प्रस्तुत लेख मम्मटके काव्यप्रकाश की झळकीकर टीका के आधार पर बनाये गये सीरीज हैं। इसमें झळकीकर (वामन भट्ट झलकीकर) टीकाके साथ साथ अन्य संस्कृतके टीकाकारों के मत भी यथा स्थान रखे गये हैं।
आप इसके प्रथम लेख यहाँ तथा दूसरा लेख यहाँ जाकर पढ सकते हैं।
इस सीरीज का तीसरा लेख देखने यहाँ जायें।
जिससे संपूर्ण पंचम उल्लासका आनन्द लिया जा सके।
गुणीभूत व्यङ्ग्य दूसरा भेद अपरस्याङ्ग
यह भेद अपरस्याङ्ग अर्थात् दूसरेका अङ्ग बन जाने के कारण होता है। अब प्रश्न उठता है कौन किसका अङ्ग बन जायेगा? इसका उत्तर सरल भाषा में कहें तो व्यङ्ग्य जहाँ वाच्यका या एक व्यङ्ग्य अन्य व्यङ्ग्यका अङ्ग बने। व्यङ्ग्य जहाँ अन्य का अङ्ग अर्थात् सहयोगी होकर गौण हो जाये वहाँ अपरस्याङ्ग गुणी (गौण) व्यङ्ग्य कहा जायेगा। अब मम्मटके पंचम उल्लासके आधार पर इसे समझते हैं।
1. भाव, रसाभास, भावाभास, भावशान्ति, भाव उदय, भाव संन्धि, भाव शबलता इत्यादि जिनको असंलक्ष्यक्रम ध्वनि कहते हैं, वे सभी व्यङ्ग्य अर्थसे निकले के कारण व्यङ्ग्य हैं।
2. लक्षणा मूल ध्वनि जिसे संलक्ष्यक्रम ध्वनि कहा गया है जिसके लक्षणा तेन षड्विधा कहकर मम्मट ने परिभाषित किया है वे सब भी व्यङ्ग्य हैं क्योंकि वहांँ पर जो लक्ष्यार्थ होता है वह भी वाच्यार्थ से भिन्न होता है।
3. अभिधामूल ध्वनि या अभिधा मूल व्यञ्जना। जहाँ वाच्यार्थके आधारपर व्यङ्ग्यार्थ निकलता हो वह भी व्यङ्ग्य ही है।
ये तीनो प्रकार के व्यङ्ग्य जब अपने आप को गौण बनाते हुए दूसरे वाक्यार्थीभूत अथवा वाक्यतात्पर्य भूत अर्थ के अङ्ग बन जायें उस दशा में अपरस्याङ्ग गुणीभूत काव्य कहलाता है। इस प्रकार एक रस दूसरे रस का अंग भी बन सकता है, रस भावका भी अंग बन सकता है, भाव भाव का भी, ऐसे अनेक उदाहरण बन सकते हैं। इसीको ध्यान मे रखते हुए आचार्य मम्मट यहाँ दस उदाहरण देते हैं। प्रथम आठ उदाहरण में व्यङ्ग्य व्यङ्ग्यका अङ्ग हो रहा है। अन्तिम दो उदाहरण अभिधामूल ध्वनिके दे रहे हैं जिसमें व्यङ्ग्य वाच्यका अङ्ग बन गया है। अब हम उनको एक एक करके समझते हैं कैसे एक दूसरे का अंग बना है। यह उदाहरण शृङ्गार रसके करुण रसाका अङ्ग बननेका उदाहरण है।
अयं स रसनोत्कर्षी पीनस्तनविमर्दनः।
नाभ्यूरुजघनस्पर्शी नीविविस्रंसनः करः।।
नाभ्यूरुजघनस्पर्शी नीविविस्रंसनः करः।।
पहले इसके
अर्थ को समझते हैं अयं करः यह हाथ है, किस प्रकार का है - रशना अर्थात्
स्त्रियोंके कमरमें बाँधाजाने वाला कमरबन्ध या एक प्रकारकी मेखला को खींचने वाला,
पीन – उठे हुए स्तनों का मर्दन करने वाला, नाभी, उरु तथा जङ्घाओंका स्पर्श करने
वाला तथा नीवि को खोलने वाला है।
आपाततः इसके शब्दों से तो यही अर्थ
लगता है कि कोई पत्नी या नायिका अपने प्रिय के हाथ को देखकर रतिकाल के अन्तरंग
क्षणों मे हाथ से होने वाले समस्त क्रियाओं का स्मरण कर रही है। अतः संभोग शृङ्गार
है। किन्तु यह उदाहरण महाभारत का है। महाभारत के स्त्रीपर्व के चौवीसवें अध्याय
में रणभूमि में गिरा हुआ भूरिश्रवाके हाथको देखती हुई भूरिश्रवाकी पत्नियाँ विलाप
कर रहीं हैं तथा स्मरण कर रही हैं वही प्यारा हाथ है। अतः प्रसङ्ग दुःख विलाप
संवलित करुण का है। इसी बात को झलकीकर कहते हैं यहाँ स्मर्यमाण होने के कारण
नायिका विषयक तथा नायक निष्ठ ऐसा समझना चाहिये।
यहाँ आये हुए शृंगार के प्रसङ्ग प्रकृत करुण के अङ्ग बन गये।
वाक्यतात्पर्य का अवसान करुण में होने के कारण मुख्य रस करुण हो गया। पूर्वघटित शृङ्गार के प्रसङ्ग के स्मरण से शोक और अधिक सघन हो गया। शोकाधिक्य से करुण ही आस्वादगोचर हो गया। फिर भी करुण के साथ साथ शृङ्गार है, गौण कैसे हो गया? इसके उत्तर में कहते है पूर्वघटित घटनाके स्मरणसे यहाँ शोक जो करुणका स्थायी है इतना पुष्ट हो गया कि शृङ्गार रस का स्थायी भाव जो रति है वह अपुष्ट हो गया। अतः शृङ्गार यहाँ करुणका अङ्ग बननेसे अपरस्याङ्ग नामक गुणीभूत व्यङ्ग्यता को प्राप्त हो गया।
यहाँ आये हुए शृंगार के प्रसङ्ग प्रकृत करुण के अङ्ग बन गये।
वाक्यतात्पर्य का अवसान करुण में होने के कारण मुख्य रस करुण हो गया। पूर्वघटित शृङ्गार के प्रसङ्ग के स्मरण से शोक और अधिक सघन हो गया। शोकाधिक्य से करुण ही आस्वादगोचर हो गया। फिर भी करुण के साथ साथ शृङ्गार है, गौण कैसे हो गया? इसके उत्तर में कहते है पूर्वघटित घटनाके स्मरणसे यहाँ शोक जो करुणका स्थायी है इतना पुष्ट हो गया कि शृङ्गार रस का स्थायी भाव जो रति है वह अपुष्ट हो गया। अतः शृङ्गार यहाँ करुणका अङ्ग बननेसे अपरस्याङ्ग नामक गुणीभूत व्यङ्ग्यता को प्राप्त हो गया।
अब शृङ्गर रस भाव का अङ्ग बननेका
उदाहरण दे रहे हैं।
कैलाशालयभाललोचनरुचा
निर्वर्तितालक्तक-व्यक्तिः पादनखद्युतिर्गिरिभुवः सा वः सदा त्रायताम्।
स्पर्धाबन्धसमृद्धयेव सुदृढं रूढा यया
नेत्रयोः कान्तिः कोकनदानुकारसरसा सद्यः समुत्सार्यते।।
अर्थ -
गिरिभुवः
पर्वत पुत्री पार्वती की नखों की कान्ति आप सबकी सदा रक्षा करें। वे कैसे नख हैं –
भगवान शङ्कर के मस्तक पर विराजमान तृतीय नेत्र से निकलते हुए रक्त कान्ति से
व्यक्त लाल महावर के समान हुए । स्पर्धाबन्ध
अर्थात् विजयकी इच्छा से किये शर्त के कारण अधिक बढी हुई जिस नखद्युति के द्वारा
पार्वतीके क्रोधसे आरक्त नेत्रोंकी लाल कमल का अनुकरण करने वाली सरस कान्ति तुरन्त
भगा दी जाती है।
अभिप्राय यह है कि पार्वती के चरण पर भगवान शम्भु झुके हुये हैं और भगवान पिनाक पाणी के तृतीय नेत्रसे निकलते हुए रक्त प्रकाश पार्वतीके चरणनख पर पड रहे हैं, इससे ऐसा लग रहा है कि पार्वती के क्रोधके कारण लाल हुए लाल कमल के सदृश आँखों के साथ भगवान शंकर के नेत्र कान्ति से लाल हुए नखों का पण अथवा शर्त हो गया। अब इस स्थिति में माँ पार्वती को भगवान शम्भुके चरण मे गिरने का स्मरण हो गया और वे लज्जा के कारण अपने पैरों को तुरन्त हटा लेती हैं। ऐसी नख कान्ति आप सब की रक्षा करें ।
