प्रस्तुत विपरीतप्रत्यङ्गिरा
स्तोत्रका पाठ यहाँ पर रखा जा रहा है। इसके आरंभमें न्यास करनेका विधान दिया है,
तथा पाठ विधिको संस्कृत मूलमें रखा गया है। जो संस्कृतको जानते हैं वे तो अर्थ जान
लेंगे और इसकी विधि भी जान लेंगे। जिन्हें अर्थ चाहिये उनके लिए अलगसे पोष्टमें
संपूर्ण विधिके साथ शिघ्र यहीं प्रकाशित करदिया जायेगा।
विपरीत
प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम्
श्री
प्रत्यङ्गिरायैनमः
हाथमें
जल लेकर निम्न विनियोगको पढें –
अथ
विनियोगः ॐ अस्य श्रीविपरीत-प्रत्यङ्गिरामन्त्रस्य भैरव ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीविपरीतप्रत्यङ्गिरा देवता, मम अभीष्ट सिद्धये जपे विनियोगः।
न्यास
सर्वप्रथम
करन्यास –
ॐ
ऐं अगुष्ठाभ्यां नमः (दोनो अंगूष्ठका स्पर्श)
ॐ
ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः ( दोनो तर्जनीका स्पर्श)
ॐ
श्रीं मध्यमाभ्यां नमः ( दोनो मध्यमाका स्पर्श)
ॐ
प्रत्यङ्गिरे अनामिकाभ्यां नमः (दोनो अनामिका स्पर्श)
ॐ
मम शत्रून् भञ्जय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः (दोनों हथेलीके उपर नीचेके भागका स्पर्श)
अब
इसी प्रकार हृदयादिका न्यास भी करना चाहिए
ॐ
ऐं हृदयाय नमः (हृदयका स्पर्श)
ॐ
ह्रीं शिरसे स्वाहा ( मस्तकके उपर स्पर्श)
ॐ
श्रीं शिखाय वौषट् ( शिखाका स्पर्श)
ॐ
प्रत्यङ्गिरे कवचाय हूं (कवचके आकारमें
हाथसे दोनों स्कन्धका स्पर्श)
ॐ
मम शत्रून् भञ्जय नेत्रत्रयाय वौषट् (अंगुष्ठ अनामिका एवं मध्यमाके द्वारा तीनों
नेत्रका स्पर्श)
(कहीं कहीं पर नेत्राभ्यां वषट् प्रयोग भी मिलता है अतः साधक
स्वयंके विवेक से न्यासमें परिवर्तन भी कर सकता है।)
ॐ
ऐं ह्रीं श्रीं प्रत्यङ्गिरे मां रक्ष रक्ष अस्त्राय फट् ( दाहिने हाथको
वायींतरफसे शिरके उपरसे घुमाते हुए वायें हथेलीपर तालिका वादन)
मूल
मन्त्र - ॐ ऐं ह्रीं श्रीं प्रत्यङ्गिरे मां रक्ष रक्ष मम शत्रून्भञ्जय भञ्जय फे
हुँ फट् स्वाहा।
(जप
तथा पाठका विधान करने वाला स्तोत्र)
अष्टोत्तरशतञ्चास्य
जपं चैव प्रकीर्तितम्।
ऋषिस्तु
भैरवो नाम छन्दोऽनुष्टुप् प्रकीर्तितम्।।1।।
देवता
दैशिका रक्ता वामप्रत्यङ्गिरेति च।
पूर्वबीजैः
षडङ्गानि कल्पयेत्साधकोत्तम।।2।।
सर्वदृष्टोपचारैश्च
ध्यायेत्प्रत्यङ्गिरां शुभाम्।
(ध्यानके
लिए श्लोक)
टङ्कं कपालं डमरुं त्रिशूलं
