काव्यप्रकाश का काव्यप्रयोजन
सामान्यतया प्रयोजन शब्दका अर्थ उद्देश्य होता है। उद्देश्य या प्रयोजन जिसको जानने के बाद हमें ज्ञात होता है कि मैं इस कामको
कर सकता हूँ, इसको करने से मूझे खुसी, मान-सम्मान, धन-प्रतिष्ठा मिलेगी या इसे करने से
मेरा कोई लाभ नहीं है इत्यादि। यही ज्ञान कराने के लिए ग्रन्थके आरंभ में
ग्रन्थकार ग्रन्थगत प्रयोजन लिखता है। जिससे पाठक ग्रन्थका उद्देश्य जान सके और उस
ग्रन्थके साथ अपने आपको स्थापित कर सके। अतः हम कह सकते हैं कि यह ग्रन्थका परिचय
देने वाला भाग होता है। जिसको पढकर पाठक जान सकता है कि ग्रन्थमें कौन सा विषय है,
इसको मैं पढ सकता हूँ या नहीं इसको पढनेसे मूझे क्या लाभ मिलने वाला है। इसलिए
कहते हैं – प्रयोजनमनुद्दिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्ततते। इस दृष्टिसे देखें तो
ग्रन्थमें सर्व प्रथम प्रयोजनको ही रखना चाहिए परन्तु शिष्ट परंपरा निर्विघ्न
परिसमाप्तिके लिए इष्टदेव से प्रार्थना करनेकी होने के कारण आचार्य मम्मट सर्वप्रथम
मङ्गलाचरण करनेके पश्चात् इस विषयको रख रहे हैं। चूंकि काव्यप्रकाश काव्यशास्त्रको
बताने वाला ग्रन्थ है, अर्थात् कविता, कथा आख्यायिका, इत्यादि काव्यविधाको नियमित
करनेवाला ग्रन्थ है। अतः काव्यविधाके लाभ हानी ही काव्यशास्त्रके अध्येताओं के
लिये भी लाभ हानी कहलायेंगे। इसी तथ्यको ध्यानमें रखकर आचार्य मम्मट यहाँ
काव्यप्रयोजन बतानेका उपक्रम कर रहे हैं।
इहाभिधेयं सप्रयोजनंमित्याह
इह अर्थात् इस ग्रन्थमें अभिधेय विषय प्रयोजन युक्त है इस कारण
इसका प्रयोजन बताते हैं।
काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे।। 2।।
अन्वय – काव्यं यशसे, अर्थकृते, व्यवहारविदे, शिवेतरक्षतये,
सद्यः परनिर्वृतये, कान्तासम्मिततया उपदेशयुजे (भवति)।
काव्यं यशसे = काव्य यश प्राप्तिके लिए, अर्थकृते = धनप्राप्तिके लिए, व्यवहारविदे = व्यवहार ज्ञानके लिए, शिवेतरक्षतये = अनिष्टनाश करने के लिए, सद्यः परनिर्वृतये = (पढने, देखने या सुननेके साथ ही) परम आनन्द देनेके लिए,
कान्तासम्मिततया
उपदेशयुजे = कान्ता स्त्रीके समान
सरस रूपसे उपदेश देने के लिए होता है।
तात्पर्यार्थ
काव्य पढनेसे यशकी प्राप्ति, धनकी
प्राप्ति, व्यवहारका ज्ञान, अनिष्टका नाश, परमानन्दकी प्राप्ति तथा कान्ताके समान
सरस रूपसे उपदेश प्राप्त होता है।
इस कारिकामें आचार्य मम्मटने छह
प्रयोजन प्रस्तुत किया है। इनका एक एक करके विश्लेषण करते हैं।
1. काव्यं यशसे काव्य पढने या लिखने से यश की प्राप्ति होती है। इस विषयको अधिक प्रमाणिक बनानेके लिए मम्मट वृत्तिमें प्रमाण प्रस्तुत कर रहे हैं। कालिदासादीनामिव यशः काव्य पढने या लिखने से कालिदास कविके समान यश प्राप्ति होती है। हमारे जीवनमें हम दो प्रकारकी सम्पत्ति कमा रहे होते हैं एक रूप-लावण्य, बल, धन सम्पत्ति इत्यादि। दूसरा यश मान सम्मान इत्यादि।