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बुधवार, 28 अगस्त 2019

अगूढ गुणीभूत व्यङ्ग्य, गुणीभूत व्यङ्ग्य निरूपण मम्मटका पंचम उल्लास, भाग 3 # guni bhoot vaynga मम्मट का पंचम उल्लास, संस्कृत काव्यप्रकाश

प्रस्तुत लेख मम्मटके काव्यप्रकाश की झळकीकर टीका के आधार पर बनाये गये सीरीज हैं। इसमें झळकीकर (वामन भट्ट झलकीकर) टीकाके साथ साथ अन्य संस्कृतके टीकाकारों के मत भी यथा स्थान रखे गये हैं। 

आप इसके प्रथम लेख यहाँ तथा दूसरा लेख यहाँ जाकर पढ सकते हैं। जिससे संपूर्ण पंचम उल्लासका आनन्द लिया जा सके। 

अगूढ गुणीभूत व्यङ्ग्य 

अगूढ गुणीभूत व्यङ्ग्य का तात्पर्य है कि जहाँ व्यङ्ग्य या ध्वनित अर्थ अत्यन्त सरल सहज तरिके से समझमें आजाये जिसे हर कोई समझ सके।  


अब हम सभी भेदों के उदाहरण मम्मट के अनुसार समझते हैं। प्रथम भेद अगूढ के तीन उदाहरण आचार्य मम्मट ने दिए हैं । तीनो उदाहरणों का विवेचन करते है। प्रथम उदाहरण -

यस्यासुहृत्कृततिरस्कृतिरेत्य तप्तसूचिव्यधव्यतिकरेण युनक्ति कर्णौ।
काञ्चीगुणग्रथनभाजनमेष सोऽस्मि जीवन्न संप्रति भवामि किमावहामि।।


इस पद्य का अर्थ इस प्रका है - जिस (मुझ) अर्जुन का शत्रु स्वयं का तिरस्कार करता हुआ स्वयं ही शरण में आकर तप्त लौह शलाका से कानों को छेदता था। (मेरा) पहले इस प्रकारका प्रभाव था कि
, मेरा नाम श्रवण मात्र से अनेक शत्रु स्वयं को अपने आप धिक्कारते थे और तप्तलौह शलाका से कानों को बींधते हुए मेरे शरण में आते थे। उस प्रकार के उत्कृष्ट कर्म का पात्र मैं आज कन्था या करधनी जैसे वस्त्र ग्रथन रूप कार्य का पात्र हो गया हूं। अतः (जीवित होते हुए भी) जीवित नहीं हूं। अर्थात् श्लाघ्य जीवन रहित हूं।
यहाँ
 जीवन् न भवामि का अर्थ हुआ मैं जी नहीं रहा हूं। अब जब स्वयं अर्जुन ही कह रहे हैं तो कहना रूप कार्य तो किसी जीवित के द्वारा ही संभव है। अतः जीवन् न भवामि मुख्यार्थ बाधित हो गया। अब उपादान लक्षणा से 
श्लाघ्यजीवन नहीं जी रहा हूँ ये समझना होगा। अतः जीवन् शब्द अर्थान्तर मे संक्रमित हो गया। अब तक हमने वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थ देख लिया। अब शेष बचता है व्यङ्ग्यार्थ जो काव्यका मुख्य प्राणभूत अर्थ होना चाहिए। अतः पहले इस उदाहरण के परिवेश पर चलने का प्रयास करते हैं - यह उदाहरण कहाँ का है इस पर टीकाकार एक मत नहीं हैं ।

