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गुरुवार, 31 अक्टूबर 2019

त्रैलोक्य मोहन गणपति मन्त्र

त्रैलोक्यमोहनगणपति मन्त्र –
 यह मन्त्र तीनों लोकोंके समस्त प्राणी को सम्मोहित करके अपने वशमें करने वाला मन्त्र है। 
ॐ वक्रतुण्डैकदंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते वरद वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।

विस्तृत पूजन तथा प्रयोग निचे दिया जा रहा है -


त्रैलोक्यमोहनगणपति मन्त्र –  यह मन्त्र तीनों लोकोंके समस्त प्राणी को सम्मोहित करके अपने वशमें करने वाला मन्त्र है। पुष्टिकर मन्त्र होने के कारण अनुष्ठानमें त्रुटि रहने पर साधकके लिए मारक नहीं है।  
ॐ वक्रतुण्डैकदंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते वरद वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।
इस मन्त्रसाधनाके लिए सर्वप्रथम आसन शुद्धि करना चाहिए। शुद्ध भावसे नित्यक्रिया से निवृत्त होकर गणेशजीके पूजनके लिए अभीष्ट सामग्रीको लेकर रक्तासनमें बैठ जाना चाहिए। विधिवत् आचमन एवं प्रणायाम के द्वारा शरीर शुद्धि करके, दीपप्रज्वलन करें। पुरश्चरणके लिए प्रयाश्चित्त तथा संकल्प करें। प्रत्येक मन्त्रकी साधना सिद्धिका अंग होती है। साधनाके द्वारा सिद्धि प्राप्त होती है। फिर किसी विशेष कार्यकी प्राप्तिके लिए पुनः ससंकल्प जप किया जाता है। अतः साधक पहले मन्त्रद्वारा स्वयं में मन्त्रकी सिद्धि प्राप्त करता है। इस पूजन में
*    सर्वप्रथम भगवान गणेशका ध्यान करें।
*    मानसोपचार से पूजन करें।
*    अर्घ्य स्थापित करें।
*    फिर एक चौकी पर लाल वस्त्रका आसन रखकर उसपर पञ्च आवरण वाला यन्त्र निर्माण करें।
*    यन्त्र की रूपरेखा निम्न प्रकार से है –

त्रैलोक्य मोहन गणपति मन्त्र

*  
  यन्त्रके आठों दिशाओं में निम्न मन्त्रसे पूजन करें
(यन्त्रके पूर्व भाग से पूजन आरंभ करें।)
ॐ तीव्रायै नमः इति पूर्वदिशि।
ॐ चालिन्यै नमः इति आग्नेयकोणे।
ॐ नन्दायै नमः इति दक्षिणदिशि।
ॐ भोगदायै नमः इति नैऋत्यकोणे।
ॐ कामरूपिण्यै नमः इति पश्चिमदिशि।
ॐ उग्रायै नमः इति वायव्यकोणे।
ॐ तेजोवत्यै नमः इति उत्तरदिशि।
ॐ सत्यायै नमः इति ईशान्यकोणे।

