प्रस्तुत लेख मम्मटके काव्यप्रकाश की झळकीकर टीका के आधार पर बनाये गये सीरीज हैं। इसमें झळकीकर (वामन भट्ट झलकीकर) टीकाके साथ साथ अन्य संस्कृतके टीकाकारों के मत भी यथा स्थान रखे गये हैं। प्रथम लेख पढनेके लिए यहाँ जायें।
गूणीभूत व्यङ्ग्यका लक्षण आचार्य मम्मट के अनुसार - अतादृशि गुणीभूतव्यङ्ग्यं व्यङ्ग्ये तु मध्यमम् । है। अर्थात् वाच्यार्थसे चमत्कारी व्यङ्ग्यार्थके न होने पर गुणीभूत नामक दूसरे प्रकारका काव्य होता है। जिसे मध्यमकाव्य भी कहा जाता है। यहाँ एक शङ्का उपस्थित करते हैं । गुणीभूत मध्यमकाव्य में व्यङ्ग्य अगूढ हो तो भी काव्य में वाच्य का अभाव हो गया तथा प्रधानता तो अगूढ (व्यङ्ग्य) की ही हो गई अतः अगूढ होने पर भी व्यङ्ग्य होने के कारण गुणीभूत व्यङ्ग्यको ही मुख्य माना जाये। यह शङ्का समाधान के लिए कहते हैं - कामिनी कुच कलश न्याय से किंचिद्गूढ निबन्धन ही चारूत्व का कारण होता है। यद्यपि वाच्यत्व नहीं है फिर भी अगूढ निबन्धन तो विवृत कुचकलश के सदृश स्फुटता होने से चारुत्व जनक नहीं होता। इस प्रकार कामिनी कुचकलश न्याय से किंचिद्गूढ किंचिद्विवृत सहृदय संवेद्य काव्य ही ध्वनि काव्य हो सकता है। अतः प्रष्ट है वे सभी व्यङ्ग्य काव्य गुणीभूत हैं, जो सहृदय के लिए भी दुःख संवेद्य हों तथा असहृदय के लिए भी सरलता से गम्य हो। इसी प्रकार अन्य भेदों में भी अनुभव ही साक्षी है ।
इस विषय पर एक श्लोक प्रसिद्ध पद्य है
नान्ध्रीपयोधर इवातितरां प्रकाशो नो गुर्जरीस्तन इवातितरां निगूढः।
अर्थो गिरामपिहितः पिहितश्च कश्चित्सौभाग्यमेति मरहट्टवधूकुचाभः।।
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