  सुधासागरकार के अनुसार कीचक के पराभव को बताती हुई द्रौपदी के प्रति बृहन्नला रूप अर्जुन का कथन है। किन्तु उद्योतकार अर्जुन के प्रति किसी अन्य की उक्ति मानते हैं, जो इस अवस्था से मुक्त होने के लिए प्रयास क्यों नहीं करते हो’ ऐसे किसी के प्रश्न के प्रति उत्तर स्वरूप अर्जुनके द्वारा कहा गया है। जो कुछ भी हो इतना स्पष्ट है कि महान् गाण्डीवधारी अर्जुन अपने पूर्व पराक्रमको स्मरण कर रहा है। अब वह छद्म वेश में विराट राजाके भवन में बृहन्नला के रूप मे बैठा है। मेरे शौर्य तथा पराक्रम से सारे वीर डरते थे वही मैं आज कन्था सिलने का काम कर रहा हूं। ये जीना क्या जीना । इस प्रकार की वेदना, परिताप, अर्जुनके छटपटाहट को प्रकट करना इस पद्य का व्यङ्ग्यार्थ है। ये वेदना या परिताप यहाँ मैं जी नहीं रहा हूँ इत्यादि वाच्य अर्थ के समान ही सरलता से प्रकट हो रहा है। अतः यहाँ व्यङ्ग्यार्थ गौण हो गया। इसलिए इसे गुणीभूत काव्य माना गया।

 दूसरा उदाहरण है –

उन्निद्रकोकनदरेणुपिशङ्गिताङ्गा गायन्ति मञ्जुमधुपा गृहदीर्घिकासु।
एतच्चकास्ति च रवेर्नवबन्धुजीव-पुष्पच्छदाभमुदयाचलचुम्बि बिम्बम्।।


पद्यानुवाद - उन्निद्र अर्थात् खिले हुए लाल कमलके पराग से पीले वर्णके अङ्ग वाले भौंरे घरके दीर्घिका मे अर्थात् बावडियों में मधुर गुञ्जार कर रहे हैं। यह बन्धुजीव पुष्प अर्थात् गुडहलके पुष्पके समान कान्ति वाला सूर्य उदयाचल पर्वतका चुम्बन कर रहा है। 
यह है प्रस्तुत पद्यका अर्थ। 
    अब हमें विश्लेषण व्यङ्ग्य का करना है। उससे पूर्व सूर्य के अचलचुम्बी बिम्वम् को देखते हैं। सामान्यतया चुम्बनका अर्थ है – दो मुखका परस्पर संयोग। चुम्बतेर्वक्त्रसंयोगः सूर्य द्वारा यह संभव नहीं है। अतः यह अर्थ बाधित हो गया । इसे अत्यन्त तिरस्कृत वाच्य या लक्षणलक्षणा कहा जाता है। प्रयोजन सामर्थ्यसे यहाँ सूर्य का पर्वतके साथ संयोग ऐसा अर्थ लिया जाता है।

            झलकीकर के अनुसार यहाँ कोई नायिका नायकके साथ रतिजन्य आलस्य के कारण प्रातःकाल का आकलन न करते हुए विस्तर मे सो रही है। अतः कोई नायिका की सखी उसे  बता रही है कि, अरे सखि देखो तुम्हारे घरके पास ही अवस्थित सरोवर में लाल कमल के पराग से मत्त भौंरे मधुर गुञ्जन कर रहे हैं। भौरोंके गुञ्जन यहाँ प्रातःकाल सूचना के लिए है। यदि तुमने भौरोके गुञ्जन को सुना किन्तु फिर भी सूर्योदय नहीं हो रहा है ऐसा मानती हो तो देखो सूर्य भी उदयाचल का चुम्बन कर रहा है।  यहाँ पर इन सभी प्रातःकाल के सूचक प्रसंगों के द्वारा व्यक्त किया व्यङ्ग्य है प्रातःकाल की सूचना देना। यद्यपि यहाँ कहीं पर भी शब्द से प्रातःहो गया ऐसा नहीं काहा गया है। फिर भी यह व्यङ्ग्य वाच्य के समान प्रष्ट होने से अगूढगुणीभूत माना गया है। अतः यह लक्षणामूल ध्वनिके अत्यन्ततिरस्कृत वाच्य भेद के गुणीभूत होनेका उदाहरण है। 

अब अगूढ व्यङ्ग्य का तीसरा अर्थशक्तिमूल व्यङ्ग्य का उदाहरण देते है –

अत्रासीद् णीपासबन्धनविधिः शक्त्या भवद्देवरे


 गाढं वक्षसि ताडिते हनुमता द्रोणाद्रिरत्राहृता।
दिव्यैरिन्द्रजिदत्र लक्ष्मणशरैर्लोकान्तरं प्रापितः 