इस प्रकार पूजन कर मध्य में विघ्नविनाशिन्यै नमः एवं ॐ सर्वशक्तिकमलासनाय नमः इस मन्त्रसे आसन देकर मूल मन्त्र से गणेशजी की मूर्ति की कल्पना करें (काम्य प्रयोग के योग्य न होने तक मूर्ति स्थापित नहीं करना है)। फिर उसमें गणेशजी का ध्यान करें। ॐ श्री त्रैलोक्यमोहन गणपतये नमः इस मन्त्रसे अथवा पुरे मूल मंत्रसे आवाहन आसन पाद्य अर्घ्य इत्यादि समस्त उपचारोंसे पूजन करें।
अब उसी यन्त्रमें क्रमशः पाँच आवरणकी पूजा करें –
प्रथम आवरण पूजा –
ॐ गां हृदयाय नमः आग्नेय दिशामें पूजन करें।
 ॐ गीं शिरसे स्वाहा नैऋत्य दिशामें पूजन करें।
ॐ गूं शिखायै वषट् वायव्य दिशामें पूजन करें।
ॐ गैं कवचाय हुम् ईशान्य दिशामें पूजन करें।
ॐ गौं नेत्रत्रयाय वौषट् अग्र भाग में पूजन करें।
ॐ गः अस्त्राय फट् चारों दिशाओं में पूजन करें।
ऐसे पूजन करनेके पश्चाद् मूल मन्त्रका (अर्थात् इस विहित कर्म के लिये प्रयुक्त ॐ वक्रतुण्डैकदंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते वरद वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा । )
 उच्चारण करें और –
अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम्।।
ऐसा कहकर पुष्पाञ्जली समर्पित करें।
फिर यन्त्रके अन्दर निम्न मन्त्र से द्वितीय आवरण पूजन करें –
ॐ विद्यायै नमः कहकर पूर्व दिशामें पूजन करें।
ॐ विधात्र्यै नमः कहकर आग्नेय दिशामें पूजन करें।
ॐ भोगदायै नमः कहकर पूर्व दक्षिण दिशा में पूजन करें।
ॐ विघ्नघातिन्यै नमः कहकर नैऋत्य दिशामें पूजन करें।
ॐ निधि-प्रदीपायै नमः कहकर पश्चिम दिशामें पूजन करें।
ॐ पापघ्न्यै नमः कहकर वायव्य दिशामें पूजन करें।
ॐ पुण्यायै नमः कहकर उत्तर दिशामें पूजन करें।
ॐ शशिप्रभायै नमः कहकर ईशान्य दिशामें पूजन करें।
ऐसे पूजन करनेके पश्चाद् मूल मन्त्रका उच्चारण करें और –
अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं द्वितीयावरणार्चनम्।।
ऐसा कहकर पुष्पाञ्जली समर्पित करें।
तदनन्तर यन्त्रके अष्टदलकमल में निम्न मन्त्रसे तृतीय आवरण पूजन करें –
ॐ वक्रतुण्डाय नमः।
ॐ एकद्रंष्ट्राय नमः।
ॐ महोदराय नमः।
ॐ गजास्याय नमः।
ॐ लम्बोदराय नमः।
ॐ विकटाय नमः।
ॐ विघ्नराजाय नमः।
ॐ धुम्रवर्णाय नमः।
ऐसे पूजन करनेके पश्चाद् मूल मन्त्रका उच्चारण करें और –
अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं तृतीयावरणार्चनम्।।
ऐसा कहकर पुष्पाञ्जली समर्पित करें।
अब पुनः यन्त्रके अष्टदलकमल के अग्रभाग में निम्न मन्त्रसे चतुर्थ आवरण में दशदिक्पालोंका पूजन करें –
ॐ इन्द्राय नमः इस मन्त्रसे पूर्व दिशा में पूजन करें।
ॐ अग्नये नमः इस मन्त्रसे अग्नि कोण में पूजन करें।
ॐ यमाय नमः इस मन्त्रसे दक्षिण दिशा में पूजन करें।
ॐ निर्ऋतये नमः इस मन्त्रसे नैऋत्य कोण में पूजन करें।
ॐ वरुणाय नमः इस मन्त्रसे पश्चिम दिशा में पूजन करें।
ॐ वायवे नमः इस मन्त्रसे वायव्य कोण में पूजन करें।
ॐ सोमाय नमः इस मन्त्रसे उत्तर दिशा में पूजन करें।
ॐ ईशानाय नमः इस मन्त्रसे ईशान्य कोण में पूजन करें।
ॐ ब्रह्मणे नमः इस मन्त्रसे आकाश की पूजन करें।
ॐ अनन्ताय नमः इस मन्त्रसे पाताल की पूजन करें।
अब मूल मंत्रके साथ
अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं चतुर्था-वरणार्चनम्।।
ऐसा कहकर पुष्पाञ्जली समर्पित करें।
यन्त्रके अष्टदलकमल के अग्रभाग के अन्त में निम्न मन्त्रसे पञ्चम आवरण पूजन करें –
ॐ वज्राय नमः।
ॐ शक्तये नमः।
ॐ दण्डाय नमः।
ॐ खड्गाय नमः।
ॐ पाशाय नमः।
ॐ अङ्कुशाय नमः।
ॐ गदायै नमः।
ॐ त्रिशूलाय नमः।
ॐ चक्राय नमः।
ॐ पद्माय नमः।
ऐसे पूजन करनेके पश्चाद् मूल मन्त्रका उच्चारण करें और –
अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं पंचमा-वरणार्चनम्।।
ऐसा कहकर पुष्पाञ्जली समर्पित करें।
धूपदीपनैवेद्य समर्पित करें।
तदनन्तर इस क्रियाके लिए विनियोग करें –
अस्य श्रीत्रैलोक्यमोहनमन्त्रस्य गणकऋषिः गायत्री छन्दो भक्तेष्टसिद्धिदायकत्रैलोक्यमोहनकारको गणपतिर्देवता आत्मनोऽभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।
अब षडङ्ग न्यास करें –
वक्रतुण्डैकदंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं हृदयाय नमः (हृदयका स्पर्श)
गणपते शिरसे स्वाहा (मस्तकका स्पर्श)
वरवरद शिखायै वषट् (शिखाका स्पर्श)
सर्वजनं कवचाय हुम् (दोनों हाथोंसे कवच बनाते हुए भुजाओंका स्पर्श)
 मे वशमानय नेत्रत्रयाय वौषट् (तीनों नेत्रका स्पर्श)
स्वाहा अस्त्राय फट् (शिरके उपरसे दक्षिण हस्तको घुमाते हुए तालिका वादन)
अब त्रैलोक्यमोहन गणपतिका ध्यान करें –