यहाँ माँ पार्वती का रति जन्य क्रोध तथा कैलाशपति शम्भु उसके निवारण के लिए पादपतन का वर्णन होने से शृङ्गार रस हो गया। किन्तु हमे समझना गुणीभूत व्यङ्ग्य है। अब हमे यहाँ वक्ता कवि का तात्पर्यभूत अर्थ को समझना होगा। यहाँ मुख्य वाक्यार्थ गिरिभुवः नखद्युतिः वः सदा त्रायताम् अर्थात् पार्वती के नखकान्ति आप सब की रक्षा करें है। इस वाक्यार्थ से कवि की पार्वती विषयक भक्ति या प्रीति प्रकट होती है न कि शृंगार। अतः इस पद्य का तात्पर्य भूत अर्थ से द्योतित तो देव (पार्वती) विषयक भाव है। क्योंकि रतिर्देवादिविषया भावः इस नियम से देव नृप इत्यादि के प्रति जो प्रेम या रति है उसे भाव कहते हैं। अतः हम कह सकते हैं महादेव निष्ठ पार्वती विषयक संभोग रूप शृङ्गार रस यहाँ कविनिष्ठ पार्वती विषयक प्रीति भाव का अङ्ग बन गया। शृङ्गार का स्थायी भाव गौण हो गया। कवि की पार्वती विषयक रति या प्रीति मुख्य हो जाने से शृङ्गार के भाव का अङ्ग रूप गुणीभूत अपराङ्गव्यङ्ग्य या अपरस्याङ्ग माना गया।
अगला उदाहरण एक भाव दूसरे भाव का अङ्ग बननेका उदाहरण दे रहे हैं।
अभिप्राय यह है कि पार्वती के चरण पर भगवान शम्भु झुके हुये हैं और भगवान पिनाक पाणी के तृतीय नेत्रसे निकलते हुए रक्त प्रकाश पार्वतीके चरणनख पर पड रहे हैं, इससे ऐसा लग रहा है कि पार्वती के क्रोधके कारण लाल हुए लाल कमल के सदृश आँखों के साथ भगवान शंकर के नेत्र कान्ति से लाल हुए नखों का पण अथवा शर्त हो गया। अब इस स्थिति में माँ पार्वती को भगवान शम्भुके चरण मे गिरने का स्मरण हो गया और वे लज्जा के कारण अपने पैरों को तुरन्त हटा लेती हैं। ऐसी नख कान्ति आप सब की रक्षा करें ।
यहाँ माँ पार्वती का रति जन्य क्रोध तथा कैलाशपति शम्भु उसके निवारण के लिए पादपतन का वर्णन होने से शृङ्गार रस हो गया। किन्तु हमे समझना गुणीभूत व्यङ्ग्य है। अब हमे यहाँ वक्ता कवि का तात्पर्यभूत अर्थ को समझना होगा। यहाँ मुख्य वाक्यार्थ गिरिभुवः नखद्युतिः वः सदा त्रायताम् अर्थात् पार्वती के नखकान्ति आप सब की रक्षा करें है। इस वाक्यार्थ से कवि की पार्वती विषयक भक्ति या प्रीति प्रकट होती है न कि शृंगार। अतः इस पद्य का तात्पर्य भूत अर्थ से द्योतित तो देव (पार्वती) विषयक भाव है। क्योंकि रतिर्देवादिविषया भावः इस नियम से देव नृप इत्यादि के प्रति जो प्रेम या रति है उसे भाव कहते हैं। अतः हम कह सकते हैं महादेव निष्ठ पार्वती विषयक संभोग रूप शृङ्गार रस यहाँ कविनिष्ठ पार्वती विषयक प्रीति भाव का अङ्ग बन गया। शृङ्गार का स्थायी भाव गौण हो गया। कवि की पार्वती विषयक रति या प्रीति मुख्य हो जाने से शृङ्गार के भाव का अङ्ग रूप गुणीभूत अपराङ्गव्यङ्ग्य या अपरस्याङ्ग माना गया।
अगला उदाहरण एक भाव दूसरे भाव का अङ्ग बननेका उदाहरण दे रहे हैं।
अत्युच्चाः
परितः स्फुरन्ति गिरयः स्फारास्तथाम्भोधयः
तानेतानपि बिभ्रती किमपि न क्लान्तासि
तुभ्यं नमः।
आश्चर्येण मुहुर्महुः
स्तुतिमिति प्रस्तौमि यावत् भुवः
तावद्विभ्रदिमां स्मृतस्तव भुजो वाचस्ततो
मुद्रिताः।।
यह जयन्तभट्ट
कृत दीपिका टीका के अनुसार पञ्चाक्षरी नामक कवि की उक्ति है । कवि कहता है - हे पृथ्वी तुम अत्यन्त ऊँचे पर्वत
चारो ओर फैले हैं, उसी प्रकार अगाध समुद्र भी विस्तीर्ण हो रहा है। इस प्रकार के
भयंकर पर्वत तथा अगाध समुद्रको धारण करते हुए तुम किञ्चित् भी खिन्न या थकित नहीं
हो। ये आश्चर्य अभिभूत बार बार पृथ्वीकी स्तुति करता हूं ऐसा चिन्तन आया तब तक में, हे राजन् मुझे आपकी भुजा याद आगई जो ऐसी महान पृथिवीको भी सहजता से धारण कर रही
है। फिर मेरी पृथिवी स्तुति विषयक वाणी मुद्रित हो गई अर्थात् स्वयं रूक गई।
अब हम इसमे
रस विचार करते हैं। प्रथम तीन पद में कवि अनेक महान पदार्थों को धारण करने में
समर्थ पृथ्वीको देखकर कहता है। हे धरे तुम इतनी सामर्थ्यशालिनी हो कि इतने बडे़ बड़े पर्वतों को महान उछलते समुद्रोंको धारण करते हुए तनिक भी क्लान्त नहीं हो।
ऐसी आपकी शक्ति देखकर आपको बार बार नमन करनेका मन कर रहा है। इस वर्णन में कविनिष्ठ
पृथ्वी विषयक (प्रीति) भाव प्रकट होता है। अन्तिम चरण में कवि कहता है – जैसे ही
पृथ्वी की स्तुति करने लगा हे राजन् वैसी ही मुझे आप के भुजाएं स्मरण हो आईं। जो
इतनी विशाल और महान पदार्थों को धारण करने वाली पृथ्वी को धारण कर रहे हैं। अतः
मेरी वाणी पृथिवी का प्रसंशा करने से रूक गई। इस अन्तिम वर्णन में कविनिष्ठ राजा
विषयक रति भाव प्रकट हो रहा है। अब इनमे
से कौन किसका अङ्ग बना और कैसे गुणीभूत व्यङ्ग्य हुआ इस विषयको समझते हैं।
इस पद्य में कवि विवक्षित तात्पर्य अवसान भूत मुख्य अर्थ है तावत् इमां (पृथ्वीं) विभ्रत् तव भुजः स्मृतः ततो वाचः मुद्रितः । अर्थात् जैसे मैं पृथिवीकी स्तुति करने वाला था वैसे ही इस पृथिवीको धारण करने वाला हाथ स्मरण मे आया, और मेरी वाणी रुक गई। यहाँ कवि राजा के दोनों हाथों के स्थान पर एक हाथ मात्र को स्मरण कर रहा है – भुजः। इससे प्रष्ट है कवि राजा के महत्तातिशय को प्रकट कर रहा है। अतः मुख्य अर्थ यही हुआ। इसी कारण कवितात्पर्य अर्थ से निर्गत भाव भूपति विषयक है। प्रथम तीन पाद में वर्णित पृथ्वी विषयक भाव अन्तिम पाद गत राजा विषयक भावका उत्कर्षक हो गया। स्वयं गौण होकर राजाविषयक भाव को पोषित करने लगा। अतः हम कह सकते हैं पृथिवी विषयक रतिभाव राजाविषयक रतिभावका अंग बनने से (एक भाव दूसरे भाव का ) अपराङ्गव्यङ्ग्य गुणीभूत हो गया।
इस पद्य में कवि विवक्षित तात्पर्य अवसान भूत मुख्य अर्थ है तावत् इमां (पृथ्वीं) विभ्रत् तव भुजः स्मृतः ततो वाचः मुद्रितः । अर्थात् जैसे मैं पृथिवीकी स्तुति करने वाला था वैसे ही इस पृथिवीको धारण करने वाला हाथ स्मरण मे आया, और मेरी वाणी रुक गई। यहाँ कवि राजा के दोनों हाथों के स्थान पर एक हाथ मात्र को स्मरण कर रहा है – भुजः। इससे प्रष्ट है कवि राजा के महत्तातिशय को प्रकट कर रहा है। अतः मुख्य अर्थ यही हुआ। इसी कारण कवितात्पर्य अर्थ से निर्गत भाव भूपति विषयक है। प्रथम तीन पाद में वर्णित पृथ्वी विषयक भाव अन्तिम पाद गत राजा विषयक भावका उत्कर्षक हो गया। स्वयं गौण होकर राजाविषयक भाव को पोषित करने लगा। अतः हम कह सकते हैं पृथिवी विषयक रतिभाव राजाविषयक रतिभावका अंग बनने से (एक भाव दूसरे भाव का ) अपराङ्गव्यङ्ग्य गुणीभूत हो गया।
