भगवान गणेश
वस्तुतः निराकार परब्रह्म
ही हैं भक्तों के
कष्ट निवारण तथा सन्मार्ग पथ प्रदर्शनके लिये उन्होंने भी अनेक लीलायें की। उनकी
ये लीलायें अनेक पुराणों में वर्णित हैं।
अनेक मत अनेक संप्रदाय को
मानने वाले हैं हमारे सनातन परंपरा मे किन्तु गणेश की पूजा के विषय मे किसी
का भी मत वैभिन्य नहीं है। चाहे वो शिव को मानता हो चाहे विष्णुको चाहे वो देवी को
मानता हो। किन्तु प्रथम गणपति पूजन तो सभी के यहाँ होता है। जहाँ कोई भी आयोजन हो
पूजते पहले गणेश को हैं।
घर से बाहर
निकलते समय मंगल कामना करते हैं तो सबसे पहले गणपती
विद्या का
आरंभ हो
घर निर्माण
करना हो मंगल मूरती की पूजा
गृह प्रवेश
हो देहली गणेश की पूजा
व्यापार को
आरंभ करना हो सिद्धि विनायक की पूजा
परीक्षा
लिखनी हो बुद्धिविनायक की पूजा
विवाह हो
हे रम्ब गणेश की पूजा
कोई भी
उत्सव हो श्री गणेश के विना किसी काम को नहीं करते
प्रत्येक
सत्संग के लिये वो चाहे माता की चौकी हो चाहे किसी अन्य देवता की भजन संध्या पूजन
सुमिरन तो प्रथ गणपति की ही होती है।
(गणेश भगवानकी विशेष मन्त्र साधना करना चाते हैं तो इसे देखें त्रैलोक्यमोहन गणपति मन्त्र)
(गणेश भगवानकी विशेष मन्त्र साधना करना चाते हैं तो इसे देखें त्रैलोक्यमोहन गणपति मन्त्र)
गणपति
गणेश को उमापति महादेव को मेरा प्रणाम है जी मेरा प्रणाम है।
अंजनी
के पूत को राम जी के दूत को मेरा प्रणाम है जी मेरा प्रणाम है।
माँ
शेरा वाली को खण्डे खप्पर वाली को मेरा प्रणाम है जी मेरा प्रणाम है।
राम
जिनका नाम है अयोध्या जिनका धाम है
ऐसे
श्री भगवान को मेरा प्रणाम है।
कृष्ण
जिनका नाम है मथुरा जिनका धाम है।
ऐसे
श्री भगवान को मेरा प्रणाम है।
शंकर
जिनका नाम है कैलाश जिनका धाम है।
ऐसे
श्री भगवान को मेरा प्रणाम है।
विष्णु
जिनका नाम है सागर जिनका धाम है
ऐसे
श्री भगवानको मेरा प्रणाम है।.
सदा भवानी
दाहिनी गौरिपुत्र गणेश पंच देव रक्षा करें ब्रह्मा विष्णु महेश।।
इस लिये ये सर्व प्रिय देव हैं। प्रत्येक मंगल
कार्य का आरंभ इनसे होने से इनका नाम ही मंगल मूरती है। सारे शुभता के ये स्वामी
हैं ये इस लिये इन्हें गणराज कहते हैं।
गणेश जी के
विद्या रूप परम प्रसिद्ध है परा और अपरा दोने प्रकारके विद्या को देने के कारण।
गणपत्यर्थर्वशीर्ष
में गणेश को साक्षात् ब्रह्म कहा है – त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि।
इनकी पूजा
भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी को किया जाता है।
एक तो इस दिन इनका जन्म हुआ
कश्यप
नन्दन महोत्कट के रूप में।
गुणेश के
रूप में शिव के घर में।
दूसरा उनके
भक्तों को वर प्रदान भी इसी
दिन किया था
भौम को वर
दिया था
अतिथी के
रूप में काशी राज के घर भी प्रभु इसी दिन गये थे ऐसा सन्तों का मत है।
इस लिये
भाद्रपद मास के चतुर्थी को विशेष उत्सव मनाया जाता है
जब द्वापर
युग मे भगवान गुणेश जा काशि नरेश के यहाँ अतिथि के रूप में पहुंचे थे तो भी यह दिन
भाद्र पद मास की चतुर्थी थी इस लिये भी पूजा जाता है।
उस दिन को शाप भी है चन्द्रके दर्शन
नहीं करनी चाहिये।
चन्द्रमाने
गणेश की अवहेलना की फलस्वरूप क्षय रोगी तथा अदर्शनीय वपु होने का शाप दिया।
