वाच्यसिद्ध्यङ्ग व्यङ्ग्य (गुणीभूतका तृतीय भेद)
गुणीभूत व्यङ्ग्यके तृतीय भेद वाच्यसिद्ध्यङ्गम् का लक्षण तथा उदाहरण देते हैं।
वाच्यसिद्ध्यङ्गम्
अर्थात् जहाँ पर व्यङ्ग्य अर्थ वाच्यकी सिद्धिका अङ्ग बनजाये या व्यङ्ग्यार्थ वाच्य
सिद्धिके लिये उपकारक बन जाये उसे वाच्यसिद्ध्यङ्ग गुणीभूत कहा जाता है। अब हम
आचार्य मम्टके द्वारा प्रदत्त दोनो उदाहरणों को क्रमश समझते हैं।
भ्रमिमरतिमलसहृदयतां
प्रलयं मूर्छां तमः शरीरसादम्।
मरणञ्च
जलदभुजगजं प्रसह्य कुरुते विषं वियोगिनीनाम्।।
अर्थात्
मेघरूप सर्पसे उत्पन्न विष वियोगिनियों को बलपूर्वक चक्कर, बेचैनी, अलसहृदयता,
ज्ञान तथा चेष्टाका अभाव रूप प्रलय, मूर्च्छा, अन्धता, शारीरिक दुर्बलता और मरणको
उत्पन्न करता है।
यहाँ प्रयुक्त सभी पद विशेष अर्थ रखते
हैं इन्हें एक एक करके समझते हैं। भ्रमीं अर्थात् भ्रम शिर चकराना जैसा आन्तरिक विकार या मनकी अवस्था
विषम होजाना। जिसे दिग्भ्रम भी कहा जा सकता है। अरति कहते हैं विषयों के प्रति अभिलाषा का न होना। अलसहृदयता का अर्थ है मन
जिनका आलस्यसे भर गया हो या उदासीन जैसी स्थिति। प्रलय शब्दका यहाँ मानसिक चेष्टा
का नष्ट होना अर्थ लिया गया है। अर्थात् वियोगी व्यक्ति यद्यपि अपने वियोग के
विषयमें तो अवश्य चिन्तन कर रहा होता है किन्तु वह बाहरी अन्य गतिविधियों से
पूर्णतः रहित हो जता है, यही बाह्य क्रियायों से रहित हो जाना प्रलय हुआ। मूर्छा
की अवस्था में बाहर तथा अन्दर के दोनो इन्द्रियों से कार्य न करने की स्थिति में
हो जाता है। शरीरसाद हो गया देह का निरन्त ह्रस होना कृश हो जाना। मरणं का अर्थ है
मृत्यु जैसी स्थिति का उत्पन्न होना। मृत्युको यदि देखा जाये तो उत्पन्न होने के
बाद से ही जीव मृत्युकी ओर ही जा रहा है जीवस्योद्गमनारंभो मरणं परिकीर्तितम्। किन्तु
यहाँ प्रसिद्ध मुख्य मरण को न लेकर मृत्यु तुल्य स्थिति की बात कही गई है। विषं का अर्थ एक तो
प्रसिद्ध विष है और दूसरा पानी को भी विष कहा गया है। विषं तु गरले तोये (
विश्वकोष)। जलदभुजगजं जलदेनेवाला भुजग अर्थात् कुटिलगामी मेघ से उत्पन्न। एकतो
टेढा चलने से मेघ भुजग हो सकता है, दूसरा यह भयोत्पादक होने से भी भुजग हो सकता
है। क्योंकि वियोगिनियों को मेघ का आना वर्षा का होना ये सब वियोग को और दृढ
बनानेके कारण होते हैं।
अब हम मुख्य विषय अर्थात् इस पद्य में
कैसे व्यङ्ग्य वाच्सिद्धिका अङ्ग बनकर गुणीभूत हो गया यह समझते हैं। प्रस्तुत पद्य में जलदभुजगज पदके द्वारा मेघको सर्प कहा
गया है। जलदः एव भुजगः ऐसा रूपक तभी संभव है जब विष शब्द से पानी को न लेकर
प्रसिद्ध हालाहल विषको ही लिया जाये। वाच्यार्थ यहाँ मेघ से उत्पन्न होने वाले जल
से वियोगिनियों में मरण पर्यन्त के कष्ट होते हैं। व्यङ्ग्य है जलद भुजग से उत्पन्न हालाहल विष से
वियोगिनियों को बलपूर्वक चक्कर, बेचैनी, अलसहृदयता,
ज्ञान तथा चेष्टाका अभाव रूप प्रलय, मूर्च्छा, अन्धता, शारीरिक दुर्बलता और मरणको
उत्पन्न करता है। अब जो विष शब्द से व्यङ्ग्य के रूप में हालाहल जो अर्थ लिया गया
है, वह व्यङ्ग्य यदि न हो तो जलद भुजग से सर्प रूप वाच्य अर्थ की सिद्धि नहीं होगी
तथा भ्रम, अरति, अलसहृदयता इत्यादि अष्टविध कार्य भी जल से संभव न होने के कारण
हालहल व्यङ्ग्य प्रधान हुआ। किन्तु यह हालहल व्यङ्ग्य जलदभुजगज पद से उत्पन्न
वाच्यार्थ का उपकारक हो गया है। अतः
स्पष्ट होता है कि यहाँ हालाहल
विष रूप व्यङ्ग्य मेघ पर आरोपित सर्पकी वाच्यार्थ सिद्धिका उपकारक हो जाने के कारण
वाच्यसिद्ध्यङ्गव्यङ्ग्य गुणीभूत हो गया। इसी बातको आचार्य मम्मटने अत्र