अगले उदाहरण में रसाभास तथा भावाभास
को भावका अङ्ग बननेका उदाहरण दे रहे हैं।
वन्दीकृत्य
नृप द्विषां मृगदृशस्ताः पश्यतां प्रेयसां
श्लिष्यन्ति प्रणमन्ति लान्ति
परितश्चुम्बन्ति ते सैनिकाः।
अस्माकं
सुकृतैर्दृशोर्निपतितोऽस्यौचित्यवारांनिधे
विध्वस्ता विपदोऽखिलास्तदिति तैः
प्रत्यर्थिभिः स्तूयते।।
हे राजन् (एक
तरफ ) तुम्हारे सैनिक को देखो वे शत्रुओंकी मृगनयनी पत्नियोंको शत्रुओं के सामने
ही आलिङ्गन कर रहे हैं (उन शत्रु पत्नियों के आश्लेष से क्रोधित होने पर क्रोध शान्त करने के लिए रति
इच्छा से) प्रणाम कर रहे हैं। पकड़ रहे हैं आत्मसात् कर रहे है, चारों ओर से घेर कर
(कामशास्त्र मे अवर्णित स्थान पर भी) चुम्बन कर रहे हैं। (दूसरे तरफ) तुम्हारे
शत्रु (जो हार गये हैं) कह रहे हैं - हे औचित्य के वारिधी राजन् हमारे पूर्वजन्मके
सत्कर्मके कारण आपके दर्शन हो गये, जिसके फलस्वरूप हमारी सारी विपत्तियाँ नष्ट हो
गईं।
प्रस्तुत पद्य में कोई कवि राजा की
स्तुति कर रहा है। प्रथम दो पाद मे कामुक सैनिक द्वारा शत्रु पत्नियों के साथ रमण
की इच्छा से बलात् आकर्षण, प्रणाम,
चुम्बन इत्यादि करने का वर्णन है। शास्त्रीय
दृष्टि से अन्योन्य रिरंसा को स्वीकार्य माना गया है न कि जबरदस्ती किसी के साथ पशुवत् लग जाना। उस पर भी आदौ वाच्यं
स्त्रियो रागः इत्यादि से पहले स्त्री के प्रेमको दिखाना चाहिए। यहाँ इसके विपरीत
है। एक तो स्त्रियाँ शत्रुपत्नियाँ हैं न कि कोई अविवाहित (अनूढा) अनुरक्ता। दूसरे
उनको अपनी इच्छा के विपरीत बलात् काम के लिए उकसाया गया है, अमर्यादित है। अतः यह सारा वर्णन अनौचित्य प्रवर्तित रति होने के कारण रस
तो हो नहीं सकता किन्तु रस जैसा आभास कराता है। इसलिए यह रसाभास कहलाता है। अन्तिम
दो पाद में हारे हुए शत्रु राजा तथा सेनायें जितने वाले राजा की स्तुति करते हुए कह
रहे हैं - हे राजन् बडे भाग्य से आज आपका दर्शन होगया और आपके दर्शन से हमारे सारे
कष्ट दूर हुए। शत्रु की स्तुति करना उस पर प्रेम प्रकटकना ये सब स्वाभाविक हो नहीं
सकता। शत्रु सैनिक द्वारा दूसरे शत्रु राजा की स्तुति बलात् किया गया है। यहाँ
इसप्रकार के वर्णन से औचित्य भंग हो गया है। अतः इसे अनौचित्य प्रवर्तित कहा जाता
है।
अब हम पुनः उस पद्य को स्मरण करते हैं जहाँ सैनिक शत्रुओंके सामने ही शत्रु पत्नियों के साथ अमर्यादित रतिक्रीडा में व्यस्त हैं वन्दी बने हुए सैनिक बलात् राजाकी स्तुति करने में व्यस्त हैं। अब क्या पद्यका तात्पर्य विषय यहीं समाप्त होता है ? उत्तर है नहीं क्योंकि यहाँ कविका तात्पर्यार्थ राजा का महिमागान करना राजा के पराक्रम की व्याख्या करना है। कवि कहना चाहता है हे राजन् देखो आपके प्रताप से जो असंभव है वह भी संभव हो रहा है। अतः काव्य का तात्पर्यार्थ हुआ राजा विषयक भाव। यही मुख्य अर्थ भी है। पूर्व में कथित अनौचित्य प्रवर्तित रसाभास तथा भावाभास मुख्य राजा विषयक रति भाव के अंग हो जाने से यह अपराङ्ग व्यङ्ग्य गुणीभूत व्यङ्ग्य हुआ। यही विषय प्रदीप तथा उद्योत टीका में भी वर्णित है।
अब हम पुनः उस पद्य को स्मरण करते हैं जहाँ सैनिक शत्रुओंके सामने ही शत्रु पत्नियों के साथ अमर्यादित रतिक्रीडा में व्यस्त हैं वन्दी बने हुए सैनिक बलात् राजाकी स्तुति करने में व्यस्त हैं। अब क्या पद्यका तात्पर्य विषय यहीं समाप्त होता है ? उत्तर है नहीं क्योंकि यहाँ कविका तात्पर्यार्थ राजा का महिमागान करना राजा के पराक्रम की व्याख्या करना है। कवि कहना चाहता है हे राजन् देखो आपके प्रताप से जो असंभव है वह भी संभव हो रहा है। अतः काव्य का तात्पर्यार्थ हुआ राजा विषयक भाव। यही मुख्य अर्थ भी है। पूर्व में कथित अनौचित्य प्रवर्तित रसाभास तथा भावाभास मुख्य राजा विषयक रति भाव के अंग हो जाने से यह अपराङ्ग व्यङ्ग्य गुणीभूत व्यङ्ग्य हुआ। यही विषय प्रदीप तथा उद्योत टीका में भी वर्णित है।
अग्रिम पद्यमें भावशान्ति भावका अंग
कैसे बना इसका उदाहरण देते हैं।
अविरलकरवालकम्पनैर्भ्रुकुटीतर्जनगर्जनैर्मुहुः।
ददृशे तव वैरिणां मदः स गतः क्वापि तवेक्षणे क्षणात्।।
सरलार्थ - हे राजन्
तुम्हारी अनुपस्थिति में शत्रुके द्वारा निरन्तर तलवार चलाने, भौंहें चढाकर डराने
और बार बार गरजने से तुम्हारे बैरियों का बडा अभिमान हमने देखा। किन्तु तुम्हें देखते ही न जाने वैरियोंका वह मद कहाँ चला गया।
यहाँ प्रथम अर्धाली में वर्णित शत्रुओंका हुंकार भरना, टेढी भृकुटी करना, तलवार चलाना इत्यादि क्रिया से वैरिगत मद भाव प्रकट हो रहा है। अन्तिम वाक्य मे राजा के देखने मात्रसे वह मद पददलित हो कर समाप्त होगया। यह वाक्यार्थ है।
इससे द्योतित होता है कि जो शत्रुविषयक मद था वह राजाके दृष्टिपात करने मात्र से वह मद भाव समाप्त होगया। अतः मद भाव शान्त होने से कहा गया भाव शान्ति। अब कवितात्पर्यार्थ को देखें तो यहाँ कवि के तात्पर्यार्थ का अवसान नहीं है अपितु राजाके गुणगौरव वर्णन करना राजा विषयक रति में तात्पर्यार्थ अवसित है। इसलिए भाव शान्ति यहाँ प्रधान न होकर कविनिष्ठ राजविषयक रति का अङ्ग बन गया। तथा राजविषयक रति भाव मुख्य हो गया। अतः यह भावप्रशम भावका अपराङ्गव्यङ्ग्य गुणीभूत व्यङ्ग्य का उदाहरण है।
इस पद्य में वैतालीय छन्द है। लक्षण -
षड्विषमेऽष्टौ समे कलास्ताश्च समे स्युर्नो निरन्तराः।
न समाऽत्र पराश्रिता कला वैतालीयेऽन्ते रलौ गुरुः।।
अर्थात् प्रथम और तृतीय पाद में छह मात्रायें फिर रगण लघु फिर गुरु द्वितीय चतुर्थ पाद में आठ मात्रायें फिर रगण तथा लघु गुरु होते हैं।
यहाँ प्रथम अर्धाली में वर्णित शत्रुओंका हुंकार भरना, टेढी भृकुटी करना, तलवार चलाना इत्यादि क्रिया से वैरिगत मद भाव प्रकट हो रहा है। अन्तिम वाक्य मे राजा के देखने मात्रसे वह मद पददलित हो कर समाप्त होगया। यह वाक्यार्थ है।