रूप-लावण्य, बल, धन सम्पत्ति इत्यादि जन्मसे अपने आप भी प्राप्त हो सकते हैं। उनमेंसे समयके साथ साथ रूप सौंदर्य क्षीण हो जाता है। बल घटने लगता है। धन सम्पत्ति भी चिरस्थाई नहीं होती। अर्थात् इस पार्थिव शरीरके साथ आये सभी सम्पत्ति नश्वर है। किन्तु यश मान सम्मान हमारे द्वारा अर्जित होते हैं, और ये आयुके बढनेके साथ साथ बढते रहते हैं। इसी यश रूपी सम्पत्तिको बढानेके लिए महान् से महान् परिश्रम किया जाता है। क्योंकि यह यश रूप शरीर नाशवान् नहीं अपितु पार्थिव शरीरके समाप्त हो जाने के पश्चात् भी अटल रह जाता है। अतः कहा भी गया है –
जयन्ति ते सुकृतिनो
रससिद्धकवीश्वराः।
नास्ति तेषां यशःकाये
जरामरणजं भयम्।।
व्यास-भास-कालिदास-वाल्मीकि-बाण
जैसे अनेक युगद्रष्टाकवि आजा पार्थिव शरीरसे न होने पर भी पढे पूजे जाते हैं। अतः
आचार्य मम्मटका सर्वप्रथम यशको रखकर काव्य निर्माण पठन का हेतु बताना समुचित लगता
है।
2. अर्थकृते काव्यसेवन से अर्थ प्राप्ति होती है। इसका प्रमाण प्रस्तुत करते हुए वृत्तिमें कहते हैं – श्रीहर्षादेर्धावकादीनामिव धनम्। श्रीहर्ष नामक राजासे जिस प्रकार धावक कविको विपुल धन प्राप्त हुआ उसी प्रकार धन प्राप्ति होती है। धावक कविके विषयमें प्रसिद्धि है कि उन्होंने रत्नावली नामक नाटिका की रचना राजा श्रीहर्षके नामसे की थी। अतः राजा प्रसन्न होकर उन्हें विपुल धनसे सम्मानित किया । वैसे भी कविता-कथा-उपन्यासकार आज प्रचुर धन तथा प्रतिष्ठा प्राप्त कर रहे हैं। आज भी अनेक पुरस्कार जैसे पद्मश्री, पद्मभूषण इत्यादि राष्ट्रीय अन्तराष्ट्रीय पुरस्कार कवियोंको मिलता रहता है। अतः काव्यसेवन धनप्राप्तिका हेतु हो सकता है।
3. व्यवहारविदे काव्यसेवन से व्यवहार ज्ञान होता है। इस विषयको समझानेके लिए आचार्य मम्मट कहते हैं राजादिगतोचिताचारज्ञानम् राजा आदि शिष्ट लोगोंके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये कैसा नहीं इस प्रकारका आचार ज्ञान होता है। वैसे भी काव्यसे जितनी सरलतासे हमें व्यहारिक ज्ञान प्राप्त होता है उतनी सरलतासे अन्य किसी विधासे नहीं होता है। क्योंकि काव्यपरिपाक जितने लगनसे आबालवृद्धवनिता पढते हैं उतना किसी अन्यको नहीं। वैसे देखा जाये तो शास्त्र का निर्माण ही चरित्र निर्माण के लिए होता होता है। किन्तु उसमें प्रवृत्ति कम ही लोगोंकी होती है। अतः महाकवि अश्वघोष ने बुद्धके उपदेशको जन-जन तक पहुंचानेके लिए काव्यका सहारा लिया प्रमाण है बुद्धचरितम् , सौन्दरनन्द महाकाव्य ऐसे अनेक कवियोंके काव्य हैं। फिर सत्काव्य तो बनतेही हैं महापुरुषोंकी जीवनीसे महाजनो येन गतः स पन्था यह बात काव्य पढनेसे ही आयेगी। अतः कहा जाता है रामादिवत् प्रवर्तितव्यम् न रावणादिवत् यह बात समझानेके लिए काव्य ही सक्षम हैं। इसी बातको आचार्य विश्वनाथ तो एक कदम आगे बढते हुए कहते हैं कि जिस रोगको समाप्त करनेके लिए दो प्रकारकी दबाई मिले एक मीठी हो और दूसरी कडवी तो आप निश्चय ही मीठि दबाई खाना पसंद