प्राक्कथन
यह पौराणिक स्तोत्र अनेक रूपसे अद्भुत तथा शिघ्र फलदायी है। एक तो यह
पौराणिक होने से सर्वग्राह्य है ही, साथमें यह समस्त अग्निसोमात्मक जगत्को, विराट
ब्रह्मको, तथा समस्त देवोंको पितृस्वरूपमें स्तुति करता है। जहाँ एकेश्वरवादमें समस्त
देवोंके स्वामीके रूपमें हम एक ईश्वरको देखते हैं वहीं यह स्तोत्र पितरोंको भी
विराट ब्रह्मकी कोटीमें समाहित करता हुआ प्रतीत होता है। अतः यह वास्तवमें पितरोंके
यथार्थ स्वरूपको प्रकट करता है। प्रथम श्लोकमें ज्ञानघन प्रकाश स्वरूप दिव्यचक्षुसे
दृष्टिगोचर ईश्वरको पितरके रूपमें देखता है। पुनः द्वितीय श्लोकमें पितरोंको देवाधिपति इन्द्रसे लेकर प्रजापति, सप्तर्षि आदि
पर्यन्त द्वारा पूजित मानते हुए प्राणाम करता है। इस प्रकार संपूर्ण स्तोत्र
जगन्नियन्ताके भी पिताको पितर मानता है। अन्तमें बडे आर्त स्वरसे प्रार्थना करता
है कि मैं सदा एकाग्र होकर आपको बारंबार नमस्कार करूँ। अतः आचार्योंने इस स्तोत्रको समस्त प्रकारके पितृदोष निवारणके उपायके रूपमें परिभाषित किया है। अस्तु।
पितृस्तोत्र
रुचि उवाच
अर्चितानाममूर्तानां
पितृणां दीप्ततेजसाम्।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।1
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।1
इन्द्रादीनां
च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान्।।2
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान्।।2
मन्वादीनां
च नेतार: सूर्याचन्दमसोस्तथा।
तान् नमस्यामहं सर्वान् पितृनप्युदधावपि।।3
तान् नमस्यामहं सर्वान् पितृनप्युदधावपि।।3
नक्षत्राणां
ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।4
द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।4
देवर्षीणां
जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येहं कृताञ्जलि:।।5
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येहं कृताञ्जलि:।।5
प्रजापते:
कश्पाय सोमाय वरुणाय च।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।6
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।6
नमो
गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे।।7
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे।।7
सोमाधारान्
पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्।।8
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्।।8
अग्रिरूपांस्तथैवान्यान्
नमस्यामि पितृनहम्।
अग्रीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत:।।9
अग्रीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत:।।9
ये
तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्रिमूर्तय:।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण:।।10
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण:।।10
तेभ्योऽखिलेभ्यो
योगिभ्य: पितृभ्यो यतमानस:।
नमो नमो नमस्तेऽस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुजः।।11
नमो नमो नमस्तेऽस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुजः।।11
।। पितृस्तोत्रका हिन्दी अनुवाद ।।
जो
संस्कृत पाठ करने में असमर्थ हैं वे इसके हिन्दी रूपान्तरणका पाठ कर सकते हैं।
रूचि बोले – जो पितर सबके द्वारा अर्थात्
देव मनुष्य इत्यादि सभीके द्वारा पूजित हैं, अमूर्त अर्थात् चक्षु आदि शरीरके इन्द्रियोंके द्वारा
दृष्टि गोचर न होने वाले हैं, अत्यन्त तेजस्वी, ध्यानी एवं दिव्यदृष्टि सम्पन्न हैं, उन पितरों को
मैं सदा नमस्कार करता हूँ।1
जो इन्द्र आदि देवताओं, दक्ष, मारीच,
सप्तर्षियों तथा दूसरों के भी नेता अर्थात् नेतृत्व सम्पन्न हैं,
समस्त प्रकारके कामना की पूर्ति करने वाले उन पितरो को मैं प्रणाम
करता हूँ।2
जो मनु आदि राजर्षियोंके, मुनिश्वरोंके तथा सूर्य और चन्द्रमा
के भी नायक हैं, उन समस्त पितरों को मैं उदधौ अर्थात् समुद्र
में भी नमस्कार करता हूँ। कहनेका तात्पर्य है कि मैं कितने भी विकट इस भवरूपी सागर
इस दुःख जंजालमें निमज्जित क्यों न हो जाउं पर आपको बारंबार प्राणाम करता रहता
हूँ।3
नक्षत्रों, ग्रहों, वायु,
अग्नि, आकाश और द्युलोक तथा पृथ्वी के भी जो
नेता हैं अर्थात् नेतृत्वशाली या संचालक हैं, उन पितरों को
मैं हाथ जोड़कर (भक्तिभावसे युक्त होकर) प्रणाम करता हूँ।4
जो देवर्षियों के जन्मदाता हैं, समस्त लोकों द्वारा वन्दित, पूजित
तथा सदा अक्षय फल के दाता हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर
प्रणाम करता हूँ।5
प्रजापति, कश्यप, सोम,
वरूण तथा योगेश्वरों के रूप में स्थित पितरों को सदा हाथ जोड़कर
प्रणाम करता हूँ।6
सातों लोकों में स्थित सात पितृगणों को
नमस्कार है। मैं योगदृष्टिसम्पन्न स्वयम्भू ब्रह्माजी को प्रणाम करता हूँ।7
जो पितृगण सोम (चन्द्रिकाके या सोम
अर्थात् दिव्य आनन्द तथा अमृत के) आधार
होकर प्रतिष्ठित हैं उनको करबद्ध प्रणाम करता हूँ, तथा योगमूर्तिधारी पितृगणों को
मैं प्रणाम करता हूँ। साथ ही सम्पूर्ण जगत् के पिता सोम को नमस्कार करता हूँ।8
अग्निस्वरूप अन्य पितरों को मैं प्रणाम
करता हूँ, क्योंकि यह सम्पूर्ण
जगत् अग्नि और सोममय है।9
जो पितर तेज में स्थित हैं, जो ये चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं तथा जो जगत्स्वरूप एवं
ब्रह्मस्वरूप हैं, उन सम्पूर्ण योगी पितरो को मैं
एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करता हूँ।10
मैं एकाग्र चित्त होकर उन्हें बारम्बार
नमस्कार करता हूँ। वे स्वधाभोजी पितर मुझ पर प्रसन्न हों।11
सादर हरिशरणम्
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