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मंगलवार, 17 जनवरी 2017

नारायणास्त्रम् / नारायणास्त्र

यह नारायणास्त्रम् को सर्वसाधारण के सौलभ्य के लिये पोष्ट किया जा रहा है। यह मन्त्र शुक्लयेजुर्वेदीय माध्यन्दिन शाखानुसारि आह्निक सूत्रावली से उद्धृत किया गया है। 
यह सिद्ध मन्त्र  सात्विक भाव समन्वित 
साधकों को अत्यन्त लाभ दायक सिद्धानुभूत है। यह मन्त्र भगवान् विष्णु को समर्पित है। प्रस्तुत मंत्रकी साधना से दुर्लभ से दुर्लभतर कार्य सिद्ध होते हैं। इसे भगवान नारायण का साक्षात् जीवित मन्त्र कहा जाता है। सद्गुरू की कृपावलेश से सत्व गुण वर्धन हेतु विगत पाँच वर्षों से यह साक्षात् अनभूत वर्णन है।

****अथ श्रीनारायणास्त्रम्****
हरिःॐ नमो भगवते श्रीनारायणाय नमो नारायणाय विश्वमूर्तये नमः। श्रीपुरुषोत्तमाय युष्मद्दृष्टिप्रत्यक्षं वा परोक्षं वा अजीर्णं पञ्चविषूचिकां हन हन। ऐकाहिकं द्व्याहिकं त्र्याहिकं चातुर्थिकं ज्वरं नाशय नाशय। चतुरशीतिवातानष्टादशकुष्ठान् अष्टादशक्षयरोगान् हन हन। सर्वदोषान् भञ्जय भञ्जय। तत्सर्वान् नाशय नाशय। शोषय शोषय आकर्षय आकर्षय । शत्रून् मारय मारय। उच्चाटय उच्चाटय। विद्वेषय विद्वेषय। स्तम्भय स्तम्भय। निवारय निवारय। विघ्नैर्हन हन दह दह मथ मथ विध्वंसय विध्वंसय। चक्रं गृहीत्वा शीघ्रम् आगच्छ आगच्छ। चक्रेण हत्वा परविद्यां छेदय छेदय भेदय भेदय। चतुरःशीतानि विस्फोटय विस्फोटय। अर्शोवातशूलदृष्टिसर्पसिंहव्याघ्रद्विपचतुष्पदपदे बाह्यदिवि भुव्यन्तरिक्षे अन्यानपि कांश्चित् तद्द्वेषकान् सर्वान् हन हन। विद्युन्मेघनदीपर्वताटवीसर्वस्थानरात्रिदिनपन्थाचौरान् वशं कुरु कुरु।
अथ मन्त्रः –
 हरिःॐ नमो भगवते ह्रीं हुं फट् स्वाहा ठ ठ ठ ठ हृदयादत्ता।।


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