गदाबीजपूरे धनुः शूलचक्रे
सरोजोत्पले पाशधान्याग्रदन्तान्।
करैः सन्दधानं स्वशुण्डाग्रराजन्
मणीकुम्भमङ्काधिरूढं स्वपत्न्या।।
सरोजन्मनाभूषणानाम्भरेणो-
ज्ज्वलद्धस्ततन्व्यासमालिङ्गिताङ्गम्।
करीन्द्राननं चन्द्रचूडं त्रिनेत्रं
जगन्मोहनं रक्तकान्तिं भजेत्तम्।।
हे भगवन् आपके दाहिने हाथों में क्रमशः गदा, बीजपूर, शूल, चक्र तथा पद्म विराजते हैं। बायें हाथों में धनुष, उत्पल, पाश धान्यमञ्जरी, एवं दन्त धारण किया है। आपके शुण्डाग्रभागमें मणिकलश सुशोभित हो रहा है। आपके पार्श्व भाग में सुशोभित श्री अङ्ग वाली, कमल एवं आभूषणों से जगमगाती हुई उज्ज्वल वर्ण वाली पत्नी विराजती हैं। अतः आप प्रियासे आलिङ्गित हो। ऐसे त्रिनेत्र धारी, हाथीके समान मुख वाले, सिर पर चन्द्रकला धारण किये हुए, तीनों लोकों को मोहित करने वाले, रक्त कान्तिसे युक्त श्री गणेश जी का मैं ध्यान करता हूँ।
अब विधि पूर्वक गणेशजीका जप प्रारंभ करें। ॐ वक्रतुण्डैकदंष्ट्राय क्लीं ह्रीं श्रीं गं गणपते वरद वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा।
इस मन्त्रका चारलाख जप करने के पश्चात् पुरश्चरण हो जाता है। पुरश्चरणके पश्चात् जपका दशांश हवन करना चाहिए। अर्थात् चालिहजार मन्त्रसे हवन। पुनः हवनके दशांश का तर्पण अर्थात् चारहजार माला से तर्पण किया जाना चाहिए । तर्पणमें पूर्णमंत्रके उच्चारणके पश्चात् तर्पयामि। उच्चारण किया जाता है। तर्पणके दशांश से अर्थात् चार माला मन्त्र उच्चारण के साथ तर्पित जलसे स्वयंका भगवान गणेश भावसे मार्जन किया जाता है। इसका दशांश ब्रह्मण भोजन कराने के पश्चात् कर्मको पूर्ण माना जाता है। अब साधक काम्य प्रयोग अर्थात् अभीष्ट सिद्धि के लिये इस मन्त्रका उपयोग कर सकता है। अगूठेके बराबर की गणेश मूर्ति को यन्त्रके मध्य भागमें रखकर किया जाता है।
हवन के लिए विशिष्ट सामग्री की आवश्यकता होती है जो निम्न प्रकार के हैं
ईख
सत्तू
केला
चिउडा
तिल
मोदक
नारियल
धानका लावा
ये आठ द्रव्य अन्य हवनीय द्रव्यके साथ विशेष रूप से प्रयुक्त किया जाता है।
काम्य प्रयोग में पीपल, उदुम्बर, प्लक्ष, वट आदि की समिधायें एवं मुनक्का, सुवर्ण, गो दुग्ध, दधि मिश्रित चरु, घी इत्यादि से हवन किया जाता है।