इससे द्योतित होता है कि जो शत्रुविषयक मद था वह राजाके दृष्टिपात करने मात्र से वह मद भाव समाप्त होगया। अतः मद भाव शान्त होने से कहा गया भाव शान्ति। अब कवितात्पर्यार्थ को देखें तो यहाँ कवि के तात्पर्यार्थ का अवसान नहीं है अपितु राजाके गुणगौरव वर्णन करना राजा विषयक रति में तात्पर्यार्थ अवसित है। इसलिए भाव शान्ति यहाँ प्रधान न होकर कविनिष्ठ राजविषयक रति का अङ्ग बन गया। तथा राजविषयक रति भाव मुख्य हो गया। अतः यह भावप्रशम भावका अपराङ्गव्यङ्ग्य गुणीभूत व्यङ्ग्य का उदाहरण है।
इस पद्य में वैतालीय छन्द है। लक्षण -
षड्विषमेऽष्टौ समे कलास्ताश्च समे स्युर्नो निरन्तराः।
न समाऽत्र पराश्रिता कला वैतालीयेऽन्ते रलौ गुरुः।।
अर्थात् प्रथम और तृतीय पाद में छह मात्रायें फिर रगण लघु फिर गुरु द्वितीय चतुर्थ पाद में आठ मात्रायें फिर रगण तथा लघु गुरु होते हैं।
अगले पद्यमें भावोदयको भावका अङ्ग
बननेका उदाहरण दे रहे हैं।
साकं
कुरङ्गकदृशा मधुपानलीलां कर्तुं सुहृद्भिरपि वैरिणि ते प्रवृत्ते।
अन्याभिधायि
तव नाम विभो गृहीतं केनापि तत्र विषमामकरोदवस्थाम्।।
सरलार्थ - कुरङ्गकदृशा
अर्थात् मृगनयनीयों के साथ एवं अपने सुहृदों के साथ मधुपान लिला अर्थात् मद्यपान
की गोष्ठी करने प्रवृत्त हुए किसी
तुम्हारे वैरीको उनके ही मित्र ने अन्य किसी प्रसङ्ग पर (अथवा दो अर्थ वाले शब्द
से) तुम्हारा नाम ले लिया जिससे उसकी अवस्था बडी विषम हो गई।
इस पद्य में कोई कवि शत्रु राजाकी
अवस्था का वर्णन कर रहा है। आरंभ मे राजा बडे आनन्द से रमणियों एवं मित्र मण्डलीके
साथ मधुपान लीला मे मस्त है। कुछ सुन्दरियाँ पेय पदार्थ परोस रही हैं। जैसे मान
लें शत्रु राजाका नाम मधुकर है और उस पान गोष्ठी में कोई मित्र कहता है मधुपानम्
आनय (मद्य लाओ) अब वह माँग तो मदिरा रहा था किन्तु मधु शब्द (अन्याभिधायी अन्य
अर्थ को बताने वाला) शत्रु राजा का नाम होने से अथवा शत्रु संबन्धित होने से सब के कान खडे हो गये
और पुरे गोष्ठी में एक त्रास का भय का वातावरण उत्पन्न हो गया। कातर दृष्टि से
देखना, पिछे हटना, मूर्छित होना इत्यादि भय से होने वाले व्यभिचारी भाव हैं। इसमे वर्णित अवस्था से प्रष्ट है कि यहाँ तैंतीस
भावों में से त्रास नामक भाव के उदय होने से त्रासोदय भाव प्रधान काव्य
हुआ। किन्तु इस पद्य मे कवि तात्पर्यार्थ का अवसान यहाँ पर नहीं होता, अपितु कवि
तो अपने सामने उपस्थित राजा की प्रसंशा कर रहा है। अतः कवि निष्ठ राजविषयक रति ही
इस पद्य का मुख्य भाव है। अब जो पद्य पढ़ने पर आपाततः उपस्थित त्रासोदय भाव है वह
यहाँ राजविषयक रति का उपकारक अङ्ग बनकर रह
गया, तथा रजविषयक रति भाव मुख्य हो गया। वसन्ततिलका
छन्द है
उक्ता वसन्ततिलका तभजाजगौगः।
यहाँ झळकीकर जी कहते हैं कि भावोदय के अंग बनजाने से भावोदय नामक अलंकार हो गया ऐसा समझना चाहिए।
उक्ता वसन्ततिलका तभजाजगौगः।
यहाँ झळकीकर जी कहते हैं कि भावोदय के अंग बनजाने से भावोदय नामक अलंकार हो गया ऐसा समझना चाहिए।
अगले उदाहरण में भावसन्धि देवविषयक
रतिभाव का अङ्ग बननेका उदाहरण दे रहे हैं।
असोढा तत्काल्लोलसदसहभावस्य
तपसः
कथानां विश्रम्भेष्वथ च रसिकः शैलदुहितुः।
प्रमोदं वो
दिश्यात्कपटबटुवेशापनयने
त्वाराशैथिल्याभ्यां युगपदभियुक्तः स्मरहरः।।
यहाँ भगवान
शङ्करको पानेके लिए तपश्चर्या में लीन पार्वती के सामने उपस्थित छद्म ब्रह्मचारी
वेश धारी शिवका वर्णन है। अपने वास्तविक रूपको दिखाने तथा कपट वेशको बनाये रखने
में एकसाथ असमर्थ कपट वेश धारी शिव आप
सबकी रक्षा करें यह मुख्य वाक्य है।
सरलार्थ - उस चञ्चल कोमल पार्वतीके कठोर तप को देखकर द्रवीभूत हुए शिव सोंचते हैं मैं इस कपट वेश को तुरन्त त्याग देता हूँ। फिर मन में आता है देखो ये कितने तन्मय होकर शिवका वर्णन कर रही है। मैं ही शिव हूं ऐसा जानने पर तो इसके विश्रम्भ कथन को सुन नहीं सकेंगे इस। अतः पार्वती मुखसे शिव कथा रस को सुनने इच्छा से कपट वेश छोड भी नहीं पा रहे हैं। विश्रम्भ पद से यहाँ दो अर्थ लिया जा सकता है प्रथम विश्रम्भकथन अर्थात् जैसी पार्वती तपस्विनी हैं वैसे ही यह वटुक ब्रह्मचारी भी अतः दोनो तपस्वियों में विस्वास पूर्वक अपने आराध्य के विषयमें खुलकर चर्चा होगी। इससे भगवान शङ्कर को पार्वती के हृदय में विराजमान निश्छल प्रेम का रसास्वादन करनेका मौका मिलेगा। दूसरा विश्रम्भका अर्थ प्रणय भी होता है – विश्रम्भः प्रणयेऽपि च। समौ विश्रम्भविश्वासौ (अमरकोष) इससे तात्पर्य निकलता है गौरीके मन में मेरे लिए कितना प्रेम है यह जानने के लिए भी वे कपट वेश को त्याग नहीं पार रहे हैं।
सरलार्थ - उस चञ्चल कोमल पार्वतीके कठोर तप को देखकर द्रवीभूत हुए शिव सोंचते हैं मैं इस कपट वेश को तुरन्त त्याग देता हूँ। फिर मन में आता है देखो ये कितने तन्मय होकर शिवका वर्णन कर रही है। मैं ही शिव हूं ऐसा जानने पर तो इसके विश्रम्भ कथन को सुन नहीं सकेंगे इस। अतः पार्वती मुखसे शिव कथा रस को सुनने इच्छा से कपट वेश छोड भी नहीं पा रहे हैं। विश्रम्भ पद से यहाँ दो अर्थ लिया जा सकता है प्रथम विश्रम्भकथन अर्थात् जैसी पार्वती तपस्विनी हैं वैसे ही यह वटुक ब्रह्मचारी भी अतः दोनो तपस्वियों में विस्वास पूर्वक अपने आराध्य के विषयमें खुलकर चर्चा होगी। इससे भगवान शङ्कर को पार्वती के हृदय में विराजमान निश्छल प्रेम का रसास्वादन करनेका मौका मिलेगा। दूसरा विश्रम्भका अर्थ प्रणय भी होता है – विश्रम्भः प्रणयेऽपि च। समौ विश्रम्भविश्वासौ (अमरकोष) इससे तात्पर्य निकलता है गौरीके मन में मेरे लिए कितना प्रेम है यह जानने के लिए भी वे कपट वेश को त्याग नहीं पार रहे हैं।
इस पद्य में भगवान शङ्कर की कपटवेश
त्यागनेकी त्वरा तथा त्वरा से उत्पन्न आवेग भाव एवं कथा रसिकता के कारण कपट वेश त्यागने
में शिथिलता तथा शैथिल्य से गम्य धैर्य भाव उत्पन्न हो गये। आवेग एवं धैर्य नामक
दो भावों के एक साथ उपस्थित हो जाने से दोनो की सन्धि हो रही है। अतः भाव सन्धि हो
गया। किन्तु पद्यका मुख्य वाक्यार्थ का अवसान तो स्मरहरः प्रमोदं वो दिश्यात्
इत्यादि से कामारी शङ्कर आपका कल्याण करें
इत्यादि में होता है। इस मुख्यार्थ से तो कविनिष्ठ भगवद्विषयक भाव उत्पन्न होने से
पहले आये आवेग तथा धैर्य भावों की सन्धि रति भाव का अङ्ग बन गया। इस प्रकार यहाँ भाव सन्धि रति भावके
अङ्ग बन जाने से अपरस्याङ्गगुणीभूत काव्य हो गया। यहाँ भी भाव सन्धि अङ्ग अप्रधान