करेंगे – कटुकौषधोपशमनीयस्य रोगस्य शितशर्करोपशमनीयत्वे कस्य वा रोगिणः शितशर्कराप्रवृत्तिः साधीयसी न स्यात्। अतः निश्चय ही काव्यानुशीलन ज्ञानका उत्तम साधन है। आज भी विभिन्न काव्यों की सूक्तियाँ जन-जनके मुखमें रहते हैं। उदाहरण प्रत्युदाहरणके लिये या जीवनके विभिन्न पहलुओंको प्रकाशित करनेके लिए सभी सूक्तियोँ का ही सहारा लेते हैं। ये सभी सूक्तियाँ काव्योंसे ही निकली हैं। अतः व्यवहारविज्ञाका माध्यम काव्य है।
4. शिवेतरक्षतये - शिव कहते हैं कल्याणको शिवेतर का अर्थ है कल्याण के विपरीत अर्थात् अकल्याण क्षतये का अर्थ हुआ नाश अतः मिलाकर अर्थ होता है अकल्याण या विपत्तियों का नाश करने वाला। अब हम साधारण शब्द में ऐसे कह सकते हैं कि काव्य पढने या लिखने से अशुभ या अमङ्गलका नाश होता है। अब इसे प्रमाणिक बनाने के लिए आचार्याजी ऐतिहासिक दस्ताबेज़ प्रस्तुत कर रहे हैं। आदित्यादेर्मयूरादीनामिवानर्थनिवारणम् जैसे सूर्यकी उपासनासे मयूर नामक कविका कुष्ट रोग समाप्त हो गय था वैसे अनर्थ निवारण सत्काव्य सेवनसे होता है। कवि बाण भट्ट तथा मयूरके विषयमें यह कथानक प्रसिद्ध है कि वे दोनों समकालीन थे, किसी कारणवश मयूरको शाप लगा और शापवश कुष्ठरोग हुआ। कुष्ठरोग निवारणके लिए उन्होने भगवान सूर्यकी उपासना की प्रतिदिन एक नयाँ श्लोक रचते हुए स्तवन किया जिससे प्रसन्न होकर भगवान भास्करने कुष्ठ रोगसे मुक्त कर दिया। इनकी कवितायें अब सूर्यशतकके नामसे प्राप्त होती हैं। आज भी समाज अनेकों स्तोत्र मंत्र देवालय तथा घर में गाये जाते हैं। एवं उससे संकटसे मुक्तिके लिए प्रार्थना की जाती है। जन-जन में यह परंपरा है वे किसी न किसी इष्टदेवको प्रसन्न करनेके लिए उनके स्तवन परक श्लोक गाता है। इसप्रकार अमङ्गल नाश के लिए स्तवन एक प्रमुख प्रयोजन है जो काव्यसे ही संभव है।
5. सद्यःपरनिर्वृतये सद्य अर्थात् तुरन्त,
परनिर्वृति अर्थात् आनन्द प्राप्ति। कहनेका तात्पर्य है काव्यसेवन करनेसे तुरन्त
आनन्दकी प्राप्ति होती है। या यों कहें काव्य पढते पढते आनन्दके सागरमें गोते
लगानेका मौका मिलता है। वह कैसे होता है इस बातको मम्मट वृत्ति भाग में बता रहे
हैं - सकलप्रयोजनमौलिभूतं समनन्तरमेव रसास्वादन-समुद्भूतं
विगलितवेद्यान्तरमानन्दम् सद्यपरनिर्वृति को सकल प्रयोजन मौलीभूत कहते हुए
कहते हैं कि यह काव्यपढते ही उत्पन्न हुये रसास्वाद से परिपूर्ण विगलित अर्थात्
समाप्त हुए अन्यविषय या वेद्यान्तर आनन्द है। यद्यपि परमानन्दकी प्राप्ति तो अन्य
शास्त्र पढनेसे भी मिलती है, जैसे वेदान्तादि दर्शन का ममन चिन्तन निदिध्यासन से
पारलौकिक आनन्दकी प्राप्ति होती है। किन्तु उन शास्त्रोंसे अलग यहाँ सद्य अर्थात्
तुरन्त आनन्दकी प्राप्ति होती है। क्योंकि सामान्यतया चलचित्र-नाटक-आदि देखनेसे या
सुमधुर संगीत सुननेसे हमें तत्काल शारीरिक थकान मानसिक उलझन से छुटकारा मिलती है,
हम उसी नाटक या संगीतके साथ तन्मय हो जाते हैं। बाहरी गतिविधियोंसे अन्जान हो जाते