 साद हरिशरणम्

शनिवार, 26 अक्टूबर 2019

धन प्राप्ति मंत्र, कनकधारा स्तोत्र मूल संस्कृत

अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती
भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।
अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला
माङ्गल्यदास्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥१॥

मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥२॥

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षम्
आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्
इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥३॥

आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दम्
आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् ।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥४॥

 बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥५॥

प्राप्तं पदम प्रथमत: खलु यत्प्रभावात्
माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षार्धं
मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:।।६।।

विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्ष-
मानन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोपि ।
ईशन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्ध-
मिन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिराया: ।।७।।

इष्टाविशिष्टमतयोपि यया दयार्द्र-
दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते।
दृष्टि: प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां
पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टराया: ।।८।।

दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारां
अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं
नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाह:।।९।।

गीर्देवतेति गरुडध्वजसन्दरीति
शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै
तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ।।१०।।

श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यै
रत्यै नमोस्तु रमणीयगुणार्णवायै।
शक्त्यै नमोस्तु शतपत्रनिकेतनायै
पुष्ट्यै नमोस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै।।११।।

नमोस्तु नालीकनिभाननायै
नमोस्तु दग्धोदधिजन्मभूत्यै ।
नमोस्तु सोमामृतसोदरायै
नमोस्तु नारायणवल्लभायै।।१२।।

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि
साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाणि।
त्वद्वन्दनानि दुरितोद्धरणोद्यतानि
मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ।।१३।।

यत्कटाक्षसमुपासनविधि:
सेवकस्य सकलार्थसम्पद: ।
संतनोति वचनाङ्गमानसैस्-
त्वां मुरारीहृदयेश्वरीं भजे ।।१४।।

सरसिजनिलये सरोजहस्ते
धवलतमांशुकमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ।।१५।।

दिघ्घस्तिभि: कनककुम्भमुखावसृष्ट
स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम्।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष-
लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम्।।१६।।

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं
करुणापूरतरतरङ्गितैरपाङ्गै:।
अवलोकय मामकिञ्चनानां
प्रथमं पात्रमकृतिमं दयाया: ।।१७।।

स्तुन्वन्ति ये स्तुतिभिरमीभिरन्वहं
त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् ।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभामिनो
भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशया: ।।१८।। 

बुधवार, 23 अक्टूबर 2019

दीपावली पूजन के लिये उपयुक्त सामग्री

रोली
मौली
चावल
अष्टगंध चन्दन
सिन्दूर
धूप
अगरबत्ती
रूई
कपूर
डोने
लाल वस्त्र
 सफेद वस्त्र
 लक्ष्मीजी के लिए शृंगार तथा वस्त्र
 गणेश जीके लिए शृंगार तथा वस्त्र
 गुड
 धनिया साबुत
 गन्नेका टुकडा
 लक्ष्मी गणेश की मिट्टीकी मूर्ति
 खीलें (धानके)
 मिट्टीका कलश
 दीये मिट्टीके
 पतीशा
 हल्दी गाँठ
 पानीवाला नारियल
 पिली सरसों
  जनेउ
  सुपारी
  लौंग
  इलायची
  पंचमेवा
    कमलगट्टा
    माचिस
दूध
दही
घी
शहद
 शक्कर
 गंगाजल
 सप्तमृत्तिका
 पंचरत्न
 पानके पत्ते
 पंच पल्लव
  दूर्बा
  तुलसी पत्र
फूल माला
कमल पुष्प
 फल 5 प्रकारके
  मिठाई
  चौकी
 