केनाप्यत्र मृगाक्षि राक्षसपतेः कृत्ता च कण्ठाटवी।।

यह पद्य राजशेखर कृत बालरामायण नामक नाटक के दसम अङ्क का है। रावण वध के पश्चात् विमान से सपत्नीक अयोध्या लौटते समय सीता को युद्धस्थल दिखाते हुये राम की यह उक्ति है।

 पद्यका अर्थ - वे कहते हैं - हे मृगनयनी देखो इस स्थान पर हम दोनों भाईको नागपाश से बाँधा गया था, और यहाँ पर तुम्हारे देवर लक्ष्मणके वक्षस्थल पर शक्ति प्रहार होने पर हनुमान द्रोणाचल पर्वत उठाकर ले आए थे।  और इस स्थान पर लक्ष्मण के दिव्य बाणों ने इन्द्रजितको परलोक पहुंचाया। और देखो यहाँ पर किसीने राक्षसराज रावणके कण्ठवन को काटा था। अब हम इस पद्य पर क्या व्यङ्ग्यार्थ है तथा कैसे गुणीभूत हो गया इसका विश्लेषण करते हैं।

            यहाँ वक्ता रामचन्द्रजी हैं, जो धीरोदात्त कोटीके नायक हैं। नायक स्वयं सद्यःघटित युद्धका वर्णन कर रहे हैं। प्रथम तीन चरणों में अन्यद्वारा किया कार्य वर्णन है, चतुर्थ चरणमें स्वयं के द्वारा किया रावणका वध वर्णित है। जो इस प्रकार है केनाप्यत्र राक्षसपतेः कण्ठाटवी कृत्ता  यद्यपि नायक स्वयं अपने कर्तृत्व (मया) के स्थान पर किं सर्वनाम पद के तृतीया विभक्ति (केन) का प्रयोग कर रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि धीरोद्दात्त नायक अहंकार प्रकट नहीं कर रहे हैं। किन्तु केन अपि कृत्ता (किसी ने काटा) इस पद से भी व्यङ्ग्य तो मया कृत्ता (मैने काटा) ही निकलता है। जिस व्यङ्ग्य के लिए आप केन लगा रहे हो वो तो अत्यन्त प्रसिद्ध नायक रामको ही द्योतित करता है। अतः व्यङ्ग्य अगूढ तथा सर्वजनवेद्य हो गया। 


      आचार्य मम्मट कहते हैं कि जो केन के स्थान पर तस्य प्रयोग करें तो यह विशुद्ध ध्वनि काव्य हो सकता है। 
वो कैसे बताते हैं। 

  1. तत् सर्वनाम का षष्ठी एकवचन रूप है तस्य।
  2.  तस्य अर्थात् उसका 
  अब हम प्रस्तुत पद्य के चतुर्थ चरण पर तस्य पद जोड कर अर्थ करते हैं तो बनता है उस राक्षस राज के कण्ठ वनको काटा। अब यहाँ कहीं शब्द से नायक का कण्ठवन काटने के साथ संबन्ध नहीं है। और सबको ज्ञान भी हो जाता है कि रामने किया। ऐसे ध्वनित हो जाने से व्यङ्ग्य भी गूढ हो जाता है। आत्मश्लाघा भी समाप्त हो जाती है। ऐसा मम्मटाचार्यका मत है।
 आपको यह लेख अच्छा लगा तो अब आप इस सीरीजके अन्य भेद भी देख सकते हैं। 
जो क्रमशः आगे रखे गये हैं चौथा भाग पढनेके लिए आप यहाँ जा सकते है। 

मंगलवार, 20 अगस्त 2019

गुणीभूत व्यङ्ग्य क्या है? गुणीभूत व्यङ्ग्य निरूपण मम्मटका पंचम उल्लास, भाग 2 #Gunibhoot Vyangya, #kavyaprakash pancham ullas