होने के कारण भावसन्धि अलङ्कार समझना चाहिए।
अब अन्तिम आठवें उदाहरण में भाव सन्धि
रति भावके अङ्ग बनजाने का उदाहरण दे रहे हैं।
पश्येत्कश्चिच्चल चपल रे का त्वराऽहं
कुमारी
हस्तालम्बं वितर ह ह हा व्युत्क्रमः क्वाऽसि यासि।
इत्थं
पृथ्वीपरिवृढ भवद्विद्विषोऽरण्यवृत्तेः,
कन्या कञ्चित् फलकिसलयान्याददानाऽभिधत्ते।।
सरलार्थ - हे राजन् आपके भय से अरण्यों में
निवास करने वाले शत्रु की कन्या खाने के लिए फलों तथा किसलय को (कोमल अंकुर - श्रृङ्गार
या खानेके लिए) लाने वन में गई वहाँ किसी कामुक के प्रति अनुराग हो जाने से ऐसे कह
रही है – कामुक नायक उससे स्पर्शजन्य क्रीडा करना चाहता है तो विरोध करती हुई कहती
है
- कश्चित् जनः पश्येत् – कोई देख लेगा। इस वाक्य से शङ्का भाव उपस्थित हो रहा है।
- रे चपल चल अर्थात् अरे स्वेच्छाचारी कामुक दूर हट। इस वाक्य से काकु द्वारा उत्पन्न अर्थात् उस कन्या के वचन भङ्गिमा से उत्पन्न दिखावटी क्रोध मिश्रित रागानुविद्ध असूया उत्पन्न हो रहा है।
- जैसे ही वो कृतकक्रोध का अभिनय करती है वैसे ही कामुक दूर हटता है। का त्वरा अर्थात् इतनी भी जल्दी क्या है। इस वाक्य से स्पष्ट होता है कि कन्या उस कामुक को जानेको नहीं कह रही है। बल्कि वो कह रही है जल्दी मत करो इससे ध्वनित होता है धृति भाव।
- अब नायक फिर पास में आगया, जिससे पुनः अनुराग उत्पन्न होगया।
- तब कन्या सोंचने लगती है - अहं कुमारी अर्थात् मैं कुमारी हूं इस प्रकार स्वच्छन्दाचरण अशोभनीय है। इस वाक्य से प्रष्ट होता है स्मृति भाव उत्पन्न हो रहा है।
- फिर रागानुबिद्ध कन्या कहती है - हस्तालम्बं वितर अर्थात् मूझे हाथका सहारा तो दो। इससे श्रम भाव ध्वनित हो रहा है।
- ह ह हा इत्यादि विस्मय बोधक शब्द प्रयोग करते हुए आत्म समर्पण कर देती है। इन पदों से दैन्य भाव उपस्थित हो रहा है।
- पुनः उसे व्युत्क्रमः अर्थात् अपने कौमार्य अवस्था में इस प्रकार पर पुरुष गमन से कुलमर्यादाके अतिक्रमण होजाने का स्मरण हो जाता है। इससे विबोध भाव उत्पन्न हो गया।
- फिर निराश नायक लौटने लगता है तब उसे विछोडका भय हो जाता है तथा कहती है - क्वासि यासि अरे तुम कहाँ जा रहे हो। इससे औत्सुक्य भाव उपस्थित हो रहा है।
इस पद्य में कोई कवि राजा की स्तुति
करता हुआ कहता है देखो राजन् तुम्हारे शत्रु कन्याकी क्या अवस्था हो गई। यह मुख्य
वाक्य है। वो आपके डरके कारण वनकन्दराओं में अपनी क्षुधा तृप्ति के लिए कन्दमूलके
लिए भटक रही थी वहीं किसी युवक से उसका प्रेम हो गया। प्रेमपाश में बधीं युवती के
उद्गार में शङ्का, असूया, धृति, स्मृति,
श्रम, दैन्य, विबोध, औत्सुक्य इन आठों व्यभिचारिभावों के एक साथ उपस्थित हो जाने
से भावशबलताहो जाता है। किन्तु कविनिष्ठ राजविषयक रति प्रधान होने से भावशबलता रति
का अङ्ग बन गया है।
शबलता यहाँ अनेक भावों की एक साथ उपस्थिति के कारण हुई है।
यहाँ ये सभी आठ भाव किस अवस्था में हैं इस प्रश्न के समाधान में आचार्य झळकीकर कहते हैं पूर्व पूर्व के भावों को उपमर्दित करते हुए उत्तरोत्तर भाव आने के कारण पूर्वपूर्वोपमर्देनोत्तरोत्तरोदयरूपा अथवा तिलतण्डुल न्याय से सभी सम प्रधान चर्व्यमाण भाव हों दोनो ही अवस्था में भावशबलता ही माना जायेगा। उद्योत टीका में कहा है कि यहाँ राजा का पराक्रम प्रयोजन है। शत्रुओं का वनवास दिखाकर राजशौर्यकी अभिव्यक्ति की जा रही है। इससे राजविषयक रति उद्दीपित हो रही है। इतने शक्तिशाली पराक्रम पुरोधा हमारे महाराज ! यह रति भाव स्थिर हो जाता है।
इस श्लोक में मन्दाक्रान्ता छन्द है लक्षण –
मन्दाक्रान्ताम्बुधिरसनगैर्मोभनौतौ गयुग्मम्। यहाँ भावशबलता अङ्ग होजाने से भावशबलता अलङ्कार समझना चाहिये।
शबलता यहाँ अनेक भावों की एक साथ उपस्थिति के कारण हुई है।
यहाँ ये सभी आठ भाव किस अवस्था में हैं इस प्रश्न के समाधान में आचार्य झळकीकर कहते हैं पूर्व पूर्व के भावों को उपमर्दित करते हुए उत्तरोत्तर भाव आने के कारण पूर्वपूर्वोपमर्देनोत्तरोत्तरोदयरूपा अथवा तिलतण्डुल न्याय से सभी सम प्रधान चर्व्यमाण भाव हों दोनो ही अवस्था में भावशबलता ही माना जायेगा। उद्योत टीका में कहा है कि यहाँ राजा का पराक्रम प्रयोजन है। शत्रुओं का वनवास दिखाकर राजशौर्यकी अभिव्यक्ति की जा रही है। इससे राजविषयक रति उद्दीपित हो रही है। इतने शक्तिशाली पराक्रम पुरोधा हमारे महाराज ! यह रति भाव स्थिर हो जाता है।
इस श्लोक में मन्दाक्रान्ता छन्द है लक्षण –
मन्दाक्रान्ताम्बुधिरसनगैर्मोभनौतौ गयुग्मम्। यहाँ भावशबलता अङ्ग होजाने से भावशबलता अलङ्कार समझना चाहिये।
इस प्रकार
अपरस्याङ्ग गुणीभूत मध्यम काव्य के आठ भेद दिखानेके पश्चाद् आचार्य मम्मट यहाँ
चतुर्थउल्लास में कथित प्रसंगको जोड रहे हैं। चतुर्थ उल्लास के आरम्भ में
असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य ध्वनि निरूपण के साथ साथ रसाभास, भाव, भावाभास तथा
भावशान्ति आदि की चर्चा की थी। वहीं पर यह भी कहा था कि जहाँ अन्य वाक्यार्थकी
प्रधानता हो और रसादि उसके अङ्ग बनजाये तो उस अवस्था में रसवत् प्रेय ऊर्जस्वि
समाहित चार प्रकार के अलंका होते हैं। इनकी व्याख्या गुणीभूत व्यङ्ग्य के निरूपण
के प्रसङ्ग में बतायेंगे यह कहा था अन्यत्र तु प्रधाने वाक्यार्थे यत्राङ्भूतो
रसादिस्तत्र गुणीभूतव्यङ्ग्ये रसवत् प्रेयऊर्जस्विसमाहितादयोऽलङ्काराः। ते च
गुणीभूतव्यङ्ग्याभिधाने उदाहरिष्यन्ते। च.उ.42 कारिका की वृत्ति।
यद्यपि रस रस है किन्तु मुख्यार्थ की प्रधानता में रस भावादि अमुख्य या गौण हो तो गुणीभूत का ही विषय हो जाता है। किन्तु पूर्ववर्ती क्तिविवेककार महिमभट्टादि आचार्यों ने इसप्रकार के स्थान पर रसवत् अलंकार माना है। जिसे हम निम्न प्रकार से निरूपित कर सकते है। -
यद्यपि रस रस है किन्तु मुख्यार्थ की प्रधानता में रस भावादि अमुख्य या गौण हो तो गुणीभूत का ही विषय हो जाता है। किन्तु पूर्ववर्ती क्तिविवेककार महिमभट्टादि आचार्यों ने इसप्रकार के स्थान पर रसवत् अलंकार माना है। जिसे हम निम्न प्रकार से निरूपित कर सकते है। -
1.