घरसे संकलन करे -
(लोटे
चम्मच
थालियां
कटौरे
चाँदीके सिक्के पूजनके लिए)
कुबेर पूजनके लिए यंत्र, बही खाते, तराजू, लेखनी  इत्यादि जो वर्ष पर्यन्त प्रयोग करते हों
सरस्वती जी की मूर्ति
रात भर पूजन करना हो तो अन्त में हवन भी किया जाता है
अत:
 हव सामग्री
जौ
तील
घी 
पंचमेवा
अगर तगर
रक्तचंदन पावडर
लक्ष्मीजी की प्रसन्नता के लिए
बेलकी लकडी से हवन करना शुभ होता है।

सोमवार, 21 अक्टूबर 2019

यम गीता विष्णुपुराणोक्त यम गीता yama gita


प्रस्तुत यमगीता विष्णुपुरासे लिया गया है। यह स्तोत्र यहाँ कलिङ्गके द्वारा भीष्मको जैसा कहा वैसा रखा गया है। मूल यमोक्तपाठ नीले रंगमें प्रकाशति है। 

कलिङ्ग उवाच
स्वपुरुषमभिवीक्ष्य पाशहस्तं
वदति यमः किल तस्य कर्ममूले।
परिहर मधुसूदनप्रपन्नान्
प्रभुरहमन्यनृणामवैष्णवानाम्।।1।।

अहममरवरार्चितेन धात्रा
यम इति लोकहिताहिते नियुक्तः।।
हरिगुरुवशगोऽस्मि न स्वतन्त्रः
प्रभवति संयमने ममापि विष्णुः।।2।।

कटकमुकुटकर्णिकादिभेदैः
कनकमभेदमपीष्यते यथैकम्।।
सुरपशुमनुजादिकल्पनाभि-
हरिरखिलाभिर्रुदीर्यते तथैकः।।3।।

क्षितितलपरमाणवोऽनिलान्ते
पुनरुयान्ति यथैकतां धरित्र्याः।।
सुरपशुमनुजादयस्तथान्ते
गुणकलुषेण सनातनेन तेन।।3।।

हरिममरवरार्चिताङ्घ्रिपद्मं
प्रणमति यः परमार्थतो हि मर्त्यः।।
तमपगतसमस्तपापबन्धं
व्रज परिहृत्य यथाग्निमाज्यसिक्तम्।।4।।

इति यमवचनं निशम्य पाशी
यमपुरुषस्तमुवाच धर्मराजम्।।
कथय मम विभो समस्तधातु-
र्भवति हरेः खलु यादृशोऽस्य भक्तः।।5।।

यम उवाच
न चलति निवर्णधर्मतो यः
सममतिरात्मसुहृद्विपक्षपक्षे।।
न हरति न च हन्ति किञ्चिदुच्चैः
सितमनसं तमवेहि विष्णुभक्तम्।।6।।

कलिकलुषमलेन यस्य नात्मा
विमलमतेर्मलिनीकृतस्तमेनम्।।
मनसि कृतजनार्दनं मनुष्यं
सततमवेहि हरेरतीवभक्तम्।।7।।

कनकमपि रहस्यवेक्ष्य बुद्ध्या
तृणमिव यस्समवैति वै परस्वम्।।
भवति च भगवत्यनन्यचेताः
पुरुषवरं तमवेहि विष्णुभक्तम्।। 8।।

स्फटिकगिरिशिलामलः क्व विष्णु-
मनसि नृणां क्व च मत्सरादिदोषः।।
न हि तुहिनमयूखरश्मिपुञ्जे
भवति हुताशनदीप्तिजः प्रतापः।।9।।

विमलमतिरमत्सरः प्रशान्त-
श्शुचिचरितोऽखिलसत्त्वमित्रभूतः।।
प्रियहितवचनोऽस्तमानमायो
वसति सदा हृदि तस्य वासुदेवः।।10।।