हैं। यह तत्काल प्रभाव करने वाला होता है। सामान्यतया चलचित्र देखते हुए तीन घण्टे
तक जो तन्मयता एकाग्रता एवं बाह्य गतिविधियोंसे अन्जान की अवस्था होती है। उसे ही
विगलिवेद्यान्तर अवस्था कहा जाता है। क्योंकि उस अवस्थामें हम नाटक या चलचित्रके
पात्रके सिवा अन्य किसी को भी देख सुन नहीं रहे होते, तथा अन्य विचार भी मन में
नहीं आ रहा होता है । यद्यपि वेद्यान्तर अर्थात् अन्य विषय उपस्थित तो हैं, जैसे
उस समयमें भी समय चल रहा होता है। अन्य कार्य हो रहे होते हैं, हमारे दैनन्दिन
जीवनके अनेक सुख-दुःख होते हैं किन्तु उस तन्मय अवस्थामें वे भान नहीं होते हैं।
अतः वह अवस्था विगलित वेद्यान्तर अवस्था है। फिर शास्त्रोक्त मार्गसे परमानन्दकी
प्राप्ति तक तक तो कोई एक अति कष्टसे पहुँचता है, यहाँ तो तुरन्त और प्रत्येक
व्यक्ति पहुँचता है। अतः सद्यपरिनिर्वृति काव्यसेवनका मौलिभूत या सर्वाधिक मुख्य
प्रयोजन है।
6. कान्तासम्मित उपदेश प्रिया के समान उपदेश से कार्य पर नियुक्त करने वाला। इस विषयको वृत्तिमें विवेचन करते हुए मम्मट कहते हैं कि यह काव्य उपदेश, प्रभुसम्मित सुहृद्सम्मित उपदेश से विलक्षण कान्ता सम्मित उपदेश द्वारा कार्य पर नियुक्त करने वाला होता है। प्रभुसम्मितशब्दप्रधानवेदादिशास्त्रेभ्यः सुहृत्सम्मितार्थतात्पर्यवत्पुराणादीतिरहासेभ्यश्च शब्दार्थयोर्गुणभावेन रसाङ्गभूतव्यापारप्रवणतया विलक्षणं यत्काव्यं लोकोत्तरवर्णनानिपुणं कविकर्म तत् कान्तेव सरसतापादानेनाभिमुखीकृत्य रामादिवद्वर्तितव्यं न रावणादिवदित्युपदेशं च यथायोगं कवेः सहृदयस्य च करोतीति सर्वथा तत्र यतनीयम्।
उपदेश की त्रिविधा शैली
कान्ता सम्मित उपदेश को
प्रतिपादन करते हुए आचार्य मम्मट तीन प्रकारकी उपदेशकी शैलीको भी बता रहे हैं। ये
तीनो प्रकारकी शैली समाजमें प्रचलित हैं। किन्तु उनमेंसे जो प्रियाकी वाणी में कोई
समझाये वह है काव्य। इनमें से प्रथम शैली है प्रभुसम्मित शैली जिसमें राजाज्ञा,
वेदादिशास्त्रादेश संविधान प्रदत्त कानून होता है। जिसे अक्षरशः जैसा कहा गया वैसा
मानना पडता है। इसलिए इसे शब्दप्रधान उपदेश भी कहते हैं। दूसरी शैली है मित्र या
सुहृद्सम्मित उपदेश इसमें कोई मित्र किसीको उपदेश न देकर उसे सलाह देता है। सलाह
में विचार करके उसके आशयको ग्रहण किया जाता है। अतः इसमें अर्थकी प्रधानता होती
है। इसी प्रकार पुराण इतिहासको भी इसी प्रकारके उपदेश देने वाले ग्रन्थ माना जाता
है। क्योंकि पुराणादिमें जितने प्रकारके विषय तथा उपदेश हैं उनका परीक्षण निरीक्षण
करने के पश्चात् अपने लिए योग्य विषय सारको ग्रहण करने के लिये प्रत्येक व्यक्ति
स्वतन्त्र होता है। इस प्रकार कोई शास्त्राज्ञाके समान सुहृदुपदेश मानने के लिए
विवश भी नहीं होता है। अब शेष बचता है कान्ता उपदेश जिसे मम्मट कहते हैं काव्यका
उपदेश। यह उपदेशकी शैली उपर परिगणित दोनों शैलियों में से सर्वथा भिन्न होती है।