गणेश जी का
वायाँ दन्त भग्न हुआ
है।
एक बार
परशुराम जी शिवपार्वती के दर्शनार्थ कैलाश आये ( ब्रह्मवैवर्त पुराण)
द्वार पर
विराजमान गणेश जी ने परशुराम को सूँडसे
पटक दिया ।
परशुराम ने
भी परशु प्रहार किया गणेश जी का एक वायाँ दाँत खण्डित हो गया।
गणेश जी का वाहन मूषक है। इस पर भी अनेक कथायें हैं।
भविष्य पुराण की कथा
के अनुसार गणेश जी ने अपने नटखटपन से कुमार कार्तिकेय को परेशान कर दिया। क्रोधित
होकर कार्तिक ने गणेश जी का एक दांत तोड़ दिया। जब गणेश जी ने इसकी शिकायत
भगवान शिव से की तो कुमार कार्तिकेय ने दांत गणेश जी को वापस कर दिया लेकिन एक
शाप भी दे दिया कि गणेश जी को अपने हाथ में हमेशा दांत पकड़े रहना होगा।
शिव परिवार
को याद करें जरा
अत्तुं वाञ्छति
वाहनं गजपतेः
सर्वथा
विपरीत अवस्था का परिचायक है गार्हस्थ जीवन
गणेश के वाहन को भगवान शंकर जी के आभुषण के रूप में विद्यमान सर्प खाना चहते हैं भगवान कार्तिकेय का वाहन मोर उन सर्पोे को खाने के लिये ललचा रहा है। इधर माँ पार्वती का वाहन सिंह शंकर के वाहन नन्दी को भोजन बनाना चाहे तब? ऐसी विकटतम परिस्थितियाँ होने पर भी शान्त दान्त कुटुंब है भगवान शंकर का।
यही शिक्षा
देने के लिये भगवान ने कुटुम्ब को ऐसा दिखाया।
माँ पार्वती अन्न पूर्णा हैं सारी त्रिलोकी उनसे
भिक्षा माँगती है। किन्तु भूतभावन भोलेनाथ हाथ में कपाल पात्र ले कर भिक्षाटन में
सारा संसार भ्रमण कर रहे हैं।
गणेश जी के
वास्तविक स्वरूप को देखें
वे विनायक हैं क्योंकि विगतः
नायकः ( नहीं है नायक जिसका) अथवा विशिष्टः नायकः असौ विनायकः (जो नायकों मे
विशिष्ट है)
विना नायकेन जातः असौ विनायकः
अर्थात् इसका कोई नायक नहीं है मात्र नायिका द्वारा प्रकट हुआ है।
इस अर्थ
में भगवान माता पार्वती से उत्पन्न हुये
विशिष्ट असौ नायकः से ये ब्रह्माण्डके अधिनायक चर अचर के नियन्ता
हुये।
भगवान का
एक और नाम है गुणेश
जो त्रिगुणातीत हो वही गुणेश कहलाता है।
दूसरा नाम
है गणेश
गण कहते
हैं समूह को
आधि दैविक दृष्टि से भगवान सम्पूर्ण देव गणों के स्वामी हुए।
आधि भौतिक
अर्थ में दृश्यमान सम्पूर्ण
जगत के स्वामी हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से भगवान सम्पूर्ण सद्गुणों के स्वामी हैं
सिद्धि बुद्धी शुभ
लाभ तुष्टी पुष्टी आनन्द प्रमोद संतोषी माता ये परिवार है गणेश जी का ।
सत्व गुण
से सम्पन्न हो ने पर ये सब गुण अपने भीतर आजाते हैं।
ऐसे
सत्वगुण के अधिनायक भगवान को कैसे अपनाया जा सकता है।
श्री तुलसी
दास जी कहते हैं
मन क्रम वचन छाडि चतुराई भजत कृपा करीहहीं रघुराई।
जीवन में
अहंकार के लिए स्थान न हो
सद्गुरूका
आशिर्वाद हो तो अवश्य भी उसे वह पद मिलता है।
अन्यथा उस
मनुष्य की तरह हो जायेगा
जो मृत्यु
के द्वारा पाँच मिनट पाने पर भी वह अपने लिये नहीं दूसरों के बुराई करने में खर्चा
कर देता है।
जब हम इस
लोक से चलें और उस परम पिता से मिलन हो तो बता सकें कि हमने इस अनमोल जीवन को पाकर क्या किया।
जब हम आये इस जग में जग हँसा हम रोये। ऐसी करनी कर
चलो हम हँसे जग रोये।।
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