वसति हृदि सनातने च तस्मिन्
भवति पुमाञ्जगतोऽस्य सौम्यरूपः।।
क्षितिरसमतिरम्यमात्मनोऽन्तः
कथयति चारुतयैव शालपोतः।।11।।

यमनियमविधूतमल्मषाणा-
मनुदिनमच्युतसक्तमानसानाम्।।
अपदगतमदमानमत्सराणां
त्यज भट दूरतरेण मानवानाम्।।12।।

हृदि यदि भगवाननादिरास्ते
हरिरसिशङ्खगदाधरोऽव्ययात्मा।।
तदघमघविघातकर्त्तृभिन्नं
भवति कथं सति चान्धकारमर्के।।13।।

हरति परधनं निहन्ति जन्तून्
वदति तथाऽनृतनिष्ठुराणि यश्च।।
अशुभजनितदुर्मदस्य पुंसः
कलुमतेर्हृदि तस्य नास्त्यनन्तः।।14।।

न सहति परसम्पदं विनिन्दां
कलुषमतिः कुरुते सतामसाधुः।।
न यजति न ददाति यश्च सन्तं
मनसि न तस्य जनार्दनोऽधमस्य।।15।।

परमसुहृदि बान्धवे कलत्रे
सततनयापितृमातृभृत्यवर्गे।।
शठमतिरुपयाति योऽर्थतृष्णां
तमधमचेष्टमवेहि नास्य भक्तम्।।16।।

अशुभमतिरसत्प्रवृत्तिसक्त-
स्सततमनार्यकुशीलसंगमत्तः।।
अनुदिनकृतपापबन्धयुक्तः
पुरुषपशुर्न हि वासुदेवभक्तः।।17।।

सकलमिदमहं च वासुदेवः
परमपुमान्परमेश्वरस्स एकः।।
इति मतिरचला भवत्यनन्ते
हृदयगते व्रज तान्विहाय दूरात्।।18।।

कमलनयन वासुदेव विष्णो
धरणिधराच्युत सङ्खचक्रपाणे।।
भव शरणमितीरयन्ति ये वै
त्यज भट दूरतरेण तानपापान्।।19।।

वसति मनसि यस्य सोऽव्ययात्मा
परुषवरस्य न तस्य दृष्टिपाते।।
तव गतिरथ वा ममास्ति चक्र-
प्रतिहतवीर्यबलस्य सोऽन्यलोक्यः।।20।।

कलिङ्ग उवाच
इति निजभटशासनाय देवो
रवितनयस्स किलाह धर्मराजः।।
मम कथितमिदं च तेन तुभ्यं
कुरुवर सम्यगिदं मयापि चोक्तम्।।21।।