प्रस्तुत लेख मम्मटके काव्यप्रकाश की झळकीकर टीका के आधार पर बनाये गये सीरीज हैं। इसमें झळकीकर (वामन भट्ट झलकीकर) टीकाके साथ साथ अन्य संस्कृतके टीकाकारों के मत भी यथा स्थान रखे गये हैं। प्रथम लेख पढनेके लिए यहाँ जायें।    

गूणीभूत व्यङ्ग्यका लक्षण आचार्य मम्मट के अनुसार -  अतादृशि गुणीभूतव्यङ्ग्यं व्यङ्ग्ये तु मध्यमम् । है। अर्थात् वाच्यार्थसे चमत्कारी व्यङ्ग्यार्थके न होने पर गुणीभूत नामक दूसरे प्रकारका काव्य होता है। जिसे मध्यमकाव्य भी कहा जाता है। यहाँ एक शङ्का उपस्थित करते हैं । गुणीभूत मध्यमकाव्य में व्यङ्ग्य अगूढ हो तो भी काव्य में वाच्य का अभाव हो गया तथा प्रधानता तो अगूढ (व्यङ्ग्य) की ही हो गई अतः अगूढ होने पर भी व्यङ्ग्य होने के कारण गुणीभूत व्यङ्ग्यको ही मुख्य माना जाये। यह शङ्का समाधान के लिए कहते हैं - कामिनी कुच कलश न्याय से किंचिद्गूढ निबन्धन ही चारूत्व का कारण होता है। यद्यपि वाच्यत्व नहीं है फिर भी अगूढ निबन्धन तो विवृत कुचकलश के सदृश स्फुटता होने से चारुत्व जनक नहीं होता। इस प्रकार कामिनी कुचकलश न्याय से किंचिद्गूढ किंचिद्विवृत सहृदय संवेद्य काव्य ही ध्वनि काव्य हो सकता है। अतः प्रष्ट है वे सभी व्यङ्ग्य काव्य गुणीभूत हैं, जो सहृदय के लिए भी दुःख संवेद्य हों तथा असहृदय के लिए भी सरलता से गम्य हो। इसी प्रकार अन्य भेदों में भी अनुभव ही साक्षी है । 

इस विषय पर एक श्लोक प्रसिद्ध पद्य है 
नान्ध्रीपयोधर इवातितरां प्रकाशो नो गुर्जरीस्तन इवातितरां निगूढः।
अर्थो गिरामपिहितः पिहितश्च कश्चित्सौभाग्यमेति मरहट्टवधूकुचाभः।।

इस सीरीज का तीसरा लेख देखने यहाँ जायें। 

शनिवार, 10 अगस्त 2019

संस्कृत काव्यप्रकाश, गुणीभूत व्यङ्ग्य निरूपण मम्मटका पंचम उल्लास, भाग 1 #गुणीभूत-व्यंग्य के भेद gunibhoot vyangya


    प्रस्तुत लेख मम्मटके काव्यप्रकाश की झळकीकर टीका के आधार पर बनाये गये सीरीज हैं। इसमें झळकीकर (वामन भट्ट झलकीकर) टीकाके साथ साथ अन्य संस्कृतके टीकाकारों के मत भी यथा स्थान रखे गये हैं। 