यदि सभी रस गौण हो
जाये (गुणीभूत हो जाये) और अन्य का अङ्ग बन जाये उसे रसवत्
अलङ्कार।
2.
यदि
देव-नृप-गुरु-जन्य (प्रीति) भाव अन्य का अङ्ग बन जाये उसे प्रेय अलङ्कार।
3.
यदि रसाभास या
भावाभास अन्यका अङ्ग बन जाये तो ऊर्जस्वि अलङ्कार।
4.
भाव शान्ति आदि
अन्यके अङ्ग बन जाये तो समाहित अलङ्कार माना जाता है।
अब प्रश्न उठता है कि यहाँ तो चार ही
अलङ्कार गिनाये गये हैं तो फिर आपने आठ उदाहरण को एते रसवदलङ्काराः (ये सभी
गुणीभूतव्यङ्ग्य रसवद् अलङ्कार कहे जाते हैं) कह कर इन सबको रसवत् अलङ्कार कह
दिया। इसका उत्तर देते हुए अग्रिम वृत्ति में कहते हैं – जब आपने कह दिया कि
गुणीभूत रस रसवत् अलंकार है, गुणीभूत भाव प्रेय है , रसाभास भावाभास गुणीभूत होने
पर ऊर्जस्वि, तथा भावशान्ति समाहित अलंकार
है। फिर भाव सन्धि भावोदय भावशबलता इत्यादि को अलङ्कार के रूप में पूर्वाचार्यों
ने रसवत् अलङ्कार मे परिगणित नहीं किया फिर भी परोत्कर्षकत्व ही मुख्यतया अलङ्कार
का बीज होने से तथा भावोदयादि में भी यह विद्यमान होने के कारण इन्हें भी
उपलक्षणतया (भावोदय, भावसन्धि, भावशबलता आदि को) समाविष्ट किया गया है। ऐसा करने
से ये किसी के मत में रसवदादि अलंकार हैं
या नहीं इस विषय पर किसी को कोई शङ्का नहीं रहेगा।
इस विषय पर समझना यह है कि, ध्वनिवादि
आचार्य रसवत् अलङ्कार को स्वीकार नहीं करते, करते होते तो दशम उल्लास में जहाँ
अलङ्कार का वर्णन है वहाँ इनको भी मम्मट पृथक् रूप से सन्निवेश करते। अतः ये गुणों
की तरह गुणीभूत हुए रसादियों को भी साक्षात् काव्य उत्कर्षाधायक मानते हैं। किन्तु
कोई शिष्य यदि पूछ लें तो कहना पडेगा इस लिए मम्मटाचार्य कह रहे हैं कश्चित्
ब्रूयात् इत्यादि।
ध्वनि
तथा गुणीभूत व्यङ्ग्यके जो भेद दिखाये गये हैं उनमें अन्य भेदों का सङ्कर या
संसृष्टि की स्थिति प्रायः होती है। अर्थात् व्यापक रूप से अनेक रसोंके व्यभिचारी
भाव प्राप्त हो सकते हैं और इन भावों के आधार पर अनेक रसों का संकर या संसृष्ट भेद
भी हो सकते हैं। परन्तु उन सङ्कीर्ण या संसृष्ट भेदोंमेंसे जिसकी प्रधानता होती है उसीके नामसे उस भेदका
निर्देश किया जाता है। अब यहाँ तक गुणीभूत व्यङ्ग्य के
जो भेद दिखाये गये हैं उनमें से एक को लेकर समझते हैं। जैसे अयं स रसनोत्कर्शी....
इत्यादि में मुख्य रूप से करुण रस ध्वनित हो रहा है । किन्तु जो वर्णन में तो
रशनोत्कर्शी पीनस्तनविमर्दक इत्यादि वर्णन प्राप्त होता है। वह तो शृङ्गार के पोषक
है। अतः इसे शृङ्गाररस ही कह दें इसमें क्या हानी है ?
यह विषय यद्यपि आरंभ में ही बताया जा चुका है। फिर भी बताते हैं – जहां पर
कवि का तात्पर्य का अवसान हो या जहाँ पर वाक्यका ध्वन्यर्थ या प्रयोज्य अर्थ का
अवसान हो वही मुख्य वाक्यार्थ माना जाता है। इस पद्य में भी कविका तात्पर्यार्थ का
अवसान भूरिश्रवा की पत्नियोंके विरहातिशयका वर्णन करना मुख्य प्रयोजन होने के कारण
तथा प्रसङ्ग गत रस होने के कारण करुण रस प्रधान हुआ। अब फिर एक शङ्का उपस्थित होती
है कि क्यों न हम करुण रस वाला पद्य ही कहदें ? इसे
गुणीभूत व्यङ्ग्य कहने का क्या तात्पर्य है? इस शङ्का समाधान
करते हुए कहते हैं। जिसके आधार पर चमत्कार उत्कर्ष को प्राप्त हो वो उसी से
व्यवहृत होता है। अयं स रशनोत्कर्शी इत्यादि उदाहरण में भी करुण रस शृङ्गार रस से
ही उत्कर्ष को प्राप्त हो रहा है। अतः गुणीभूत हुए शृङ्गार से ही व्यवहार होना
चाहिए। यही प्रधान्येन व्यपदेशाः भवन्ति वाक्य का सार है। इससे हम दो बातें प्रष्ट कर सकते हैं प्रथम जो काव्यका
मुख्य अर्थको (चाहे वह तात्पर्यार्थ या व्यङ्ग्यार्थ या कवि द्वारा विशिष्ट
ध्वन्यार्थ हो उसे) लेकर रसादिका निर्धारण होता है। दूसरा काव्य तभी गुणीभूत
कहलायेगा जब कोई रस या भाव दूसरे रस या भावके उत्कर्षक बनकर रह जाये। जिसके आधार
पर वह काव्य उत्कर्षको प्राप्त करेगा उसीके नामसे गुणीभूत कहलायेगा।
यहाँ
तक मम्मटने रस भाव आदिके आठ उदाहरणों से अपराङ्गगुणीभूत व्यङ्ग्यको दिखाया। अब आगे
अलंकार ध्वनि तथा वस्तु ध्वनि के अपराङ्गगुणीभूतव्यङ्ग्य होने का उदाहरण दे रहे
हैं। यह शब्दशक्तिमूल अनुरणनरूप (संलक्ष्यक्रम) मध्यमकाव्य है।
जनस्थाने
भ्रान्तं कनकमृगतृष्णान्धितधिया
वचो
वैदेहीति प्रतिपदमुदश्रु प्रलपितम्।
कृतालङ्काभर्तुर्वदनपरिपाटिषु
घटना
मयाऽऽप्तं रामत्वं कुशलवसुता न त्वधिगता।।
क्षेमेन्द्र
कृत कविकण्ठाभरण के आधार पर यह पद्य भट्टवाचस्पति का है। यह हनुमन्नाटक में भी
पाया जाता है। हनुमन्नाटक में अनेकों कवियोंके प्रसिद्ध पद्यों को भी
सन्निवेश करनेके कारण सरलता से यह हनुमन्नाटककार का तो कहा नहीं जा सकता। अतः
क्षेमेन्द्रको आधार मानकर इसे भट्टवाचस्पतिका कहना तर्कसङ्गत है। मयाऽऽप्तं
रामत्वम् मया आप्तम् मैनें रामत्वको रामके भावको पा लिया किन्तु कुशलवसुता न
अधिगता कुशल प्रचुर वसुता - धन नहीं पाया। यह मुख्य वाक्य है। अब पुरे पद्यार्थको
समझते हैं। कोई भिक्षुक राजारामचन्द्र से स्वयं की तुलना करते हुए कहता है – जैसे
राम कनकमृग के लिए विवेकशून्य होकर जनस्थान नामक वनप्रदेश में घुमे वैसे ही मैं भी
मृगतृष्णा से विवेकशून्यहोकर जनस्थान अर्थात् ग्राम नगरों में घुमा। जैसे राम
वाणीसे वैदेहि वैदेहि (सीते सीते) कहते हुए प्रतिक्षण घुमते थे, वैसे ही मैं भी