सम्भ्रिती चन्द्रकलावतंसा।
पिंगोर्ध्वकेशाऽसितभीमद्रंष्ट्रां
भूयात्विभूत्यै मम भद्रकाली।।3।।
एवं
ध्यात्वा जपेन्मंत्रमेकविंशतिवासरान्।
शत्रूणां
नाशनं ह्येतत्प्रकाशोऽयं सुनिश्चियः।।4।।
अष्टम्यामर्धरात्रे
तु शरत्काले महानिशि।
आराधिता
चेत् श्रीकाली तत्क्षणात् सिद्धिदा नृणाम्।।5।।
सर्वोपचारसम्पन्ना
वस्त्ररत्नकलादिभिः।।
पुष्पैश्च
कृष्णवर्णैश्च साधयेत् कालिकां वराम्।।6।।
वर्षादूर्ध्वमजम्मेषम्मृदं
वाथ यथाविधिः।।
दद्यात्
पूर्वं महेशानीं ततश्च जपमाचरेत्।।7।।
मूलमन्त्रेण
रात्रौ च होमं कुर्यात् समाहितः।।
मरीचलाजालवणैस्सर्षपैर्मरणं
भवेत्।।8।।
महा
जनपदे चैव न भयं विद्यते क्वचित्।।
प्रेतपिण्डं
समादाय गोलकं कारयेत्ततः।।9।।
मध्ये
वामाङ्कितं कृत्वा शत्रुरूपांश्च पुत्तलीन्।।
तत्रायुतं
जपं कुर्यात् त्रिराद्यं मारणं रिपोः।।
महाज्वाला
भवेत्तस्य तद्वत्ताळशलाकया।।10।।
गुदद्वारे
प्रदद्याच्च सप्ताहान्मारणं रिपोः।।
प्रत्यङ्गिरा
मया प्रोक्ता पठिता पाठिता नरैः।। 11।।
लिखित्वा
च करे कण्ठे बाहौ शिरसि धारयेत्।।
मुच्यते
सर्वपापेभ्यो नाल्पमृत्युः कथंचन।।
ग्रहाः
ऋक्षास्तथा सिंहा भूता यक्षाश्च राक्षसाः।।12।।
तस्य
पीडां न कुर्वन्ति दिवि भुव्यन्तरिक्षगाः।।
चतुष्पदेषु
दुर्गेषु वनेषूपवनेषु च।।
श्मशाने
दुर्गमे घोरे संग्रामे शत्रुसङ्कटे।।13।।
जपके
लिए मंत्र –
ॐ
ॐ ॐ ॐ ॐ कुं कुं कुं मां सां खां पां लां क्षां ॐ ह्रीं ह्रीं ॐ ॐ ह्रीं बां धां मां सां रक्षां कुरु। ॐ
ह्रीं ह्रीं ॐ सः हुँ ॐ ॐक्षौं वां लां
धां मां सां रक्षां कुरु। ॐ ॐ प्लुं रक्षां कुरु। ॐ नमो विपरीतप्रत्यङ्गिरायै
विद्याराज्ञि त्रैलोक्यवशंकरि तुष्टिपुष्टिकरि सर्वपीडापहारिणि सर्वापन्नाशिनि
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिनि मोदिनि सर्वशस्त्राणां भेदिनि क्षोभिणि
तथा परमतन्त्र-मन्त्र-यन्त्र-विषचूर्ण-सर्वप्रयोगादीन्येषां निवर्तयित्वा यत्कृतं
तन्मेऽस्तु कलिपातिनि सर्वहिंसा मा कारयति, अनुमोदयति मनसा वाचा कर्मणा ये
देवासुरराक्षसास्तियग्योनि-सर्वहिंसकाविरूपकं कुर्वन्ति मम मन्त्र-तन्त्र-यन्त्र-विष-चूर्ण-सर्वप्रयोगादीनात्महस्तेन
यः करोति करिष्यति कारयिष्यति तान् सर्वान् अन्येषां निवर्तयित्वा पातय कारय
मस्तके स्वाहा।
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