शनिवार, 19 अक्टूबर 2019

करवाचौथ एक विश्लेषण/ करवाचौथका इतिहास

करवाचौथ शब्द संस्कृतके करकचतुर्थी शब्दका अपभ्रंश लगता है। किन्तु करवाचौथ के अवसर पर पूजी जाने वाली माता करकचतुर्थीके गणेशसे भिन्न है। क्योंकि प्राय सभी चतुर्थी तिथियाँ गणेशजीको समर्पित हैं। यद्यपि यह किसी महर्षि समर्थित पुराणोपपुराणका विषय नहीं फिर भी यह छद्म तथा धर्मविनाशक है ऐसा नहीं समझा जा सकता। जैसे वेदके पश्चाद् उपनिषद् आये इनके विस्तारका श्रेय क्षत्रीयोंको जाता है। जैसे कुछ दशक पूर्व तक सत्यनारायण व्रतकथा का मूल अज्ञात था,कुछ हद तक अब भी मूल पुराणमें अप्राप्त है। पर विस्तार संपूर्ण भारतवर्षमें वैसे ही यह व्रत भी करकचतुर्थीका विस्तार है।ऐसा अनेकोंका मत है। करवाचौथ की एक कथा इसे महाभारतकाल तक ले जाती है। जिसमें कहा गया है कि अर्जुनके तपके लिए जानेके बाद व्यथित द्रौपदीने इस व्रतको किया। अब यह प्रसंग महाभारतमें हुबहू ऐसा मिलना कठिन है । कुछ अन्तरके साथ मिलने वाले व्रतोंको इसका मूल मानाजाये तो ऐसा संभव है कि महाभारत वर्णित अनेक व्रतोंमे से एक हो। किन्तु कोई भी ग्रन्थ पुस्तक या लेखमें इसके संस्कृत पाठको पाना दुस्कर कार्य है। यदि हम मान भी लें कि करवाचौथ जैसे कहा जाता है वैसे महाभारतकालका है और इस व्रतको माँ पार्वतीने पहले किया था फिर कृष्णके कहने से द्रौपदीने किया। किन्तु समस्या करवा शब्द और करवा देवीसे होती है। देवीके अनेकरूप हैं इसलिए करवा भी देवीका ही एक स्वरूप है ऐसा मानकर समाधान करभी लें तो भी प्रश्न अविचल खाडा रहता है कि  इसे किस ग्रन्थ मे या किस शास्त्रमें परिभाषित किया है? अब कहने वाले इसे आधुनिक मीडियाके प्रभावसे विकृत मानते हैं। इस कथनमे मेरी दृष्टि में कोई अतिशयोक्ति नहीं लगती। क्योंकि जैसे विवाहके सप्तपदीको मीडियाने ऐसा दुष्प्रचार किया कि आज सप्तपदी सातफेरेका रूप धाण करचुका है। जबकि शास्त्रसम्मत चार ही फेरे होने चाहिए। फेरे या परिक्रमा भिन्न है, तथा सप्तपदी और वचन अलग विषय है। इस विषयको आधुनिक मिडियाके प्रभावसे ग्रस्त दुनियाके लोग समझते ही नहीं बल्कि  विवाहमें कोइ पण्डित चार फेरे लगवालेगा तो वीडियो बनाने वाला यह कहता है पंडितजी सात करवाओ नहीं तो ये तुम्हें तो दक्षिणा देकर विदाई करेंगे लेकिन हमें दिहाडी भी नहीं देंगे दिहाडी लेनेके लिए दूसरेके विडीयोकोके फुटेजको जोडकर सात फेरे पूरे करने होंगे। बहुधा यही होता भी है और बहुतसे शादियों में तो यह भी सुनाई देता है कि सात फेरे न लगानेसे फलाँ की शादी टूटी और फलाँ की भाग गई। गजब लोग हैं इस देश में गजबके परंपरायें भी। जो कभी परंपराका हिस्सा न थी वो अब पूरा न होने पर घातक भी हो गई। ऐसा ही कुछ भावनात्मक रूपसे ब्लैकमेल है यह करवा चौथ भी। गाँव हो या सहर जो करवाचौथके दिन पानी भी पी ले वो पक्की कुलटा और बेवफा मानी जायेगी न! अब देखा देखीके इस भेडचालके गणितको फिल्म और मीडिया वाले भुनाने में तो माहिर होते ही हैं। अब तो पुरुष भी प्यार प्रदर्शनके इस त्यौहारमें कैसे पीछे रहे? वो भी करने लगा। खुसी ही है। क्योंकि हमारे पूर्वजों ने पुरुषके लिये कोई खास व्रत नहीं बनाये सो अब मीडियावाले अप्रोच कर रहें हैं। 