यहाँ न शब्दकी प्रधानता होती है न अर्थकी प्रधानता अपितु दोनो गौण हो जाते हैं।
यहाँ दोनो के मिश्रणसे रसिली वाणी ही काव्य-कान्ता वाणी हो जाती है। जैसे कोई
स्त्री जब किसी पुरुषको किसी कार्यमें प्रवृत्त करनेके लिए किसी विशेष हावभाव
कटाक्ष पूर्वक कहती है तो वहाँ न तो शब्दोंका आशय न अर्थकी प्रधानता रह जाती है
अपितु उसका कहना ही कार्यके प्रति प्रवृत्तिको जगा देती है। इस प्रकार कान्ताकी
सुमधुर वाणी की तरह काव्य भी मनुष्यको सत्प्रेरणा देता है।
इस प्रकार आचार्य मम्मटने
छह प्रयोजनोंको लिखकर माना है कि काव्यके छह प्रयोजन हो सकते हैं। अब इससे यह तो
ज्ञान हो गया कि काव्य से छह प्रयोजन हो सकते हैं किन्तु काव्यप्रयोजन के उपभोक्ता
दो होते हैं एक निर्माता कवि, दूसरा सहृदय पाठक। क्या इन दोनोंको समान रूपसे छह
काव्यप्रयोजन प्राप्त हो सकते हैं? या दोनोके लिए परिस्थितियाँ भिन्न भिन्न होती है?
इसका विश्लेषण करते हैं।
प्रथम कवि द्वारा काव्यकी
सिर्जना होती है। अतः कविकी दृष्टि से छह प्रयोजनोंको देखते हैं। यश की प्राप्ति,
धन लाभ, व्यवहारज्ञान, अमङ्गल नाश, परमानन्दकी प्राप्ति तथा कान्ता सम्मित उपदेश
इनमें से कविको काव्यलेखन एवं वाचनसे यश की प्राप्ति तथा धनका लाभ अवश्य होता है।
अमङ्गल नाश परमानन्दकी प्राप्ति भी हो जायेगी। किंतु व्यवहार ज्ञान कैसे संभव है ? व्यवहारज्ञान तो पहले से जानता हो तभी
कवि अपने काव्यमें लिखेगा न। अतः व्यवहार ज्ञान लेखक कवि की अपेक्षा सहृदय पाठके के लिए अधिक उपयुक्त होता
है। उसी प्रकार, अब अमङ्गलनाशको देखते हैं। अमङ्गलसे रक्षाके लिए भगवनकी स्तुति
परक स्तोत्रकाव्य लिखना आवश्यक है, जो काव्यकी एक विधा है। इसकी रचना करने से
कविको लाभ है वाचन करने से पाठकका भी लाभ है। अतः यह उभय लाभाकर प्रयोजन होना
चाहिए।
सद्यपरनिर्वृति या अलौकिकान्द
यह काव्य का सर्वप्रधान प्रयोजन है। काव्यरचना काल में कवि काव्यके पात्रके साथ
तन्मय होकर काव्य रचना करता है। वह उस समय विगलितवेद्यान्तर अवस्थाको पाता है।
पाठक पढते समय उस अवस्थाको पाता है। अतः कह सकते हैं यह उभलाभकर प्रयोजन है।
कान्तासम्मित उपदेश इस
प्रयोजनको यदि देखें तो इसका आशय है कि काव्य प्रियाकी भाँति उपदेश करता है। उपदेश
तभी करेगा जब हम पठन मनन चिन्तन करेंगे। पढने वाला तो पाठक ही है। कोई कवि रचना भी
करें और उसे वही रचना कान्ताकी तरह उपदेश भी करे यह संभव नहीं है। यदि उपदेश पाना
है तो कविको भी सहृदय पाठक बनकर काव्यका मनन करना पडेगा इस लिए कान्तासम्मित उपदेश
पाठक केन्द्रित उपदेश होना चाहिये।
अतः हम कह सकते हैं कि
मम्मटोक्त काव्यप्रयोजन तीन प्रकारके हैं
1. कवि या रचनाकार के लिए – यशकी प्राप्ति, धनकी
प्राप्ति।
2. पाठक के लिए – कान्ता के समान उदेश, व्यवहार ज्ञान।
3. दोनों के लिए – अमङ्गल नाश, सद्य परनिर्वृति या
अलौकि आनन्द।
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