हालाहलं व्यङ्ग्यं भुजगरुपस्य वाच्यस्य सिद्धिकृत् कहकर सिद्ध किया है। प्रस्तुत
पद्य में गाथा छन्द है।
इस
पद्य का वक्ता कवि है जो वियोगिनियों की स्थितिका वर्णन कर रहा था। इसलिए यह पद्य
एकवक्तृगत काव्य हो गया। वाच्यसिद्ध्यङ्गव्यङ्ग्य
का दूसरा उदाहरण दे रहे हैं जिसमें एक ही पद्य में दो वक्ता हैं एक तो गोपी जो
श्रीकृष्ण से कह रही है आपके पास बैठकर मेरी कामनाओं की तृप्ति नहीं हो रही है।
दूसरा स्वयं कवि है जो इस अवस्था का वर्णन करने के वाद कहता है इस प्रकारकी
भङ्गिमाओं से आक्षेप करने वाली गोपी को आलिङ्गन करने से रोमञ्चपुलकित हुए शरीर
वाले श्रीकृष्ण आपकी रक्षा करें। अतः यह पद्य दो भिन्न वक्तृगत काव्य है। इसमें वाच्यसिद्ध्यङ्गव्यङ्ग्य गुणीभूत कैसे है यह
दिखा रहे हैं।
गच्छाम्यच्युत
दर्शनेन भवतः किं तृप्तिरुत्पद्यते किं त्वेवं विजनस्थयोर्हतजनः संभावयत्यन्यथा।।
इत्यामन्त्रणभङ्गिसूचितवृथावस्थानखेदालसा-माश्लिष्यन्पुलकोत्कराञ्चिततनुर्गोपीं
हरिः पातु वः।।
हे अच्युत आपके दर्शन मात्र से मेरी
तृप्ति हो सकती है क्या? अपितु इसप्रकार के
निर्जन स्थान में हम दोनोको देखकर दुष्ट लोग कुछ और ही सोंचने लगेंगे, इस लिए मैं
जाती हूँ। (अच्युत कभी रति क्रीडा में स्खलित न होने वाले कृष्ण!) इस प्रकार के संबोधन भङ्गिमा से सूचित करने वाली वृथा बैठनेके खेद से
अलसायी हुई गोपिका को अपने भुजाओं से आलिङ्गन कर रोमाञ्चित करने वाले कृष्ण आप सब
की रक्षा करें। यह तो हुआ वाच्यार्थ। अब व्यङ्ग्यार्थ को देखते हैं। हे अच्युत अर्थात् इस प्रकार के
एकान्त स्थान में मेरे सदृश नायिका के साथ होने पर भी अस्खलित धैर्य वाले और
संभोगके लिये प्रयत्न न करने वाले! सुनो
तुम्हें देखने मात्र से मेरी तृप्ति नहीं हो सकती अपितु तृप्ति तो तुम्हारे साथ
संभोग से ही हो सकती है। और ऐसा होता है तो दुर्जन द्वारा किया गया निन्दा भी
सहलेती दुःख न होता किन्तु यहाँ तो हम दोनो वृथा अपने आपको छल रहे हैं। एक तरफ
परनिन्दा प्राप्ति भय दूसरे तरफ हुआ कुछ नहीं। यह तो हुआ पद्यके दो पाद से प्राप्त
व्यङ्ग्य। आमन्त्रण रूप अच्युत पद ही जो विशेष प्रकार की भङ्गिमा से कह रही हो। जो अच्युत हो
अर्थात् जिसका धैर्य स्खलित न हो रहा हो और वृथा एकान्तवास से खेद उत्पन्न होगया
हो उस प्रकारकी गोपीको आलिङ्गन करते हुए तथा रोमाञ्च से व्याप्त शरीर वाले हरि
श्रीकृष्ण भगवान् आपकी रक्षा करें।
अब इस पद्यमें व्यङ्ग्य कैसे गुणीभूत हुआ यह देख लेते हैं।
इसके लिये हम पद्यके आमन्त्रण पदको लेते हैं जिसका सिधा संबन्ध संबोधन पद अच्युत
से है। इस प्रकार के आमन्त्रण भङ्गिमा से सूचना देने वाली वृथा बैठने से खेद और अलसायी गोपीको इत्यादि वाच्य
तब तक सिद्ध नहीं होता जब
तक हम अच्युत पद से स्त्रीके साथ एकान्त वास में भी जिसका धैर्य स्खलित नहीं हो
रहा हो ऐसा अर्थ नहीं लेते। यह अर्थ व्यङ्ग्यार्थ ही है। और यह व्यङ्ग्य तीसरे चरण
के वाच्यार्थकी सिद्धिका अङ्ग बन गया। यहाँ अच्युत पद गोपी द्वारा
उक्त है। तथा इत्यामन्त्रणभङ्गिसूचितवृथावस्थानखेदालसा इत्यादि कविके द्वारा
कथित है। अतः यह भिन्नवक्तृगत वाच्यसिद्ध्यङ्गव्यङ्ग्य गुणीभूत हो गया। इस पद्य
में शार्दूलविक्रीडित छन्द है लक्षण सूर्याश्वैर्मजसास्ततः स गुरवः
शार्दूलविक्रीडितम्।
2 टिप्पणियां:
Very goodn
स्वागत है आपका । काव्यशास्त्र में गुणीभूतव्यङ्ग्य अपने आप में बहुत कठिन विषय है। आपने मनोयोग से पढा और हमे सराहा
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