गुरुवार, 17 अक्टूबर 2019

तुलसीदल कब तोडना चाहिए कब नहीं


तुलसीदल कब तोडना चाहिए कब नहीं इस विषय पर शास्त्रोंमें निर्णय दिया गया है। उन वाक्योंको एक एक करके रखा जाता है।
वैधृतौ च व्यतिपाते भौमभार्गवभानुषु।
पर्वद्वये च संक्रान्तौ द्वादश्यां सूतकद्वये।।
तुलसीं ये विचिन्वन्ति ते छिन्दन्ति हरेः शिरः। स्मृतिसार
जो मनुष्य वैधृति तथा व्यतिपात योगमें मंगलवार शुक्रवार तथा रविवारको एवं दोनों पर्व अर्थात् अमावास्या तथा संक्रान्तिको द्वादशी तिथिमें एवं मरण जनन आशौचमें तुलसीदल का छेदन करता है वह साक्षात् भगवानका सिर छेदन करता है। अतः इन दिनों में तुलसी दल नहीं तोडना चाहिए।
विष्णुधर्मोत्तर पुराणमें कहा गया है-
संक्रान्तौ अर्कपक्षान्ते द्वादश्यां निशिसन्ध्ययोः ।
यैश्छिन्नं तुलसीपत्रं तैश्छिन्नं हरिमस्तकम्।।
जो संक्रान्ति, पूर्णिमा, अमावास्या, द्वादशी तिथी, रात्रीकाल एवं दोनों सन्ध्याके समयमें तुलसी पत्र छेदन करता है, वह भगवान श्रीहरिका मस्तक छेदन करनेके समान कार्य करता है।
अतः सज्जन साधकको इस विषयमें ध्यान रखते हुए तुलसी पत्र तोडना चाहिए तुलसी पत्र तोडनेके लिए मंत्र विहित हैं। 

अहोई अष्टमी


21 अक्तूबर 2019 (सोमवार): अहोई अष्टमी। कालाष्टमी। दाम्पत्याष्टमी। श्री शीतलाष्टमी। के रूप में प्रसिद्ध है। यह व्रत सन्तानकी दीर्घ आयु के लिए समर्पित है। इस दिन राधाकुण्ड मथुरामें श्रद्धालु स्नान करते हैं। इस दिन दिनभर अष्टमी तिथि होनेसे किसी प्रकारकी आशंका नहीं है। अतः निसन्देह होकर इस दिन व्रत तथा पूजन कर सकते हैं। इस व्रतमें विशेषकर तारोंको अर्घ्यदान करके व्रतको खोला जाता है।

दीपावलीके लिए शुभकाल मुहूर्त



दीपावली पूजन कार्तिक कृष्ण अमावास्याको प्रति वर्ष किया जाता है। 2019 में यह योग 27 अक्तूबरको सन्ध्याकाल निश्चित किया गया है।
कार्तिकस्यासीते पक्षे लक्ष्मीर्निदां विमुञ्चति।  
स च दीपावली प्रोक्ता सर्वकल्याणरूपिणी।।
यद्यपि इस वर्ष शुक्र अस्त होनेके कारण कुछ आचार्योंके मतमें लेन देनके लिए बहुत अधिक शुभ समय नहीं माना गया है। फिर भी दीप पूजन लक्ष्मीपूजनके लिए शुभ मुहूर्त 12-25 दोपहरके पश्चात् है। इस वर्षका प्रदोषकाल संध्यामें सूर्यास्तके समय है।
17.40 मिनट से लेकर 19.18 तक शुभ बेला
19.18 से 20. 56 तक अमृत बेला  
यह समय अत्यन्त फलदायक है।
स्थिर लग्नमें लक्ष्मीपूजनके इच्छुक महानुभाव
दिनमें 14.12 बजे से 15.40 तक कुम्भ लग्नमें करें
सन्ध्यामें 18. 40 से लेकर 20. 35 तक सर्वाधिक शुभ समय है उसी समय समस्त पूजनका कार्य पूर्ण करें।
17. 04 से 18.40 का समय भी मेष लग्न होने से शुभ है।
जो अर्धरात्री पर्यन्त पाठ या जप करवाते हैं वे निरन्तर आगे कर सकते हैं।

बुधवार, 16 अक्टूबर 2019

करवाचौथ मुहूर्त

करवाचौथ दिनांक 17-10-2019को  सूर्योदय 6:22 प्रात: (दिल्ली) आरंभ होकर रात्री चन्द्र दर्शन 8:15 Pm तक है पूजनके लिए शुभ महूर्त 5:51Pmके बाद 7:15 Pmतक है। 

धन त्रयोदशी

धन त्रयोदशी सामान्यत: कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी जिस दिन सायंकालको व्याप्त हो उस दिन मनाई जाती है। जिसे शास्त्रकी भाषामें प्रदोष व्यापिनी तिथी कहा जाता है। इस दिन  सुवर्ण से लेकर अनेक रत्न तथा बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। इस वर्ष यह 25-10-2019 के सन्ध्याको प्रदोष काल 6:37 मिनट से आरंभ (दिल्ली) है।

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