वाणी से वै देहि - अरे कुछ देदो इत्यादि कहते हुए भिक्षाके लिए मारा मारा प्रलाप
करता फिरता था। जैसे भगवान राम ने लङ्काभर्तुः लङ्काराज रावण के वदनपरिपाटी
अर्थात् वदनपङ्क्ति पर (दस मुख पर) इषुघटना अर्थात् बाणों का प्रहार किया वैसे ही मैंने काभर्तुः अर्थात्
कुत्सित स्वामियों के या दुष्ट धनिकों के वदनपरिपाटी मुखभङ्गिमा या इंगित भङ्गिमा
के अनुसार सारा व्यवहार किया / या करते करते
अलं अर्थात् पर्याप्त क्या मैं नहीं थक गया? जैसे रामचन्द्र ने कुशलवसुता अर्थात् कुशलवकी माँ सीता
को पा लिया। उसी प्रकार मैंने रामत्वको तो पा लिया किन्तु कुशल प्रचुर वसु धन नहीं
पाया।
प्रस्तुत
पद्य में उपमानोपमेयभाव (कवि तथा राम) शब्दशक्ति द्वारा व्यङ्ग्य के रूपमें प्रतीत
हो रहा है। किन्तु कविने अन्तिम चतुर्थ चरण में मयाप्तं रामत्वं कहकर व्यङ्ग्यको
वाच्य बना दिया। कहने का तात्पर्य यह है कि जब उपमान उपमेय भाव शब्दशक्ति के
द्वारा प्रकृत कवि तथा राम दोनोंका अर्थ (एक वाच्यार्थ दूसरा व्यङ्ग्यार्थ) आ रहा
था वहाँ आपने मया इत्यादि रख कर दोनोंको वाच्य बना दिया। यदि यहाँ मया आप्तम् इत्यादि पद न होते तो अवश्य भी
यह उत्तम ध्वनि काव्य होता। आरंभके तीन पादमें जो व्यङ्ग्य था वह अन्तिम चतुर्थ
चरणके वाच्यके साथ गुणीभूत होगया। इस पद्य में जो उपमा कहा गया है वह उपमा अलंकार
व्यङ्ग्य है न कि वाच्य क्योंकि उपमा होने के लिए उपमा के चार स्तंभ – उपमान उपमेय
वाचक शब्द तथा साधारण धर्म ये होना अनिवार्य है। यहाँ ये सभी व्यङ्ग्य हैं। अतः द्वितीय
कवि परक अर्थ भी तीन चरणोंमें व्यङ्ग्य ही था। शब्दशक्तिमूलता में मुख्य
शब्दपरिवृत्ति–असहत्व होता है। इस पद्य में भी जनस्थान आदि शब्दों को परिवर्तन
किया नहीं जा सकता अतः इसे शब्दशक्तिमूल कहा गया है।
अब हमें यहाँ अपरस्याङ्ग गुणीभूत
व्यङ्ग्यको समझना है। जो ध्वनि या व्यङ्ग्य अन्यकी सिद्धिका अङ्ग बन जाये वह
अपरस्याङ्ग गुणीभूत व्यङ्ग्य हुआ। प्रकृत पद्य में आरम्भिक तीन चरणों में राम के
साथ कविकी तुलना व्यङ्ग्य से हो रही है। किन्तु मुख्य अर्थ मयाप्तं रामत्वं
कुशलवसुता न त्वधिगता होने से और स्वयं कविद्वारा मया आप्तं कहने से वाच्य हो गया।
अतः तीन पादों का व्यङ्ग्य चतुर्थपादके वाच्यकी सिद्धि में जाकर अवसित होगया। “मैंने रामत्वको तो पा लिया पर प्रचुर धन नहीं पाया” इसकी सिद्धि उपरके तीन चरणों के आधार पर ही होती है
इसलिए यह अपरस्याङ्ग गुणीभूत व्यङ्ग्य हुआ। प्रस्तुत पद्य में शिखरिणी छन्द है।
इसका लक्षण – रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनशभलागः शिखरिणी।
शब्दशक्तिमूल संलक्ष्यक्रमध्वनिका
उदाहरण देनेके पश्चात् आचार्यमम्मट अर्थशक्तिमूल संलक्ष्यक्रमध्वनि के गुणीभूत
होनेका उदाहरण दे रहे हैं।
आगत्य
संप्रति वियोगविसंष्ठुलाङ्गी-
मम्भोजिनीं क्वचिदपि क्षपितत्रियामः।
एतां
प्रसादयति पश्य शनैः प्रभाते
तन्वङ्गि पादपतनेन सहस्ररश्मिः।।
हे कृशाङ्गि
कहीं और (द्विपान्तर में) रात बिताकर आनेवाला यह सहस्ररश्मि सूर्य प्राभात के समय
में वियोग के विरहसे संकुचित हुई इस कमलिनीको पादपतन (पाद-किरण पतन- डालकर या
संस्पर्श) से प्रसन्न अर्थात् विकसित कर रहा है। इस पद्यमें सहस्ररश्मी पर नायका
आरोप करने पर एक और अर्थ निकलता है। हे कृशाङ्गी देखो कहीं और किसी नायिकाके साथ
रात बिताकर लौटने वाला यह नायक वियोग के कारण संकुचित हुई नायिकाके पैरों पर गिरकर
(पादपतन) प्रसन्न कर रहा है।
इस पद्य में
उस नायिकाको उपालंभ किया जा रहा है। जो अपने नायके द्वारा अन्य नायिकाके साथ रात
बिताकर लौटने पर भी बिना क्षमा याचनाके स्वीकार कर लिया कुछ कहा नहीं। यह बात उसकी
सखियोंको उचित नहीं लगी। इस लिए व्यङ्ग्य कर रही हैं। देखो यह सूर्य केवल एक रात
के लिये ही बाहर गया फिर भी लौटकर पादपतन से कमलिनीको प्रसन्न कर रहा है। और तुम
बहुत दिनों तक अनेक नायिकाओंके साथ रात बिताने वाले पतिसे विना मान और क्रोधके
प्रसन्न हो रही हो यह ठीक नहीं। यह व्यङ्ग्यर्थ यहाँ विना पूर्वापर प्रसङ्ग के
समझना कठिन है। यह पद्य किसी काव्य या खण्डकाव्यका एक अंश हो सकता है। अथवा
प्रसिद्ध कोई लोकोक्ति भरा पद्य भी हो
सकता है।
अब हम
मुख्य गुणीभूत अर्थ की ओर चलते हैं। मुख्य अर्थ तथा पद्यका वाच्यार्थ को देखते हैं।
वाच्यार्थ तो रविकमलिनी व्यापार है। किन्तु व्यङ्ग्यार्थ नायक तथा नायिका संबन्धी
व्यापार है। क्योंकि कविका प्रयोजन यहाँ रविके किरणोंसे कमलिनीके विकसित होनेका
प्रकृतिसौंदर्य वर्णन करना नहीं है। अपितु किसी लम्पट नायकके प्रातः घर आने पर
नायिका कुछ बिना कहे छोड देनेकी घटनाको व्यङ्ग्य करना है। पास बैठी सखियों के
द्वारा अन्य दृष्टान्त से अपनी सखीको उलाहना दिया जाना है। यही प्रयोजन सिद्धिके लिये सूर्य और कमलिनीको उपस्थित
किया जा रहा है। एक भी शब्द नायक नायिका संबन्धी नहीं हैं किन्तु आरोपित करने पर
सबकुछ दोनोको ही परिभाषित करते है। अब इनमे से वाच्यार्थ रविकमलिनी व्यापार गौण हो
जाना चाहिए और नायक नायिका वृत्तान्त व्यङ्ग्य होने के कारणमुख्य हो जाना चाहिए।
किन्तु ऐसा न होकर यहाँ व्यङ्ग्य वाच्यका उपकारक होकर स्थित है। अतः इसे
अपरस्याङ्गगुणीभूत कहा गया है। फिर भी व्यङ्ग्यर्थको लेकर ही इसे ध्वनिकाव्य क्यों
नहीं कहा जा रहा है? इसे गुणीभूत कहनेका
