। पुरश्चरणके पश्चात् जपका दशांश हवन करना चाहिए। अर्थात् चालिहजार मन्त्रसे हवन। पुनः हवनके दशांश का तर्पण अर्थात् चारहजार माला से तर्पण किया जाना चाहिए । तर्पणमें पूर्णमंत्रके उच्चारणके पश्चात् तर्पयामि। उच्चारण किया जाता है। तर्पणके दशांश से अर्थात् चार माला मन्त्र उच्चारण के साथ तर्पित जलसे स्वयंका भगवान गणेश भावसे मार्जन किया जाता है। इसका दशांश ब्रह्मण भोजन कराने के पश्चात् कर्मको पूर्ण माना जाता है। अब साधक काम्य प्रयोग अर्थात् अभीष्ट सिद्धि के लिये इस मन्त्रका उपयोग कर सकता है। अगूठेके बराबर की गणेश मूर्ति को यन्त्रके मध्य भागमें रखकर किया जाता है।
हवन के लिए विशिष्ट सामग्री की आवश्यकता होती है जो निम्न प्रकार के हैं
ईख
सत्तू
केला
चिउडा
तिल
मोदक
नारियल
धानका लावा
ये आठ द्रव्य अन्य हवनीय द्रव्यके साथ विशेष रूप से प्रयुक्त किया जाता है।
काम्य प्रयोग में पीपल, उदुम्बर, प्लक्ष, वट आदि की समिधायें एवं मुनक्का, सुवर्ण, गो दुग्ध, दधि मिश्रित चरु, घी इत्यादि से हवन किया जाता है।

 साद हरिशरणम्

शनिवार, 26 अक्टूबर 2019

धन प्राप्ति मंत्र, कनकधारा स्तोत्र मूल संस्कृत

अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती
भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।
अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला
माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥१॥

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥२॥

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम्
आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्
इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥३॥

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम्
आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् ।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥४॥

 बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥५॥

प्राप्तं पदम प्रथमत: खलु यत्प्रभावात्
माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षार्धं
मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।।६।।

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्ष-
मानन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोपि ।
ईशन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्ध-
मिन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिराया: ।।७।।

इष्टाविशिष्टमतयोपि यया दयार्द्र-
दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते।
दृष्टि: प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां
पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टराया: ।।८।।

दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारां
अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं
नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाह:।।९।।

गीर्देवतेति गरुडध्वजसन्दरीति
शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै
तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ।।१०।।

श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै
रत्यै नमोस्तु रमणीयगुणार्णवायै।
शक्त्यै नमोस्तु शतपत्रनिकेतनायै
पुष्ट्यै नमोस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै।।११।।

नमोस्तु नालीकनिभाननायै
नमोस्तु दग्धोदधिजन्मभूत्यै ।
नमोस्तु सोमामृतसोदरायै
नमोस्तु नारायणवल्लभायै।।१२।।

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि
साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाणि।
त्वद्वन्दनानि दुरितोद्धरणोद्यतानि
मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ।।१३।।

यत्कटाक्षसमुपासनविधि:
सेवकस्य सकलार्थसम्पद: ।
संतनोति वचनाङ्गमानसैस्-
त्वां मुरारीहृदयेश्वरीं भजे ।।१४।।

सरसिजनिलये सरोजहस्ते
धवलतमांशुकमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ।।१५।।

दिघ्घस्तिभि: कनककुम्भमुखावसृष्ट
स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम्।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष-
लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम्।।१६।।

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं
करुणापूरतरतरङ्गितैरपाङ्गै:।
अवलोकय मामकिञ्चनानां
प्रथमं पात्रमकृतिमं दयाया: ।।१७।।

स्तुन्वन्ति ये स्तुतिभिरमीभिरन्वहं
त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् ।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभामिनो
भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशया: ।।१८।। 

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