इसमें गुणीभूत व्यङ्ग्यके आठ भेद बताये गये हैं

   गुणीभूत व्यङ्ग्य निरूपण तथा उसके भेद उपभेद वर्णन पञ्चम उल्लास का मुख्य विषय है। मम्मट के अनुसार दोष रहित गुणयुक्त एवं साराधणतया अलंकार युक्त किन्तु कहीं कहीं अलंकार रहित होने पर भी शब्दार्थ समष्टि ध्वनि काव्य या उत्तम काव्य माना जाता है। यह काव्य सदा सर्वदा शब्द द्वारा निरुपित अर्थ से भिन्न चमत्कार युक्त किन्तु शब्दार्थ से ही संबद्ध व्यङ्ग्य अर्थ होता है। यही ध्वनि काव्य है। और यदि इस प्रकार से ध्वनित व्यङ्ग्य अर्थ गौण हो जाये तो उसे गुणीभूत काव्य या मध्यम काव्य कहा जाता है। मूल में मध्यम काव्य दो प्रकार का होता है। प्रथम व्यङ्ग्य अर्थ गौण होकर  अत्यन्त साधारण बन जाना जो सामान्य लोग भी समझ सके। दूसरा भेद व्यङ्ग्य अर्थ अत्यन्त क्लिष्ट होने पर माना जाता है जो सहृदय पाठक भी समझने मे कष्ट अनुभव करे। अतः इन दो मुख्य भेदों के आधार पर आचार्य मम्मट गुणीभूत व्यङ्ग्यको आठ भागों में विभक्त करते हैं। ये आठ भेद निम्न हैं –

1.    अगूढम् – 
अगूढ का अभिप्राय है असहृदय के द्वारा भी तुरन्त समझा जानेवाला। अर्थात् यद्यपि इसप्रकार के काव्य में वाच्यार्थ तथा व्यङ्ग्यार्थ दोनो हैं किन्तु व्यङ्ग्यार्थ में  कोई गूढता नहीं है। कोई भी समझ सकता है।

2.    अपरस्याङ्गम् – 

जैसा कि हम जानते हैं काव्यशास्त्र में व्यङ्ग्यार्थ की प्रधानता होती है। किन्तु जिस काव्य में वाच्यार्थ की सिद्धि के लिए व्यङ्ग्यार्थ अङ्ग बनकर गौण हो जाए वह अपरस्याङ्ग भेद कहलाता है। यह दूसरे का अंग बनना कभी एक रस का दूसरे रस के लिए, कभी भाव भाव के लिए इत्यादि भेद भी होंगे।

3.    वाच्यसिद्ध्यङ्गम् -
वाच्यार्थके सिद्धि या विश्रान्ति में व्यङ्ग्यार्थ अङ्ग बन जाना। यानि वाच्यर्थ की सिद्धि ही व्यङ्ग्यर्थ के अधीन होना, वह स्थिति।

4.    अस्फुटम् – 
अस्फुट अर्थात् व्यङ्ग्य का प्रष्ट न होना। सहृदय सामाजिक को भी व्यङ्ग्यार्थ समझने मे कठिन हो। 5.    संदिग्धप्रधान जिस काव्य में व्यङ्ग्यार्थ की प्रधानता है या वाच्यार्थकी प्रधानता है इस संबन्ध में निश्चित न होना।6.    तुल्यप्रधान वाच्यार्थ तथा व्यङ्ग्यार्थ में समान प्रधानता हो। अर्थात् जहाँ चमत्कारोत्पत्ति में दोनो वाच्यार्थ तथा व्यङ्ग्यार्थ सक्षम हों वह तुल्यप्रधान्यम् हुआ।

7.    काकु के द्वारा आक्षिप्त (काक्वाक्षिप्त) – 
काकु कहते हैं ध्वनि विकार को । अर्थात् विशिष्ट ध्वनि द्वारा आक्षिप्त झटिति प्रकाशित। अथवा इसको ऐसे समझना चाहिये - जिस विशिष्ट ध्वनि भङ्गिमा के विना चमत्कार हृदयङ्गम नहीं होता उस प्रकार से उच्चारित काव्य को काक्वाक्षिप्त कहना चाहिये। अथवा जिसमे मुख्यार्थ बाधादि लक्षण के लिए विलंब होने से कोई अवसर न हो।

8. असुन्दरम् – 
चमत्कार उत्पन्न करने में व्यङ्ग्य का वाच्यमुख निरीक्षक होना, या स्वभाव से ही वाच्यार्थ से अचारु व्यङ्ग्यार्थ का होना।

इसप्रकारके आठों भेदोंको हम क्रमशः लक्षण उदाहरण सहित पोष्ट करनेका प्रयास करेंगे। सुधीजन उचितानुचिविवेक साझा करें।
दूसरा भाग देखने के लिए यहाँ जायें।

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