तात्पर्य क्या है ? इसे प्रष्ट करते हुये मम्मटाचार्य कहते हैं अत्र .... वृत्तान्ताध्यारोपेणैव स्थितः। अर्थात् यहाँ जो नायक नायिका व्यापार है वह
वाच्यार्थभूत रविकमलिनी व्यापार पर आश्रित है। उसके विना व्यङ्ग्यार्थ टिक नहीं
सकता। अतः व्यङ्ग्यार्थ वाच्याश्रित हो गया। तथा वाच्यार्थकी उत्कर्षता इस
व्यङ्ग्यर्थता से बढ जाती है। इस लिये व्यङ्ग्य अङ्गी न होकर अङ्ग बन गया। इसलिये
यह अपरस्याङ्ग रूप गुणीभूत व्यङ्ग्य होगया।
यहाँ पर एक शङ्का उत्पन्न होती है कि क्या यहाँ उपमा या रूपक अलङ्कार व्यङ्ग्य नहीं माना जा सकता? इसका उत्तर देते हुए टीकाकार झळकीकर कहते हैं – यहाँ वस्तु व्यङ्ग्य है न कि उपमाय या रूपक। वस्तुतः उपमा ध्वनि का जो उदाहरण चतुर्थ उल्लास में दिया गया है वहाँ पर स्पष्ट दो धर्मी उपस्थित हैं तथा एक धर्मी के साथ अन्वय होने पर भी दूसरा बना ही रहता है। जैसे उल्लास्य कालकरवाल... इत्यादि उदाहरण में प्रकरण से प्राप्त राजा तथा अप्राकरणिक इन्द्र दोनो को लिया गया है। वैसा अर्थ यहाँ पर नहीं लिया जा सकता सूर्य तथा नायक दोनो को संबोधन करने वाला कोई श्लेष पद भी नहीं है, इसलिए उपमा अलंकार व्यङ्ग्य कहने का प्रश्न ही नहीं उठता। रूपक अलङ्कार व्यङ्ग्य होने के लिए तादात्म्य आरोप मुख्य लक्षण है यहाँ कोई तादात्म्यता संबन्ध भी नहीं है इसलिए रूपक अलंकार व्यङ्ग्य भी नहीं है। अतः नायक नायिका व्यापार रूप वस्तु व्यङ्ग्य है।
अब एक विषय और उपस्थित होता है वह है कि यहाँ भी तो एक पद श्लेष है वह है –पादपतन इसके दो अर्थ हैं किरण का गिरना तथा पैर पर झुकना। इसके आधार पर शब्दशक्तिमूलक ध्वनि भी तो कहा जा सकता है। फिर इसे क्यों अर्थ शक्तिमूलक ध्वनि कहा गया ? इसका उत्तर देते हुए कहते हैं प्रधान्येन व्यपदेशाः भवन्ति यह सामान्य सिद्धान्त है। अर्थात् जहाँ जिसकी अधिकता हो उसके आधार पर निर्णय करना चाहिए। यहाँ यद्यपि एक पद पादपतन श्लेष है किन्तु यह नायक नायिका इत्यादि मुख्य अर्थको भी नहीं लेता और अन्य सभी पद इसप्रकार के उभयार्थी भी नहीं हैं। अतः इसे अर्थशक्तिमूल ध्वनि ही माना जायेगा।
ऐसे ही व्यङ्ग्य से समासोक्ति अलङ्कार व्यङ्ग्य माना जाता है। अतः समासोक्ति को भी यहाँ माना जा सकता है। इस विषयको निषेध करते हुए कहते हैं कि समासोक्ति होने के लिये प्रकृत व्यवहार का अप्रकृत व्यवहार पर आरोप रूप होना आवश्यक है। प्रकृत वाच्यार्थ तथा अप्रकृत व्यङ्ग्यार्थ में अभेद होना चाहिये। और अप्रकृत व्यङ्ग्यार्थ के विना निरपेक्ष रूप से वाच्यार्थ टिक नहीं सकता किन्तु यहाँ तो अप्रकृत नायक नायिका व्यापारके विना भी रविकमलिनी व्यापार रूप प्रकृतार्थ सर्वथा संभव है। अतः समासोक्ति अलंकार हो नहीं सकता।
यहाँ तक आचार्य मम्मटने इन दस
उदाहरणों से अपरस्याङ्ग गुणीभूत व्यङ्ग्यको स्पष्ट कर दिया। अब अगले प्रस्तुतिमें हमने गुणीभूत व्यङ्ग्यके तीसरे भेदका विश्लेषण कियाहै । आपको यह लेख समझमें आया हो तथा इसके अगले भागको देखना चाहते हैं तो यहाँ से जा सकते हैं। यहाँ पर एक शङ्का उत्पन्न होती है कि क्या यहाँ उपमा या रूपक अलङ्कार व्यङ्ग्य नहीं माना जा सकता? इसका उत्तर देते हुए टीकाकार झळकीकर कहते हैं – यहाँ वस्तु व्यङ्ग्य है न कि उपमाय या रूपक। वस्तुतः उपमा ध्वनि का जो उदाहरण चतुर्थ उल्लास में दिया गया है वहाँ पर स्पष्ट दो धर्मी उपस्थित हैं तथा एक धर्मी के साथ अन्वय होने पर भी दूसरा बना ही रहता है। जैसे उल्लास्य कालकरवाल... इत्यादि उदाहरण में प्रकरण से प्राप्त राजा तथा अप्राकरणिक इन्द्र दोनो को लिया गया है। वैसा अर्थ यहाँ पर नहीं लिया जा सकता सूर्य तथा नायक दोनो को संबोधन करने वाला कोई श्लेष पद भी नहीं है, इसलिए उपमा अलंकार व्यङ्ग्य कहने का प्रश्न ही नहीं उठता। रूपक अलङ्कार व्यङ्ग्य होने के लिए तादात्म्य आरोप मुख्य लक्षण है यहाँ कोई तादात्म्यता संबन्ध भी नहीं है इसलिए रूपक अलंकार व्यङ्ग्य भी नहीं है। अतः नायक नायिका व्यापार रूप वस्तु व्यङ्ग्य है।
अब एक विषय और उपस्थित होता है वह है कि यहाँ भी तो एक पद श्लेष है वह है –पादपतन इसके दो अर्थ हैं किरण का गिरना तथा पैर पर झुकना। इसके आधार पर शब्दशक्तिमूलक ध्वनि भी तो कहा जा सकता है। फिर इसे क्यों अर्थ शक्तिमूलक ध्वनि कहा गया ? इसका उत्तर देते हुए कहते हैं प्रधान्येन व्यपदेशाः भवन्ति यह सामान्य सिद्धान्त है। अर्थात् जहाँ जिसकी अधिकता हो उसके आधार पर निर्णय करना चाहिए। यहाँ यद्यपि एक पद पादपतन श्लेष है किन्तु यह नायक नायिका इत्यादि मुख्य अर्थको भी नहीं लेता और अन्य सभी पद इसप्रकार के उभयार्थी भी नहीं हैं। अतः इसे अर्थशक्तिमूल ध्वनि ही माना जायेगा।
ऐसे ही व्यङ्ग्य से समासोक्ति अलङ्कार व्यङ्ग्य माना जाता है। अतः समासोक्ति को भी यहाँ माना जा सकता है। इस विषयको निषेध करते हुए कहते हैं कि समासोक्ति होने के लिये प्रकृत व्यवहार का अप्रकृत व्यवहार पर आरोप रूप होना आवश्यक है। प्रकृत वाच्यार्थ तथा अप्रकृत व्यङ्ग्यार्थ में अभेद होना चाहिये। और अप्रकृत व्यङ्ग्यार्थ के विना निरपेक्ष रूप से वाच्यार्थ टिक नहीं सकता किन्तु यहाँ तो अप्रकृत नायक नायिका व्यापारके विना भी रविकमलिनी व्यापार रूप प्रकृतार्थ सर्वथा संभव है। अतः समासोक्ति अलंकार हो नहीं सकता।
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